चुनौती

15-07-2026

चुनौती

भगवान अटलानी (अंक: 301, जुलाई द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)

 

तीन-चार दिनों से स्वास्थ्य ठीक नहीं था कमलेश जी का। दिन में कई-कई बार शौचालय जाना पड़ रहा था। उनमें से कुछ बार शौच में ख़ून आ रहा था। साँस की तकलीफ़ बढ़ रही थी। बार-बार हिचकियाँ आ रहीं थीं। गर्मी के मौसम के बावजूद ठंडक महसूस हो रही थी। जी मिचला रहा था इसलिए ढंग से खा-पी नहीं रहे थे।

स्वास्थ्य बीमा कराया हुआ था। बढ़ी उम्र के तक़ाज़े थे। स्थितियाँ अनुकूल नहीं थीं या कहें दिन-प्रतिदिन विपरीत होती जा रहीं थीं। पत्नी, बच्चे उनकी हालत देखकर बार-बार अस्पताल चलने और डॉक्टर को दिखाने के लिए कह रहे थे। अपनी तकलीफ़ न बताने का स्वभाव प्रत्येक आग्रह को मुस्कुराकर टाल देता था। बिस्तर पर दोपहर को आराम करने और रात को सोने के अलावा कभी बिस्तर पर न जाने वाले कमलेश जी को बीच-बीच में लेटना पड़ता था। चेहरे की रंगत जैसे ग़ायब हो गई थी। अन्दर से सब कुछ सामान्य नहीं था इसलिए हमेशा की तरह प्रफुल्लित न दिखाई देकर वे चुप रहने लगे थे। जितना थोड़ा-बहुत बोलते थे उसमें चिड़चिड़ाहट साफ़ झलकती थी।

तभी एक दोपहर मोबाइल पर सूचना आई कि भारत सरकार ने कमलेश जी को प्रतिष्ठित सम्मान देने का निर्णय लिया हैं। पंद्रह दिनों के बाद राजधानी में उपस्थित होने का आमंत्रण भी उन्हें मिला। सरकारी साइट पर यह ख़बर पोस्ट की गई थी। थोड़ी देर बाद से ही अपने नगर और देश के विभिन्न स्थानों से फोन, व्हाट्सएप पर संदेश आने लगे। कुछ प्रसन्नता के कारण, कुछ प्रत्युत्तर देने के अपने सिद्धांत के कारण और कुछ उपलब्धि से अहंकारी न दिखाई देने की सोच के कारण आराम भूलकर वे निरंतर संलग्न रहे। सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा था। ग्यारह बजे रात तक परिचित, अपरिचित स्वर दिखाई सुनाई देते रहे। जाने, अनजाने व्यक्तियों के संदेश आते रहे। सोने के बाद भी नींद उखड़ी-उखड़ी रही।

दूसरे दिन समाचार पत्रों ने ख़बर उन तक भी पहुँचा दी जिन्होंने सरकारी साइट नहीं देखी थी। सुबह होते ही फोन और संदेश आने का क्रम फिर आरंभ हो गया। कमलेश जी बमुश्किल नहा-धो पाए। जितना थोड़ा-बहुत खाने, पीने की स्थिति थी वह भी बाधित हो गई। एक तरफ़ रात की नींद की कमी, दोपहर आराम न हो पाने की विवशता और आवाज़ से भी बेचारा महसूस न होने देने की ज़िद थी। दूसरी तरफ़ बढ़ती थकावट, शारीरिक स्थिति में अधिक गिरावट का एहसास और घर के सदस्यों के सामने सामान्य दिखाई देने का अभिनय था। परिणाम यह हुआ कि रात को लेटने के बाद रोकते-रोकते भी वे वाश बेसिन तक नहीं जा पाए, बिस्तर पर ही उल्टी हो गई। पत्नी ने उल्टी देखी और घबरा गई, बिस्तर के साथ फ़र्श पर पेट से निकली लाल रंग की गंदगी बिखरी हुई थी। रुआँसे स्वर में मानो प्रलाप किया हो पत्नी ने, “इतनी बार कह चुकी हूँ, अस्पताल चलिए, अस्पताल चलिए। नौबत ख़ून की उल्टी तक आ गई हैं।”

कमलेश जी चुपचाप उठे। कपड़े ख़राब हो चुके थे। वाश रूम में जाकर कुर्ता-पायजामा उतारा। पहले कई बार कुल्ला और फिर गरारे किये। बाहर आये, पत्नी के निकाले कपड़े पहने और हाँफते हुए बिस्तर पर लेट गए। पत्नी ने बेटे से आदेशात्मक स्वर में कहा, “गाड़ी निकालो। इन्हें अस्पताल ले चलो।”

“अभी नहीं, सुबह चलेंगे।” ऐसी हालत में भी कमलेश जी के होंठों पर कमज़ोरी से सनी मुस्कान थी। करवट बदलकर उन्होंने मुँह दीवार की तरफ़ कर लिया। पत्नी और बेटा आग्रह करते रहे मगर अनसुना करके वे चुपचाप लेटे रहे।

सारी रात हिचकियों और साँस की तकलीफ़ का सामना करते हुए शौचालय के चक्कर लगाते रहे। सुबह होते-होते कमलेश जी को अहसास हो गया कि अब हालत बरदाश्त से बाहर जा रही है। अस्पताल में जाने की बात कहकर उन्होंने पत्नी से ज़रूरी कपड़े आदि शोल्डर बैग में रखने के लिए कहा।

अस्पताल में इमरजैन्सी, आइसीयू और प्राइवेट रूम से होते हुए नौवें दिन जब वे घर लौटे तो सम्मान समारोह की तारीख़ मात्र चार दिन दूर थी। अस्पताल प्रवास के दौरान कभी पत्नी और कभी बेटा साथ रहे। जो साथ होता था, कमलेश जी का फोन उसी के पास रहता था। कोई विशेष संवाद होता था तो उन्हें बता दिया जाता था। लगातार सूचना मिलती रही कि सम्मान के उपलक्ष्य में किस किसके बधाई के फोन आ रहे हैं? हाल-चाल पूछने के लिए मित्र और स्वजन आ रहे थे। कमलेश जी स्वास्थ्य की दृष्टि से अनुकूल महसूस करते तो बात करते अन्यथा शिष्टाचार संवाद के बाद आँखें बंद कर लेते। पत्नी या बेटा आगुंतकों से बात करते रहते। ड्रिप और नेबूलाइज़ेशन के कारण करवट दूसरी ओर बदलना सम्भव नहीं था। सीधा लेटे-लेटे, आँखें बंद होने के बावजूद बातचीत पूरी तरह उनको सुनाई देती थी।

एक शाम दो मित्र हाल-चाल पूछने के लिए अस्पताल आए। कमलेश जी ख़ामोश थे। बेटे और मित्रों के बीच हो रही बातचीत वे लेटे-लेटे सुन रहे थे। स्वास्थ्य की वर्तमान स्थितियों, सम्मान समारोह में जाने न जाने के बारे में चर्चा चल रही थी। तभी एक मित्र ने कहा, “मैं दावे से कह सकता हूँ कि अगर एक दिन पहले भी इसे अस्पताल से छुट्टी मिल गयी तो यह सम्मान समारोह में ज़रूर जाएगा।” कमलेश जी ने आँखें खोलकर मित्र को देखा। उसके चेहरे पर व्यंग्य से सराबोर कुटिल मुस्कान थी। दूसरे मित्र ने पूछा, “कैसे कह सकते हो तुम इतने दावे के साथ?”

“मैं इसकी नस-नस पहचानता हूँ। सम्मान समारोह में न जाये, ऐसा हो ही नहीं सकता।” मित्र के लहजे से मज़ाक उड़ाने के तत्त्व वायुमंडल में तैर गए।

इस दौरान कमलेश जी की आँखें बंद थी। चेहरे पर मुस्कान थी। मित्र की बात सुनते ही महसूस हुआ, उन्हें खौलते तेल की कड़ाही में डाल दिया गया है। मित्र के मस्तिष्क में भी प्रचार के लिए सब कुछ कर गुज़रने वाले व्यक्ति की छवि है क्या मेरी? विशेषताएँ भुलाकर उसे याद रही तो केवल यही बात? सम्मान मिलने की प्रसन्नता के स्थान पर मित्र के मन में अन्य सांसारिक प्रदूषण उमड़ रहे हैं तो आख़िर क्यों? क्या वे स्वयं अपने व्यवहार से यही प्रदर्शित और प्रमाणित करते हैं सदैव? प्रत्येक घटना को महत्त्व बढ़ाने की सीढ़ी बनाने का उपक्रम करते हैं क्या वे? आत्मग्लानि और आक्रोश की आँधी चल रही थी कमलेश जी के मन में। मित्र अगर इस छवि को लेकर जीते हैं तो कहीं कमलेश जी भी ज़रूर ज़िम्मेदार होंगे इसके लिए। उनके व्यवहार से ऐसी प्रतीति हुई होगी जिसने मित्रों की दृष्टि में प्रचार और प्रसिद्धि के लिए कुछ भी करने के लिए तैयार व्यक्ति की छवि निर्मित की होगी। आक्रोश इसलिये क्योंकि दीर्घकाल तक साहचर्य के बावजूद मित्र उनका सही आकलन नहीं कर पाये थे।

नहीं जाएँगे सम्मान समारोह में! ग़लत साबित करेंगे मित्र के दावे को। सिद्ध कर देंगे कि मित्र का आकलन ठीक नहीं था। जब पुराने मित्र की धारणा ही दोषपूर्ण है तो दूसरे लोग क्या सोचते होंगे उनके बारे में? सार्वजनिक छवि एक अति महत्त्वाकांक्षी मात्र की नहीं, यश लोलुप इंसान की होगी उनकी। यदि अब तक नहीं समझ पाए हैं इस बात को तो अब दुरुस्त करेंगे समारोह में न जाकर। दिखा देंगे कि इतने बड़े सम्मान के लिए आयोजित समारोह में नहीं जाने की मनोवृत्ति किसी प्रचार के पीछे दौड़ने वाले व्यक्ति की नहीं हो सकती। नहीं करेंगे इस मिथ्या छवि का पोषण। नहीं जाएँगे सम्मान समारोह में! करेंगे मित्र को ग़लत साबित!!

