आदिल
नितेश बनाफ़र
आख़िरकार बीस घंटे लंबे सफ़र के बाद ट्रेन अहमदाबाद से मुज़फ्फरपुर पहुँच गई। प्लेटफ़ॉर्म पर उतरते ही आदिल को लगा जैसे ज़मीन अभी भी उसके पैरों के नीचे हिल रही हो—जैसे यात्रा अब भी उसके भीतर चल रही हो। सामान ज़्यादा था, इसलिए वह वहीं खड़ा होकर किसी कुली की राह देखने लगा, पर लाल कमीज़ कहीं नज़र नहीं आई। यूँ भी हमारे देश में स्टेशन जितने छोटे होते हैं, इंतज़ार उतना ही लंबा होता है—चाहे वह यात्रियों का अपनी ट्रेन के लिए हो या उस स्टेशन मास्टर का, जो बरसों से अपनी तरक़्क़ी की ट्रेन का इंतज़ार करते-करते ऊब चुका होता है। ख़ैर, इतने सारे बैग वह अकेले टैक्सी स्टैंड तक नहीं ले जा सकता था, इसलिए उसने सोचा—कुली न सही, कोई रेलवे का ख़लासी ही मिल जाए; जो भी वाजिब किराया होगा, दे दूँगा। इसी सोच में उसकी निगाहें एक ख़लासी पर टिक गईं। किराया तय हुआ, सामान गाड़ी पर लादा गया, और ख़लासी ने उस लोहे की चार पहियों वाली गाड़ी को खींचना शुरू किया; आदिल भी उसके पीछे-पीछे चल पड़ा। सामने रखे सामान को देखते हुए उसने मन ही मन गिनती की—आठ बैग: पाँच बड़े और तीन छोटे।
इतना सामान ज़रूरी भी था, क्योंकि पूरे आठ साल बाद वह अपने घर लौट रहा था। आठ साल हो गए थे अम्मी-अब्बू का चेहरा देखे हुए, आठ साल हो गए थे बड़े भाई अकरम से दाँत निखारकर हँसे हुए, और छोटी बहन अमरीन को प्यार से सहलाए हुए। अब तो अमरीन बड़ी हो गई होगी; शायद उसके निकाह की बातें भी चल रही हों—यही तो बताया था बचपन के दोस्त फ़रहान ने, जब वह अहमदाबाद आया था, कि अकरम भाईजान अब एक से दो हो गए हैं और बहुत जल्द दो से तीन भी हो सकते हैं, या शायद हो भी चुके हों। सब मुझे देखकर कितने ख़ुश होंगे—अमरीन, भाईजान . . . पर क्या अब्बा? यह ख़याल आते ही आदिल चलते-चलते ठिठक गया। “क्या आज भी अब्बा मुझे माफ़ नहीं करेंगे? क्या आज भी उसी बेग़ैरती के साथ मुझे फिर से घर से निकाल देंगे, जैसा उन्होंने आठ साल पहले किया था?” इससे पहले कि वह उस पुराने ज़ख़्म को कुरेदता, स्टेशन के पास किसी मस्जिद से उठती अज़ान की आवाज़ ने उसे थाम लिया—और दिल की गहराई से यह एहसास दिलाया कि आज तो ईद है, और ईद के दिन तो दुश्मन भी दोस्ती का हाथ बढ़ाता है, फिर वह तो अब्बा हैं—कब तक नाराज़ रहेंगे। चेहरे पर एक धीमी-सी मुस्कान लौट आई और अगले ही पल वह अपने साज़ो-सामान के साथ टैक्सी में बैठकर घर की ओर चल पड़ा।
वही रास्ते थे, वही डगर जिन पर कभी हम चला करते थे, मगर आज वे कुछ और ही लग रहे थे। स्टेशन से घर की दूरी भले ही दस किलोमीटर रही हो, पर आदिल को लगता था जैसे रास्ते हर पल और लंबे होते जा रहे हों। वह बस चाहता था कि जल्दी से अब्बू-अम्मी को देख ले, उन्हें गले लगा ले, पर आज समय भी जैसे थका-थका सा चल रहा था।
“अरे भैया, थोड़ा जल्दी चलाओ यार, कितना टाइम लगाओगे,” आदिल ने यह बात पाँच-छह बार ड्राइवर से कही होगी, और हर बार ड्राइवर बस मुस्कुरा देता था—शायद उसे पता था कि अपनों से मिलने की जल्दी क्या होती है।
“लो जी साब, बस आ गए . . . पाँच मिनट में आपका घर, हबीब महल्ला,” ड्राइवर की यह आवाज़ सुनते ही आदिल की ख़ुशी का ठिकाना न रहा। चेहरे पर उसने भले कुछ न जताया हो, पर भीतर जैसे तितलियाँ उड़ने लगी थीं। उसने कार का शीशा नीचे किया और एक लंबी साँस भरी—अपने शहर की ख़ुशबू से रूबरू होने का अपना ही मज़ा होता है। उसी पल उसकी नज़र बाहर एक गोश्त की दुकान पर पड़ी और उसने तुरंत ड्राइवर से गाड़ी रोकने को कहा, “ईद का जश्न है, और मैं बिना गोश्त के घर कैसे जा सकता हूँ?” ड्राइवर से थोड़ा इंतज़ार करने को कहकर वह दुकान की ओर बढ़ चला।
वह इलाक़ा हबीब महल्ला नहीं था, न वहाँ ज़्यादा मुसलमान नज़र आते थे—आज की ज़बान में कहें तो शायद वह हिंदुओं का महल्ला था। यूँ तो यह पूरा मुल्क अपना है, पर सियासत ने इसे हिंदू, मुसलमान, सिख, ईसाई और न जाने कितने टुकड़ों में बाँट दिया है। ख़ैर, वहाँ गोश्त की कई दुकानें थीं, पर आदिल ने उसी दुकान को चुना जिस पर उसकी नज़र कार से पड़ी थी। उसने पाँच किलो बकरे का गोश्त तैयार करने को कहा और इंतज़ार करने लगा।
यही वे गलियाँ थीं जिन पर उसका सारा बचपन बीता था।
“कितना वक़्त बीत गया है . . . हम बदल गए, सब बदल गए हैं, पर ये गलियाँ आज भी वैसी की वैसी हैं,” मुस्कुराते हुए उसके मन में यह ख़याल उतर आया।
गोश्त तैयार था, आदिल ने पैसे दिए और थैली थामे टैक्सी की ओर बढ़ा ही था कि अचानक उसके चारों ओर शोर का एक घेरा-सा बन गया; पंद्रह–बीस लोगों की भीड़, हाथों में डंडे और लोहे की छड़ें, कुछ के कंधों पर भगवा रंग के गमछे, माथों पर मोटे तिलक और होंठों पर एक ही आवाज़, जो हवा में काँप रही थी। आदिल कुछ समझ पाता, उससे पहले ही वह घेरे में आ चुका था, और किसी की निगाह सबसे पहले उसके गले में पड़े उस हरे धागे पर ठहर गई—जैसे अब इंसान की पहचान नाम से नहीं, रंगों और धागों से होने लगी हो।
“तुम मुसलमान हो?” भीड़ से किसी ने पूछा; आदिल ने सिर उठाकर देखा, उसकी आँखों में न डर था, न ग़ुस्सा—बस थकान और तमीज़ थी, “जी हाँ . . . पर क्यों?” उसने सलीक़े से कहा।
“इस शहर के नहीं लगते . . . कहाँ से आए हो?”
आदिल हल्की मुस्कान के साथ बोला, “भाईजान, मेरे पास इन सवालों का समय नहीं है . . . मैं देर से घर जा रहा हूँ, आप भी अपना समय ज़ाया मत कीजिए।”
वह टैक्सी की ओर मुड़ा ही था कि किसी ने उसका हाथ पकड़ लिया, “इन पैकेटों में क्या है?”
उसकी आवाज़ में अब थकान उतर आई थी, “मैं तमीज़ से बात कर रहा हूँ, इसका मतलब यह नहीं कि आप बदतमीज़ी पर उतर आएँ; आज ईद है, आप सबको ईद मुबारक . . . नमस्ते।”
वह पैकेट रखने झुका ही था कि भीड़ से एक आवाज़ गूँजी—“लगता है ये मुसलमान गौ-हत्यारा है, इसे जाने मत दो।” और फिर जैसे किसी मौन में अचानक आग लग गई; किसीने थैली छीनी और गोश्त सड़क पर बिखर गया, लाल और गीला, जैसे किसी सपने को कुचल दिया गया हो, और उस क्षण किसी ने यह जानने की कोशिश नहीं की कि वह क्या है, क्यों है—बस निर्णय हो चुका था। आदिल कुछ समझ पाता, उससे पहले ही शब्द टूट चुके थे और शोर बचा था; कुछ ही पलों में वह ज़मीन पर गिर पड़ा—न चीख़, न पुकार, बस एक देह जो अभी तक किसी की थी और अब सिर्फ़ एक चुप्पी थी; दस सेकंड से भी कम में एक पूरी ज़िंदगी ख़ामोशी में बदल गई, और फिर भी वह शोर थमा नहीं, जैसे डर को भी संतोष चाहिए होता है।
टैक्सी वाला भाग चुका था, दुकानों के शटर गिर चुके थे, खिड़कियाँ बंद थीं और दरवाज़ों के पीछे लोग साँस रोके बैठे थे; पूरा इलाक़ा “जय श्री राम” के नारों से गूँज रहा था—और बड़ी अजीब बात थी कि जिस नाम से कभी डर भागता था, आज उसी नाम से डर फैल रहा था; गली की दीवारें धीरे-धीरे लाल हो गईं, जैसे शहर ने अपनी चुप्पी से इस अपराध पर दस्तख़त कर दिए हों, और आधे घंटे तक आदिल की देह उसी सड़क पर पड़ी रही—न कोई रोया, न कोई झुका, न किसी ने पूछा कि वह कौन था; जब उसके ही समुदाय के कुछ लोग पहुँचे तो उन्हें यह कम दुख था कि एक इंसान मरा है और ज़्यादा यह कि वह मुसलमान था और मारने वाले दूसरे धर्म के—और तभी हवा में एक सवाल काँप उठा, क्या इंसानियत धर्म से छोटी हो गई है?
भीड़ धीरे-धीरे बढ़ने लगी थी और बातें भी—तरह-तरह की, बिखरी हुई, खोखली और बेबस; हमेशा की तरह पुलिस बहुत बाद में पहुँची, जब सब कुछ हो चुका था। सिटी डीएसपी सिंह साहब आए और पूछताछ करने लगे, पर किसी ने कुछ भी कहने से इंकार कर दिया—सबने देखा था, पर किसी ने “देखा” नहीं था। सिंह साहब भले आदमी थे, पूरे इलाक़े में उनकी इज़्ज़त थी, फिर भी सच जैसे हर ज़बान पर आते-आते रुक गया। आदिल का चेहरा इतना बिगड़ चुका था कि उसके चौबीस-पच्चीस साल के होने का अनुमान भी मुश्किल हो गया था; पहचान के लिए जब उसके बैग की तलाशी ली गई तो ड्राइविंग लाइसेंस और आधार कार्ड ने सिंह साहब को जैसे भीतर तक हिला दिया।
सिंह साहब सुन्न खड़े रहे। तभी उनकी नज़र टैक्सी की पिछली सीट पर पड़ी। वहाँ सामान के बीच एक छोटी सी, भगवा जिल्द वाली किताब पड़ी थी। सिंह साहब ने काँपते हाथों से उसे उठाया। वह ‘श्रीमद्भगवद्गीता’ थी। जिल्द पुरानी हो चुकी थी, लेकिन सिंह साहब ने उसे देखते ही पहचान लिया। यह वही पॉकेट-साइज़ गीता थी जिसे दस साल पहले उन्होंने जेल की कालकोठरी में एक भटके हुए बच्चे को ‘इंसान’ बनने के लिए दिया था। उन्होंने काँपते हाथों से किताब का पहला पन्ना पलटा। वहाँ उनकी ख़ुद की धुँधली पड़ चुकी लिखावट में लिखा था—“आदिल को, स्वयं की खोज के लिए-सिंह साहब, 2016।”
इतना देखते ही सिंह साहब का कलेजा मुँह को आ गया। वर्दी का वह सख़्त पर्दा, जो बरसों की ड्यूटी ने उनकी आँखों पर डाल रखा था, अचानक तार-तार हो गया। उनके आँसू बिना किसी आवाज़ के, गर्म लावा की तरह बहने लगे। वे वहीं सड़क पर आदिल की देह के पास बैठ गए। जिस किताब से उन्होंने आदिल को मानवता सिखाई थी, उसी किताब का नाम लेने वालों ने आज आदिल को मार दिया था।
सच उनकी आँखों के सामने था, पर उनका मन इसे मानने को तैयार नहीं था। एक आख़िरी उम्मीद में कि शायद यह कोई भयानक सपना हो, उन्होंने काँपते हाथों से गुजरात अपने बहनोई गोपीनाथ को फोन लगाया। उधर से आवाज़ आई, “हेलो भाई साहब, नमस्कार . . . क्या हाल-चाल? आज ईद के दिन कैसे याद किया?”
