एक बंदिनी का अपराध और प्रेम से द्वंद्व: ‘कारागार’

15-05-2026

एक बंदिनी का अपराध और प्रेम से द्वंद्व: ‘कारागार’

आकाँक्षा सक्सेना (अंक: 297, मई द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)

उपन्यास: कारागार
लेखिका: डॉ. आरती ‘लोकेश’
मूल्य: ₹ 230.00
पृष्ठ संख्या: 224
प्रकाशक: साहित्य पीडिया पब्लिशिंग नोएडा (भारत)
ISBN: 978-81-937022-1-5

प्रेम में छला व्यक्ति सपाट मार्ग में भी गड्ढों की कल्पना से सतर्क होकर चलता है। जिसे एक कहावत ‘दूध का जला छाछ भी फूँक-फूँक कर पीता है’ चरितार्थ करती है। उपन्यास ‘कारागार’ (एक बंदिनी का अपराध और प्रेम से द्वंद्व) हमारे सामने जीवन रूपी कारागार की असीम सच्चाई को बयाँ करता है। कारागार यदि जीवन है तो रिश्तों के पाश में स्वयं को जकड़ा पाने वाले हम बंदिनी ही कहलाएँगे। जीवन का दूसरा नाम संघर्ष कहा जाता है। यह उपन्यास भी इसी संघर्ष के कटघरे में खड़ी चारु की कथा को विपुल के साथ जोड़ते हुए हमारे सामने लाता है।

लेखिका ने पूरे उपन्यास को 9 उप-शीर्षकों में विभाजित किया है, प्रत्येक उप-शीर्षक अपनी कहानी को अपने नाम के ही अनुकूल चरितार्थ करता है।

लेखिका ने घटना को रोचकता के सूत्रों में बाँधकर प्रस्तुत किया है। धीरे-धीरे यह सूत्र खुलते जाते हैं लेकिन रोचकता आद्योपांत विद्यमान रहती है।

डॉ. आरती का यह उपन्यास तत्कालीन समय की प्रासंगिकता को उजागर करता है। हमारे समकालीन जितने भी सामाजिक मुद्दे जैसे पर्यावरण, स्वच्छता, बेरोज़गारी, मानव तस्करी, अवैध सम्बन्ध, अवसाद, ईर्ष्या, प्रेम से मोहभंग व स्त्री की दोयम दर्जे की स्थिति का सूक्ष्मता के साथ अंकन किया गया है।

बाल मनोविज्ञान और बाल जिज्ञासा/आकांक्षा पर परिवार की विखंडित संरचना का कितना प्रबल प्रभाव पड़ता है इसे रचनाकार ने कथा सूत्रों के माध्यम से प्रकट किया है।

जीवन की सच्चाई को बयाँ करता यह उपन्यास शुरूआत से ही सामाजिक विसंगति जैसे बेरोज़गारी तथा छोटे बच्चों का पढ़ाई के स्थान पर बालश्रम या मज़दूरी करने जैसी घटना को भी उजागर करता है।

खेती को प्रोत्साहन तथा विद्या के महत्त्व के साथ ही एक फूल वाले के प्रति संवेदना विपुल जैसे पात्र के विपुल हृदय का परिचय देती है। जैसे-जैसे घटना आगे बढ़ती है पाठक की संवेदना को घटनाएँ झकझोर के रख देती हैं। लेखिका ने पूर्व दीप्ति शैली के द्वारा चारु के बचपन की घटनाओं तक पाठक को जोड़ा है।

चारु के जीवन वृत्त को पढ़ते हुए मुझे यशपाल का उपन्यास ‘दिव्या’ याद आए बिना ना रह सका। दिव्या भी जीवनपर्यंत संघर्ष करते हुए मानव तस्करी का शिकार होती है और चारु के जीवन का संघर्ष भी अंत तक चलता है जैसे दिव्या के समक्ष मारीश अपना प्रणय निवेदन रखता है वैसे ही चारु और विपुल भी प्रणय सूत्र में बँधने को तैयार दिखाई देते हैं।

