दोस्त

नितेश बनाफ़र (अंक: 298, जून प्रथम, 2026 में प्रकाशित)

 

भाग 1: कोरबा—यादों के अमरूद और कोयले की साँसें

कोरबा की वे शामें . . . वे कहीं गई नहीं हैं। वे मेरे भीतर अब भी ज़िंदा हैं—ठहरी हुई . . . जैसे किसी ने समय को वहीं रोक दिया हो और बाक़ी दुनिया को आगे बढ़ने की इजाज़त दे दी हो। 90 का वह दशक—जब घड़ियाँ चलती थीं, पर भागती नहीं थीं। जब शामें उतरती थीं, तो लगता था जैसे आसमान धीरे-धीरे अपनी थकान उतार रहा हो। कोल इंडिया के वे सरकारी क्वार्टर . . . सब एक जैसे। इतने एक जैसे कि अगर कोई बाहर से आता, तो उसे हर घर में एक ही कहानी चलती हुई लगती। पर हम जानते थे—हर आँगन की मिट्टी अलग थी, हर पेड़ की छाँव अलग थी। हमारे आँगन का अमरूद का पेड़ . . . उस पर सिर्फ़ फल नहीं लगते थे, उस पर हम लगते थे। हमारी हँसी, हमारी लड़ाइयाँ, हमारे छोटे-छोटे सपने—सब उसी पर पनपते थे। और हवा . . . वह हमेशा कोयले से सनी रहती थी। पर अजीब बात यह थी कि हमने कभी उसे गंदा नहीं कहा। वह हमारी साँस बन गई थी—जैसे कोई कड़वा सच जिसे तुम नकार नहीं सकते, बस जी लेते हो।

हिमांशु: स्पष्टता का वो ध्रुव

हिमांशु के भीतर एक अजीब सी स्पष्टता थी। वह भावुकता के भँवर में नहीं फँसता था। उसे पता था कि उसे क्या चाहिए और उसे हासिल कैसे करना है। स्कूल का कोई भी कंपटीशन हो—चाहे क्विज़ हो, दौड़ हो या कोई और खेल—वह हर जगह मौजूद रहता। वह, जो ऊर्जा का विस्फोट था। महल्ले के किसी भी घर का दरवाज़ा खटखटाकर पानी माँग लेना या किसी अजनबी से क्रिकेट के स्कोर पर बहस छेड़ देना उसके लिए बाएँ हाथ का खेल था। वह मेरी तरह ख़्यालों में नहीं खोता था, वह वर्तमान में जीता था—बिना किसी झिझक के, बिना किसी संकोच के।

मैं: खदानों के धुएँ में आकृतियाँ ढूँढ़ता लड़का

दूसरी तरफ़ मैं था। एक ऐसा लड़का जो क्लास की खिड़की से बाहर देखते हुए खदानों के उस गहरे धुएँ में न जाने कौन-सी आकृतियाँ ढूँढ़ता रहता। एक मैं था, अपने ही भीतर के किसी कोने में सिमटा हुआ अंतर्मुखी। स्कूल की असेंबली में लाइन में खड़ा होना भी मेरे लिए एक चुनौती थी, जहाँ मुझे लगता था कि सबकी नज़रें मुझ पर हैं। हम दोनों—बिल्कुल विपरीत दिशाओं से आए दो ध्रुवों की तरह थे। हमारी दोस्ती उस शांत तालाब की तरह थी, जिसमें वह पत्थर फेंककर हलचल पैदा करता और मैं उन लहरों को बस देखता रहता। मेरे लिए वह सिर्फ़ एक ‘दोस्त’ नहीं था, वह मेरा पूरा संसार बन गया था। उस दशक की धीमी ज़िन्दगी में, जहाँ मनोरंजन के नाम पर सिर्फ़ रविवार का ‘चित्रहार’ था, उसका साथ ही मेरी कायनात था। जब वह मेरे क्वार्टर के बाहर आकर ज़ोर से मेरा नाम पुकारता, तो मुझे लगता कि दुनिया की सारी भीड़ से मुझे किसी ने बचा लिया है, किसी ने मुझे एक अलग पहचान दे दी है। पर इसी सुरक्षा के पीछे, एक ख़ामोश अधिकार ने जन्म लेना शुरू किया। मुझे याद है, एक बार महल्ले के बरामदे में हिमांशु कुछ लड़कों के साथ क्विज़ की तैयारी कर रहा था। मैं सामने मैदान में अकेले बल्ला घुमा रहा था, पर मेरा ध्यान खेल पर कम और उसकी हँसी पर ज़्यादा था।

अचानक उसने दूर से आवाज़ लगाई, “अबे इधर आ ना . . . अकेला क्या कर रहा है?”

मैंने बिना उसकी तरफ़ देखे कहा, “तू कर अपनी पढ़ाई।”

वह कुछ पल मुझे देखता रहा। फिर हँसकर बोला, “हर जगह तू ही थोड़ी रहेगा यार . . . ”

उस समय उसकी बात मुझे अच्छी नहीं लगी थी। मुझे लगता था, हिमांशु सिर्फ़ मेरा होना चाहिए। उसे किसी और के साथ उस तरह नहीं हँसना चाहिए जैसे वह मेरे साथ हँसता है।

आज सोचता हूँ, शायद वह मुझे छोड़ नहीं रहा था। वह बस दुनिया में अपनी जगह बनाना सीख रहा था।

और मैं?

मैं अभी भी उसी छोटी-सी दुनिया को हमेशा के लिए बचाए रखना चाहता था।

भाग 2: भिलाई—चमक, तन्हाई और स्वाभिमान की ढाल

स्कूल ख़त्म होते-होते हमारे बीच एक अदृश्य दूरी आ गई थी। 12वीं के नतीजों में हिमांशु मुझसे बेहतर निकला। धीरे-धीरे वह उन लड़कों के बीच ज़्यादा रहने लगा जिन्हें लोग “होशियार” कहते थे। उसकी चाल, उसके बोलने का तरीक़ा—सब बदलने लगा था। या शायद वह बदल नहीं रहा था, बस बड़ा हो रहा था। बदलता हुआ मुझे इसलिए दिख रहा था क्योंकि मैं वहीं का वहीं खड़ा था। जब उसका एडमिशन हुआ, उसने मुझे फोन करके बस ख़बर दी। मुझे पता नहीं क्यों उम्मीद थी कि वह कहेगा—“चल साथ चलते हैं।” लेकिन उसने नहीं कहा। इत्तिफ़ाक़ से कुछ समय बाद मेरा एडमिशन भी भिलाई में ही हुआ, अब हम दोनों एक ही शहर में थे, पर हमारी दूरियाँ अब मीलों में नहीं, एहसासों में सिमट गई थीं। इंजीनियरिंग कॉलेज का पहला साल मेरे लिए बेहद कठिन था। नए लोग, नया शहर, हॉस्टल का अकेलापन—सब भीतर धीरे-धीरे जमा होता जा रहा था। रात के साढ़े दस बजे अक्सर मैं कमरे की ट्यूबलाइट के नीचे बैठा उसे कॉल करता। घंटी बजती रहती। कभी फोन नहीं उठता। कभी छोटा-सा जवाब आता—“बाद में बात करता हूँ यार, थोड़ा बिज़ी हूँ।” एक रात मैंने लगातार तीन बार कॉल किया। चौथी बार करने से पहले बहुत देर तक फोन हाथ में पकड़े बैठा रहा। कमरे में सिर्फ़ पंखे की आवाज़ थी। मुझे सबसे ज़्यादा तकलीफ़ तब होती जब उसकी ज़िन्दगी के बारे में मुझे दूसरों से पता चलता। उसकी नई दोस्तियाँ, नए लोग, नए शौक़—सब जैसे धीरे-धीरे मुझसे बाहर होने लगे थे। लेकिन शायद उसकी तरफ़ भी कुछ था, जिसे उस समय मैं देख नहीं पाया। एक बार कई दिनों बाद उसका ख़ुद फोन आया।

“कहाँ ग़ायब रहता है बे?”