सिंह साहब की आवाज़ गले में ही फँस गई। वे चाहकर भी यह नहीं पूछ पाए कि आदिल कहाँ है, क्योंकि आदिल तो उनके सामने लहूलुहान पड़ा था। उन्होंने बस इतना पूछा, “गोपीनाथ . . . क्या आदिल मुजफ्फरपुर के लिए निकल चुका है?”
जवाब आया, “हाँ भाई साहब, वह तो कल ही निकल गया था। अब तक तो आपके पास पहुँच भी गया होगा। क्या बात है भाई साहब? आपकी आवाज़ इतनी भारी क्यों लग रही है?”
सिंह साहब के पास इस सवाल का कोई जवाब नहीं था। उन्होंने बिना कुछ कहे फोन काट दिया। अब कोई शक बाक़ी नहीं था। वह 'इंसान' जिसे उन्होंने दस साल पहले गढ़ा था, आज नफ़रत की भेंट चढ़ चुका था।”
जैसे-तैसे ख़ुद को सँभालते हुए, सिंह साहब ने पास खड़े हवलदार को देखा। हवलदार उनकी आँखों के आँसू और चेहरे की तड़प देखकर सहम गया था। सिंह साहब ने भारी आवाज़ में आदेश दिया, “पंचनामा तैयार करो . . . और बॉडी को तुरंत पोस्टमॉर्टम के लिए भेजो।”
आदिल के सारे काग़ज़ात समेटकर अपनी जीप की ओर बढ़े ही थे कि पीछे से एक धीमी-सी आवाज़ आई—“सिंह साहब . . . कौन था ये शख़्स?”
सिंह साहब को उस आवाज़ की पहचान-सी थी, फिर भी वे नहीं चाहते थे कि उनका अंदाज़ा सही निकले। उन्होंने पीछे मुड़कर देखा तो एक बूढ़ा, लचर-सा आदमी खड़ा था, जिसकी आँखों में उम्र से ज़्यादा थकान थी। वह बोला, “अल्लाह की सौगंध, सिंह साहब . . . ऐसा कुकर्म, वो भी आज ईद के दिन . . . हमें अपने आप पर शर्म आती है कि हम सब जश्न मना रहे थे और हमसे कुछ ही दूरी पर यह बच्चा इतनी बेदर्द मौत का शिकार हो गया, और हम कुछ न कर पाए।”
इस बार सिंह साहब की आँखों पर पड़ा वह पर्दा उठ चुका था; आँसुओं को रोक पाना अब नामुमकिन था, सो वे भी रो पड़े। कुछ क्षणों के लिए वे अपनी वर्दी भूल गए, फिर ख़ुद को सम्हालते हुए उस बूढ़े आदमी के पास गए, एक हाथ उसके कंधे पर रखा और बस इतना कहा, “करीम साहब, आप घर जाइए।” और यह कहते ही वे अपनी जीप की ओर चल पड़े—उस लचर से दिखने वाले बूढ़े आदमी को वे कैसे बताते कि वह शख़्स और कोई नहीं, बल्कि उनका अपना बेटा, आदिल है। आज सिंह साहब उससे भी ज़्यादा लाचार नज़र आ रहे थे। जिसने आठ साल से अपने बेटे को नहीं देखा था, आज उसके सामने उसी बच्चे की ऐसी चिथड़ी पड़ी देह थी और वह उसे पहचान भी नहीं पा रहा था। जैसे-तैसे सिंह साहब जीप में बैठे और थाने की ओर चल पड़े। सब-इंस्पेक्टर नादिर ख़ान, जो गाड़ी चला रहे थे, सिंह साहब के दर्द को भाँपने में देर नहीं लगाई और कारण जानना चाहा, जीप की खिड़की से बाहर भागती सड़क को देखते-देखते सिंह साहब की आँखें जैसे वर्तमान से फिसलकर अतीत में उतर गईं। आवाज़ें धुँधली होने लगीं, इंजन की गड़गड़ाहट किसी दूर की गूँज में बदल गई, और समय उन्हें दस साल पीछे खींच ले गया।