फूलों व सब्ज़ियों की खेती में उपयोग की जाने वाली खाद तथा पानी के प्रयोग तथा तकनीकी ज्ञान की दृष्टि से यह उपन्यास अपने समय से आगे की कथा बयाँ करता है। यह उपन्यास अपनी वैज्ञानिकता को पाठक के समक्ष प्रस्तुत करता है। लेखिका ने यथार्थ का अंकन अत्यंत सूक्ष्मता से किया है।

प्रेमचंद का उपन्यास ‘कर्मभूमि’ भी अपने समय की समस्याओं को उजागर करते हुए अंत में आदर्शोन्मुख यथार्थवादी अंत को प्रस्तुत करता है। उसी प्रकार कारागार उपन्यास भी जीवन में ठोकरें खाते भटकते चारु और विपुल को एक साथ मिला तथा शुभदा का बचपन वापस आने तथा दोस्तों व चाचा जी का चारु और विपुल के जीवन में वापस आना एक हो जाना इस उपन्यास को भी आदर्शोन्मुखी यथार्थवाद की ओर ले जाता है।

अनेक स्थानों पर लेखिका ने चारु के मन की स्थिति को प्राकृतिक प्रतीकों के माध्यम से प्रकट किया है। भाषा की दृष्टि से यह उपन्यास अपने युग का अद्वितीय उपन्यास है। साधारण से वाक्य जहाँ एक ओर पाठक को बाँधे रखते हैं वहीं संस्कृतनिष्ठ भाषा में बिंब गढ़ना पाठक को अपनी भाषा के प्रति और जागरूक करता है।

पूरे उपन्यास में भाषा का प्रांजल और स्निग्ध प्रवाह है। बिंब योजना अत्यंत उत्कृष्ट है। कथ्य के अंदर से घटना झाँक रही है। पाठक की रोचकता उपन्यास के मध्य में आकर और बढ़ जाती है।

यह उपन्यास सिर्फ़ साहित्यिक दृष्टि से ही नहीं सामाजिक दृष्टि से भी अपनी अद्वितीयता में बहुमूल्य उपन्यास है।

यह कहना अतिशयोक्ति न होगा कि शिक्षा, बेरोज़गारी, खेती की समस्या, पर्यावरण, स्वच्छता, पिछड़ी जाति में आत्म सम्मान, सामाजिक भेदभाव, पारिवारिक विघटन, प्रेम में प्रवंचना, अवसाद, घुटन, ईर्ष्या, प्रतिस्पर्धा, स्त्री शिक्षा व स्त्री की दोयम दर्जे की स्थिति, भ्रष्टाचार, मानव तस्करी और बाल मनोविज्ञान जैसे आधुनिक मुद्दों पर संवेदनशील दृष्टि से विचार किया गया है। अतः यह उपन्यास अपने समाज की स्थिति का हू-ब-हू प्रत्यंकन करता है।

साहित्य की सार्थकता पाठक की चेतना का परिष्कार करने में है यह उपन्यास एक साथ विभिन्न मुद्दों पर पाठक की दृष्टि ले जाकर सिर्फ़ पाठक की चेतना का परिष्कार ही नहीं करता वरन्‌ पाठक की चेतना का विस्तार भी करता है। ठीक ही कहा गया है साहित्य समाज का दर्पण है।

संक्षेप में कारगार उपन्यास के विषय में कहें तो “कही अनकही बातों की उलझी सी पंखुड़ियाँ को जैसे ही चारु महकाने की कोशिश करती है वैसे ही उसे मुरझाए लम्हे साल कर उसे उधार के प्यार की याद दिला गुनगुनाते कंटक उसके जीवन का संगीत ही हर लेते हैं। इस तरह बुनते उधड़ते नातों के पाश में चारु स्वयं को कारागार की सलाखों के पीछे मिशन ‘मंजूषा’ द्वारा स्वयं को स्थापित कर प्रदीप्त उषा में अपने जीवन के बाल सूर्य को नभ पर आरूढ़ देखती है।”

आकाँक्षा सक्सेना 
शोधार्थी

0 टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें