ख़बरदार जो रचना पाँच सौ शब्दों से अधिक हुई

01-09-2026

ख़बरदार जो रचना पाँच सौ शब्दों से अधिक हुई

अख़तर अली (अंक: 301, सितम्बर प्रथम, 2026 में प्रकाशित)

 

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सैंकड़ों हमले होने के बाद अब एक नया हमला हुआ है। यह किसका सोचा हुआ खेल है यह तो नहीं मालूम लेकिन सामने संपादकों के माध्यम से आया है। संपादकों ने दो टूक कह दिया है कि व्यंग्य रचना पाँच सौ शब्दों से अधिक नहीं होनी चाहिये। 

इस दो टूक में जो धमकी समाहित है वह बस लेखक ही समझ सकता है। वैसे शब्दों को पढ़ें तो यह निवेदन है लेकिन अलिखित को पढ़ने की जिनमें सलाहियत है वही समझते हैं कि यह कितनी ख़तरनाक धमकी है। जब से संपादकों ने ख़बरदार की दहाड़ लगाई है कई लेखक डिप्रेशन में आ गये हैं, किसी का बीपी बढ़ गया तो किसी की शुगर हाई हो गई है, कुछ तो आईसीयू में हैं। मिलने वालों से यही कहा जा रहा है—बचेंगे तो रचेंगे। 

व्यंग्यकारों के पास परिचितों के शोक संदेश आ रहे हैं कि—यह जानकार अत्यंत दुःख हुआ कि आपको शब्दाघात हुआ है और आप शब्द सीमा की चपेट में आ गये हैं, हिम्मत से काम लें, हमारे हाथ में कुछ भी नहीं है। संपादक के विधान के आगे हम विवश हैं, लेखन की दुनिया में रह संपादक से बैर नहीं लिया जा सकता। इस दुःख की बेला में हम सब आपके साथ हैं। 

ऐसा लगता है मानो रचना पाँच सौ शब्दों से अधिक होगी तो लेखक का मुँह नोच लिया जायेगा, उसका कान मरोड़कर पूछा जायेगा—बता ये अतिरिक्त शब्दों को कहाँ डालें? 

ऐसा लगता है संपादक का दरबार लगा है। सामने व्यंग्यकार सर झुकाए खड़ा है। उसके हाथ पैर ज़ंजीर से बँधे हुए हैं। उपसंपादक ब आवाज़ ऐ बुलंद व्यंग्यकार का जुर्म पढ़ता है—महोदय यह व्यंग्यकार है इसे बार-बार सूचित किया गया है कि रचना पाँच सौ शब्दों से अधिक न हो लेकिन इसे सूचना में हमारे इमेल के अतिरिक्त कुछ दिखता ही नहीं है। आज इसने फिर पाँच सौ दस शब्दों की रचना भेजी है। 

अपराध सुन कर संपादक ग़ुस्से में तमतमा गया और चीख़ कर कहा—दस शब्द अधिक हैं तो इसे दस कोड़े मारे जायें और ध्यान रहे कि इसकी रचना कदापि अस्वीकृत न की जाये। रचना छापो पर चार सौ पचास शब्द ही छापो, चुन-चुन कर महत्त्वपूर्ण शब्दों को काटो, भावपूर्ण वाक्यों को हटा दो, रचना के अंत में इसका नाम न छापा जाये और इसकी फोटो के बदले किसी अन्य की फोटो लगा दी जाये। 

व्यंग्यकारों पर ज़ुल्म यहीं ख़त्म नहीं होता उनसे कहा जाता है इन पाँच सौ शब्दों में व्यंजना, निर्वाह, पंच, करुणा और अन्याय का विरोध होना चाहिए। 

अभी मेरे मन में बहुत ग़ुस्सा, खीज, झुँझलाहट बाक़ी है लेकिन डर है कि रचना पाँच सौ शब्दों से अधिक न हो जायें इसलिए इसे यहीं समाप्त करता हूँ। 

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