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यह उस रोज़ की बात है जब मैं जुवेनाइल सेंट्रल जेल का जेलर हुआ करता था; सुबह की धुँध अभी पूरी तरह छँटी नहीं थी और जेल का आँगन नीली-सी ठंडी रोशनी में डूबा हुआ था, मैं सेंट्रल हॉल में हाथ पीछे बाँधे उस गेट की ओर देख रहा था जहाँ से क़ैदियों की गाड़ी आने वाली थी, तभी दूर से लोहे के पहियों की आवाज़ सुनाई दी और कुछ ही पलों में वह गाड़ी मेरे सामने आकर रुकी, इंजन की घरघराहट थमी और सन्नाटा फैल गया। एक-एक कर वे उतरे—चेहरे सख़्त, आँखें बेरहम, कंधों पर अपराध का बोझ साफ़ दिखता था, ये वही लोग थे जिन्होंने हमारे राज्य के एक मंत्री की हत्या की कोशिश की थी—पर तभी सब कुछ जैसे थम गया, क्योंकि सबसे आख़िर में उतरा एक दुबला-सा पंद्रह साल का लड़का, चेहरा साफ़ और भोला, आँखों में डर से ज़्यादा जिज्ञासा थी, हाथों में बेड़ियाँ थीं पर उन बेड़ियों में उसकी मासूमियत क़ैद नहीं हो पाई थी। वह इधर-उधर देख रहा था—जेल की ऊँची दीवारें, सीलन भरी सलाखें, सिपाहियों की ख़ामोश चालें—सब कुछ ऐसे जैसे किसी अनजाने शहर में पहली बार आया हो; कभी अपनी बेड़ियों को देखता, कभी दूसरे क़ैदियों की ओर हल्की-सी मुस्कान उछाल देता, जैसे वह किसी मेले में आ गया हो, क़ैद में नहीं। मैं उसे देखता रह गया, हैरान कि जैसे उसे अपने किए का कोई इल्म ही न हो, जैसे अपराध ने उसके भीतर अभी घर ही न किया हो—वही था आदिल, जिसे मैंने पहली बार देखा था। यह जेल हर दूसरे दिन किसी न किसी नाबालिग़ को निगलती है, क़ानून हमें उन्हें दो-तीन साल से ज़्यादा रोकने नहीं देता, पर हमारे लिए वे साल सज़ा के नहीं, सम्भावना के होते हैं—कि शायद इन दीवारों के बीच कोई टूटा हुआ बच्चा फिर से इंसान बन सके, और उसी सुबह मुझे पहली बार लगा था कि शायद आदिल बचाया जा सकता है।
आदिल की फ़ाइल पढ़ने के बाद मुझे यह समझने में देर नहीं लगी कि वह अपराधी से ज़्यादा बेबसी का मारा हुआ था। उसका परिवार इतना ग़रीब था कि पढ़ाई उसके जीवन में टिक नहीं पाई; बीच रास्ते ही छूट गई, और वह मदरसे में छोटे-मोटे काम कर लिया करता था, बदले में कुछ सिक्के मिल जाया करते थे—वही सिक्के, जिनसे उसकी भूख और उसके सपने दोनों टाले जाते थे। ऐसे ही एक समय में किसी संगठन ने उसे बहका लिया; थोड़े पैसों का लालच और वही घिसी-पिटी, घिनौनी तालीम उसके भीतर बैठा दी गई कि “ईश्वर के नाम पर किसी ग़ैर-मुस्लिम को मारना जिहाद होता है।” और इस तरह, उसके कोमल मस्तिष्क में हिंसा को धर्म का नाम दे दिया गया।
वह और कुछ नहीं था—बस ग़रीबी और सही शिक्षा से वंचित एक चौदह साल का बच्चा, और कुछ नहीं। उस पूरे प्रकरण में आदिल की भूमिका भी उतनी ही छोटी और उतनी ही भयावह थी—मंत्री जी जैसे ही अपने काफ़िले के साथ घर से निकलते, आदिल को फ़ोन कर सूचना देनी थी, और नीचे पुल के पास छिपे लोग विस्फोट की तैयारी में रहते। पर इससे पहले कि कोई बड़ा अनर्थ घटता, कुछ सजग अंगरक्षकों की सूझबूझ ने उसे रोक दिया। जाँच हुई, सब पकड़े गए, और जब फ़ोन कॉल की परतें खुलीं, तो चौदह साल का आदिल भी उस जाल से बच न सका।