मैंने हल्की हँसी में कहा, “तुझे क्या फ़र्क़ पड़ता है?”

कुछ पल चुप्पी रही। फिर उसने धीरे से कहा, “तू पहले जैसा नहीं रहा।”

मैं कहना चाहता था, ‘पहले जैसा तू भी कहाँ रहा . . .’ लेकिन मैंने कुछ नहीं कहा। दुख की भी एक उम्र होती है। एक समय के बाद वह भी थक जाता है। धीरे-धीरे मैंने अपने आसपास लोगों की भीड़ बनानी शुरू की। नए दोस्त बनाए। बाहर से देखने पर लगता था कि मैं बदल गया हूँ। लेकिन सच यह था कि मैं सिर्फ़ अपनी तन्हाई छिपाना सीख रहा था। जब कभी हिमांशु मिलने बुलाता, मैं भी अब बहाने बना देता। फोन रखने के बाद देर तक छत देखता रहता। अजीब बात थी—उसे चोट पहुँचाकर भी सुकून नहीं मिलता था।

“उसने नए रिश्ते इसलिए बनाए क्योंकि उसे ‘दुनिया’ देखनी थी, और मैंने नए रिश्ते इसलिए बनाए क्योंकि मुझे अपनी ‘तन्हाई’ छिपानी थी।” 

भाग 3: सफ़ेद झूठ और सुदामा का संकोच

वक़्त का पहिया घूमा और भूमिकाएँ बदल गईं। जब हिमांशु दिल्ली गया, तो शायद उसे पहली बार उस अकेलेपन का अहसास हुआ जो मैंने भिलाई में झेला था। उसके कॉल अब निरंतर आने लगे थे, हमारे बीच संवाद फिर शुरू हुआ। जब मैं नौकरी के सिलसिले में मुंबई पहुँचा, तो वह मुझसे मिलने भी आया। एयरपोर्ट से बाहर निकलते ही उसने पहले की तरह कंधे पर मुक्का मारा और कहा, “अबे तू अभी भी उतना ही दुबला है।” मैं हँस पड़ा। कुछ रिश्ते पूरी तरह ख़त्म नहीं होते। वे बस चुप हो जाते हैं। दोनों वैसे ही ख़ुश थे, जैसे कोरबा की धूल फिर से हमारे कंधों पर सज गई हो। लेकिन फिर वह दौर आया, जिसने पूरी दुनिया के साथ-साथ मेरे भीतर के आत्मविश्वास को भी नज़रबंद कर दिया। लॉकडाउन के छह महीने बीतते-बीतते मेरी नौकरी चली गई। वह समय ऐसा था जब बाहर सन्नाटा था और मेरे भीतर एक गहरा अवसाद। एक स्वाभिमानी इंसान के लिए उसकी आजीविका सिर्फ़ पैसा नहीं, उसकी रीढ़ होती है। मेरी वह रीढ़ जैसे अचानक टूट गई थी। मैं अपने ही घर में एक अनकहे, अदृश्य दबाव में था। अपनी ख़ाली जेब लेकर मैं अपनों के सामने भी आँखें उठाने से कतराता था। इसी बीच हिमांशु का फोन आया। उसकी शादी तय हो गई थी।

फोन पर उसकी आवाज़ पुरानी जैसी ही थी—गर्म, अपनापन भरी।

“सुन . . . गाड़ी बुक कर दी है।”

मैं चुप रहा।

“अबे सुन तो . . . तू, अंकल-आंटी, भाई . . . सब लोग आ रहे हो। और कोई बहाना नहीं चलेगा।”

मैंने होंठ भींच लिए।

कमरे में अँधेरा था। बिजली गई हुई थी। बाहर कहीं कुत्ते भौंक रहे थे।

“क्या हुआ बे?” 

मैंने हँसने की कोशिश की, “कुछ नहीं . . . बस तबीयत थोड़ी ठीक नहीं है।” फोन के उस पार कुछ सेकंड ख़ामोशी रही। फिर उसने बहुत धीरे पूछा, “पैसों की दिक़्क़त है क्या?” उस एक सवाल ने भीतर जैसे कुछ तोड़ दिया। मैं चाहता तो उसी पल सच बोल देता। शायद रो भी पड़ता। लेकिन मैंने तुरंत कहा— “पागल है क्या?” उसने फिर ज़िद नहीं की। 

आज सोचता हूँ, शायद दोस्ती उसी दिन हार गई थी। उस दिन नहीं जब मैं शादी में नहीं गया . . . बल्कि उस दिन, जब उसने पूछना बंद कर दिया और मैंने सच बोलना। गाड़ी आने का समय निकल गया। मैं देर तक कमरे में बैठा रहा। बटुए में पाँच सौ के दो नोट पड़े थे। मैं उन्हें बहुत देर तक देखता रहा। “जब दोस्त सुदामा हो जाए, तो वह कृष्ण के घर नहीं जाता। वह अपनी फटी हुई पोटली में अपनी दरिद्रता छुपाकर दूर बैठ जाना ज़्यादा पसंद करता है—बजाय इसके कि अपने मित्र की आँखों में अपने लिए तरस देखे।” उसके बाद उसने फिर कभी फोन नहीं किया।

भाग 4: मौन का विस्तार और अधूरी इच्छा

ऊपर वाले की कृपा रही कि कुछ समय बाद मुझे नई नौकरी मिल गई। ज़िन्दगी फिर धीरे-धीरे पटरी पर लौटने लगी।

इसी बीच मेरी भी शादी तय हुई।

मैंने उसे फोन करके ख़बर दी। बहुत औपचारिक तरीक़े से।

मैं कहना चाहता था—“भाई, तुझे आना ही है।”

लेकिन पता नहीं क्यों शब्द गले में अटक गए।

आख़िर में मैंने ख़ुद ही कह दिया, “तू बहुत बिज़ी होगा . . . आना मुश्किल होगा शायद।”

उसने बस इतना कहा, “देखता हूँ यार।” और फोन कट गया। 

उसके बाद जैसे हमारे बीच का आख़िरी पुल भी चुपचाप ढह गया। कैलेंडर के पन्ने बदलते रहे, पर उन बदलते पन्नों के साथ न कभी जन्मदिन की बधाइयाँ लौटीं, न त्योहारों की वो पुरानी रौनक़, और न ही कभी एक-दूसरे का हालचाल पूछने की वो बेबाक छटपटाहट। आज मेरे पास नौकरी भी है और परिवार भी; ज़िंदगी की इस तथाकथित स्थिरता के बीच बाहर से सब कुछ शांत दिखता है। लेकिन कुछ रिश्ते आदमी के भीतर उसी उम्र में अटके रह जाते हैं, जहाँ वे टूटे थे। आज भी जब वह मेरा व्हाट्सएप स्टेटस देखता है, दिल अचानक तेज़ धड़कने लगता है। कई बार मैं लंबा संदेश लिखता हूँ। अपनी सारी विवशता, सारा अपराधबोध, सारी पुरानी मोहब्बत उसमें भर देता हूँ। फिर बहुत देर तक “send” बटन देखता रहता हूँ। और अंत में उसे मिटा देता हूँ। शायद अब डर यह नहीं कि वह मुझे समझेगा नहीं।

डर यह है कि कहीं वह सचमुच आगे बढ़ चुका हो।

लेकिन मैं आज भी कहीं उसी मोड़ पर खड़ा हूँ—जहाँ से वह गाड़ी मुझे लेने आने वाली थी।

मैं आज भी बस एक बार उससे बच्चों की तरह लड़ना चाहता हूँ। उस पर चीख़ना चाहता हूँ। और फिर उसे कसकर गले लगाकर रोते हुए कहना चाहता हूँ—

“दोस्त . . . मैं उस दिन नहीं आया क्योंकि मैं ज़िन्दगी से हार गया था। और मैं अपनी उस बुझी हुई हार को लेकर तेरे जीवन के सबसे बड़े जश्न की रोशनी फीकी नहीं करना चाहता था।”

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