शुरूआत में आदिल किसी से बात नहीं करता था, न किसी सवाल का जवाब देता था। उसके भीतर “जिहाद” शब्द इस तरह बैठ गया था, जैसे कोई कठोर पत्थर दिल की जगह रख दिया गया हो; उसे अगर फाँसी भी हो जाती, तो शायद उसे कोई मलाल न होता। मैं जानता था कि उसे यहाँ केवल दो वर्ष रहना है, और यदि इन दो वर्षों में उस पर ध्यान न दिया गया, तो वह सिर्फ़ एक जिहादी बनकर रह जाएगा—और उसकी पूरी ज़िंदगी यूँ ही नफ़रत की आग में गल जाएगी। एक दिन मैंने उसे अपने कमरे में बुलाया। जेलर को अपने क़ैदियों के साथ सख़्ती से पेश आना पड़ता है, वर्दी की गरिमा बनाए रखने के लिए—और शायद इसी कारण जेल का हर बच्चा मुझसे डरता था; पर इंसानियत भी तो हमारे भीतर साँस लेती है, और बच्चों के सामने दरियादिली दिखाने में हमें कभी संकोच नहीं हुआ।
“क़ुरान पढ़ा है?” मैंने उससे पूछा।
“जी . . . है, ” उसने सिर झुकाए, थोड़ी घबराहट के साथ कहा।
“क्या समझ में आया?”
वह चुप रहा। कुछ देर बाद बहुत धीमे से बोला—“जिहाद।”
यह सुनकर मुझे अपने देश की व्यवस्था पर ग़ुस्सा आया—हम कितने असफल हैं कि अपने ही बच्चों की परवरिश उन्हें इंसान बनाना नहीं सिखा पाती, और कुछ गिनती के वहशी लोग हमारे उजले भविष्य को लूट ले जाते हैं। मैंने ख़ुद को शांत किया और उससे पूछा, “तुम जिहादी क्यों बनना चाहते हो?”
वह फिर चुप हो गया। उसकी निगाह मेरे मेज़ पर रखे उस गोल काँच के पेपरवेट पर टिक गई, जिसमें से छनती रोशनी की रेखाएँ धीरे-धीरे नीचे गिर रही थीं—ठीक वैसे ही जैसे आदिल का बचपन इस जेल की तपिश में पिघलता जा रहा था। मैंने उसे पास बुलाया, अपने बग़ल में बैठाया और उसके अब्बू-अम्मी, उसके घर और उसकी गलियों की बातें कीं; वही समझाइश दी जो मैं और बच्चों को देता आया हूँ। फिर मैंने उसे गीता दी और कहा कि इसे अपने पास रखो—शायद इसमें उसे वह भाषा मिल जाए, जो नफ़रत से नहीं, मनुष्यता से बात करती है।
मैंने कई दिनों तक उसे दूर से देखा, जैसे कोई चुपचाप किसी टूटे पत्ते के फिर से हरा होने की प्रतीक्षा करता है। जो गीता मैंने उसके हाथों में दी थी, वह शुरूआत में उसके सेल की दीवार से लगी एक शेल्फ़ पर धूल खाती रही, जैसे किसी ऐसे सच की प्रतीक्षा कर रही हो जिसे अभी समझा जाना बाक़ी हो। पर मैं निराश नहीं हुआ, क्योंकि मैं उसे बदलना चाहता था—उसकी सोच को, उसके भीतर बसे अँधेरे को, और इस देश तथा समाज के प्रति उसके कर्तव्य-बोध को। शायद उसे भी यह आभास होने लगा था कि मैं उसे साधारण क़ैदी नहीं समझता, और सम्भव है कि इसी कारण वह मुझे थोड़ा अपना मानने लगा था।
एक रात, जब जेल की गलियों में आधी-अधूरी रोशनी गिर रही थी और सन्नाटा साँस ले रहा था, मैंने उसे देखा—सलाखों के पार से आती फीकी रोशनी में सिर टिकाए वह मेरी दी हुई गीता के पन्नों में झुका हुआ था, जैसे कोई अपनी खोई हुई भाषा को फिर से पढ़ना सीख रहा हो। मैं कुछ कहे बिना लौट आया, क्योंकि कुछ दृश्य बोलते नहीं, बस भीतर उतर जाते हैं। इसके बाद वह धीरे-धीरे पढ़ने लगा, समझने लगा। अब वह अक्सर मेरे कमरे में आता, गीता के श्लोकों के अर्थ पूछता, और मैं उन्हें उसके जीवन से जोड़कर समझाता—बहुत धीरे, बहुत सलीक़े से, जैसे किसी घायल पंछी को उड़ना सिखाया जाता है। दो साल यूँ ही बीत गए, और मुझे पता भी न चला कि कब आदिल बदल गया। वह अब वह लड़का नहीं रहा था जो नफ़रत में भटका था; गीता की शीतल छाया में उसकी आत्मा ने नया आकार ले लिया था। अब वह एक नेक, ईमानदार और कर्तव्यनिष्ठ मनुष्य बन चुका था—समाज में अपनी दूसरी यात्रा शुरू करने के लिए तैयार।
मेरे पैर छूकर और मुझे कृतज्ञता से भर कर आदिल जेल से सीधे अपने घर की ओर चला था, यह सोचते हुए कि शायद अम्मी-अब्बू उसके बचपन की भूलों को भुला चुके होंगे और वह फिर से एक नई शुरूआत कर सकेगा। पर शायद घर के रास्तों ने उसका इंतज़ार करना अब जैसे छोड़ ही दिया था। अम्मी और अब्बू नहीं माने और बड़ी बेदर्दी से उसे घर से निकाल दिया गया—शायद उनके लिए भी देशद्रोह ही सबसे बड़ा जुर्म था, ऐसा जुर्म जिसके आगे हर रिश्ता छोटा पड़ जाता है। उसी रात आदिल मेरे घर आया; मैंने उसकी आँखों में वह दर्द देखा जो अपनी जगह बनाने के लिए उसके आँसुओं से लड़ रहा था। हारा और थका हुआ आदिल कुछ बोल न सका, बस आकर मुझसे लिपट गया और एक छोटे बच्चे की तरह फूट-फूट कर रो पड़ा। उसने बस इतना कहा कि वह कुछ करना चाहता है, कुछ बनना चाहता है, ताकि फिर कभी अपने घर लौट सके, अपने उस महल्ले में जा सके जो अब शायद उसे अपनाने से इनकार करता है। आदिल दुखी था, पर टूटा नहीं था—और यही बात मुझे सबसे अच्छी लगी। अगले ही दिन मैंने उसे कुछ पैसे दिए, ट्रेन की टिकट कराई और अहमदाबाद भेज दिया अपने बहनोई के पास, जो बड़े सज्जन पुरुष थे और हीरे के बड़े व्यापारी थे, इसलिए मुझे विश्वास था कि वे आदिल की कुछ मदद करेंगे, और सचमुच उन्होंने उसे अपने पास नौकरी पर रख लिया।
धीरे-धीरे आदिल ने काम में महारत पा ली थी और उसे इस तरह बदलते देख मेरे भीतर कहीं बहुत गहरे एक मौन-सी तसल्ली उतर आई थी, जैसे जिन राहों की ओर मैंने उसे मोड़ा था वे अब उसकी ज़िंदगी की मंज़िल बन चुकी हों। वह मेरा बहुत सम्मान करता था; हर दूसरे दिन उसका फ़ोन आ जाता और वह अपनी हर उलझन, हर ख़ुशी मेरे साथ बाँट लेता था, क्योंकि इस दुनिया में मेरे सिवा उसका अपना और था ही कौन। तीन वर्षों में वह इतना सक्षम हो गया था कि अब अपने पिता का सहारा बन सकता था, उसने कई बार उनसे बात करने की कोशिश की, पर हर बार वे उसे “आतंकवादी” कहकर फ़ोन काट देते थे, जैसे शब्दों की वह चोट उसके सीने पर बार-बार रख दी जाती हो। तब उसने मेरे ज़रिये अपने अब्बू के बैंक खाते का पता किया और हर महीने पंद्रह हज़ार रुपये भेजने लगा—बिना कोई शिकायत किए, बिना कोई अपेक्षा रखे। शुरूआत में उसके अब्बू ने इस पर बहुत बुरा-भला कहा और उन पैसों को छूने से भी इनकार कर दिया, पर जब मैंने उन्हें समझाया कि आदिल अब बदल चुका है और यह उसकी ईमानदार मेहनत की कमाई है, तब जाकर उन्होंने वे पैसे स्वीकार किए, मगर उससे बात करने की हिम्मत आज तक नहीं जुटा सके, और इस तरह पैसों की वह ख़ामोश आवाजाही एक ऐसे रिश्ते की कहानी बन गई जिसमें मोह था पर मुलाक़ात नहीं थी, प्यार था पर स्वीकार नहीं था—यही सिलसिला चुपचाप चलता रहा।
गीता का वही पाठ था जिसने उसकी आत्मा को अध्यात्म की राह पर मोड़ दिया। मुसलमान होकर भी वह हिंदू धर्म की उदात्तता से गहरे प्रभावित था। उसने हर मज़हब के लिए काम किया, हर इंसान को अपनाया। क़ुरान और गीता उसके लिए जैसे दो आँखें थीं, जिनसे वह इंसानियत को देखता और समझता था। मेरे बहनोई जी से मुझे ज्ञात हुआ कि उस पूरे इलाक़े में आदिल ही एक ऐसा शख़्स था जो हर धर्म को मानता, हर त्योहार को उत्सव की तरह जीता और ख़ुशियाँ बाँटता फिरता था। इसी कारण उसके नाम में अब इज़्ज़त घुल गई थी। लोग उसकी सादगी और धर्मनिरपेक्षता की मिसाल देते थे। शायद वह धर्म से मुसलमान था, पर कर्म से इंसान बन चुका था।
यह सब बोलते-बोलते सिंह साहब की आँखें दगदगा सी गईं। जीप अब पुलिस स्टेशन पहुँच चुकी थी। थाने का कमरा अजीब-सी ख़ामोशी से भरा हुआ था। बाहर सायरन की आवाज़ें थीं, काग़ज़ों की सरसराहट थी, फोन की घंटियाँ थीं—पर सिंह साहब के भीतर सब कुछ जैसे थम गया था। सिंह साहब अपने कमरे में बैठे हुए अपनी और आदिल की वह आठ साल पुरानी तस्वीर देख रहे थे जिसमें वह जेल से बाहर आते समय हल्की-सी मुस्कान के साथ एक नई ज़िंदगी का सपना आँखों में लिए खड़ा था। आज उसी मुस्कान को धर्म की उन्मादी चीख़ों ने रौंद दिया था। जिस गीता के श्लोक उन्होंने आदिल को सुनाए थे, जिनसे उन्होंने उसे हथियार नहीं, इंसान बनना सिखाया था उसी गीता को अपनी बपौती मानने वाले धर्म के चंद ठेकेदारों ने आज उसकी जान ले ली थीं। इस गहरे बोझ ने न केवल सिंह साहब के कंधे तोड़े बल्कि उनका आत्मसम्मान भी दब गया। आँखें अनायास ही भर आईं। यह अपराधबोध का आँसू था, सिंह साहब को उस बूढ़े आदमी पर तरस आ रहा था, जिसने कभी अपने बेटे को न तो माफ़ किया और न ही कभी उससे मिलने की ज़हमत उठाई। पर हर महीने अपने बैंक खाते में 15,000 रुपये देखकर वे इस बात से तसल्ली कर लिया करते थे कि जो भी है, जैसा भी है, उनका आदिल ज़िंदा तो है।
सिंह साहब शायद आदिल की मौत का ज़िम्मेदार अपने आप को मान चुके थे। सिंह साहब ने धीरे से मोबाइल उठाया। उँगलियाँ काँप रही थीं, जैसे हर बटन दबाने के साथ वे किसी अंतिम संस्कार की तैयारी कर रहे हों। उन्होंने तुरंत नेट बैंकिंग से आदिल के पिताजी के अकाउंट में इस महीने के 15,000 रुपये जमा करा दिए। “ट्रांसफ़र सक्सेसफुल।” स्क्रीन पर उभरे इन दो शब्दों को वे देर तक देखते रहे, फिर मोबाइल रख दिया और आँखें मूँद लीं। उस पल उन्हें लगा कि उन्होंने आदिल को फिर से नहीं बचाया, पर उसे मरने भी नहीं दिया। कम से कम उस बूढ़े पिता की दुनिया में आदिल अब भी साँस ले रहा था, अपने बैंक खाते में 15,000 रुपये देखकर उन्हें इस बात की तसल्ली हो जाएगी कि “जो भी है, जैसा भी है, उनका आदिल ज़िंदा तो है।”
शायद . . . कभी-कभी किसी को ज़िंदा रखना उसे बचाने से ज़्यादा ज़रूरी हो जाता है।