यह फ़ैसला ले तो लिया। उस पर टिके रहने का निश्चय भी कर लिया। मगर कुछ था जो चुभ रहा था। कमलेश जी को समझ में नहीं आ रहा था कि सचमुच कौन-सी बात है जो चुभ रही है? जाना चाहिए, कौन क्या कहता सोचता है, इसकी चिंता नहीं करनी चाहिए या लोग क्या कहते हैं इसे महत्त्वपूर्ण मानना चाहिए? लोग क्या कहते हैं इसकी चिंता कमलेश जी ने कभी नहीं की आज तक। स्मृति पर ज़ोर डाले बिना ही अनेक उदाहरण मिल जाएँगे जब परनिंदा की परवाह नहीं की उन्होंने। अब लोग क्या कहेंगे-सोचेंगे, इससे अधिक विचारणीय बिंदु है, पुराने मित्रों की उनके बारे में क्या धारणा है? कमलेश जी की मान्यता है, मित्रों की जगह कम महत्त्वपूर्ण नहीं है जीवन में। वे अपनों से भी ज़्यादा अपने होते हैं। इसलिये उनके हर क़दम, उनके प्रत्येक विचार का प्रभाव दूरगामी होता है। जिनसे रिश्तों को बनाए रखना चाहिए, कैसे रखा जा सकता हैं उन्हें धारणा के दायरे से बाहर? कैसे दरगुज़र किया जा सकता है उनकी मज़ाक तक में की गई टिप्पणी को भी? सम्मान समारोह में जाकर कमलेश जी पुष्ट करेंगे उस धारणा को जो मित्र के मानस की किसी परत में उनके प्रति आसन बनाकर बैठी हैं। मित्र को किसी और की श्रेणी में रखकर वे प्रकारांतर से उनको लेकर किए गए ग़लत आकलन को सत्य सिद्ध करेंगे। नहीं, ऐसा नहीं करेंगे। नहीं जाएँगे वे सम्मान समारोह में।

अस्पताल से लौटे तो सम्मान समारोह की तारीख़ केवल चार दिन दूर थीं। आयोजकों को जानकारी थी कि कमलेश जी अस्पताल में हैं। पत्नी से ही सही, आयोजक नियमित रूप से फोन करके हालचाल पूछ रहे थे। अस्पताल से लौटते ही आया उनका फोन कमलेश जी ने उठाया। कमज़ोरी आदि की चर्चा तो उन्होंने की मगर स्पष्ट रूप से नहीं कहा कि वे सम्मान समारोह में उपस्थित होने में असमर्थ हैं।

अगला दिन। सम्मान समारोह तीन दिनों के बाद है। सुबह उठकर बिस्तर पर बैठे-बैठे चाय की चुस्कियाँ लेते हुए वे अख़बार पर नज़र दौड़ा रहे हैं। प्रथम पृष्ठ को सरसरी निगाह से देखकर, अख़बार पलटकर वे अंतिम पृष्ठ देखते हैं। ऊपर छपी पहली ख़बर देखकर वे मीडिया के समाचार चयन पर मन ही मन कुपित होते हैं। हत्या, ज़मीन विवाद, बलात्कार, धोखाधड़ी और लड़ाई-झगड़े को इतनी प्राथमिकता देकर क्यों छापते हैं ये लोग? नकारात्मक समाचार पढ़ो और वह भी सुबह उठते ही, कुछ अच्छा करने की प्रेरणा कहाँ से मिलेगी किसी को? सिर झटककर वे फिर अख़बार पर नज़र डालते हैं।

ज़ायक़ा थोड़ा ख़राब हो जाने के बावजूद कमलेश जी ज़मीन-विवाद में हुई हत्या का समाचार पूरा पढ़ जाते हैं। मस्तिष्क अनायास इस ख़बर का विश्लेषण करने लगता हैं। ज़मीन को लेकर दो सगे भाइयों में तू-तू मैं-मैं इतनी बढ़ी कि एक भाई ने दूसरे भाई की हत्या कर दी। पकड़ा गया। ज़ाहिर है, हत्या के आरोप में उसे सज़ा मिलेगी। सामाजिक दृष्टि से उसकी, उसके परिवार की बदनामी होगी। कई वर्षों तक हत्यारे परिवार के रूप में चिह्नित होने के कारण भौतिक, मानसिक और व्यावहारिक प्रताड़ना को झेलेंगे। जिस ज़मीन के लिए हत्या की, वह तो फिर भी उतनी ही मिलेगी जितनी जायज़ रूप से उसे क़ानूनन मिलनी चाहिए थी।

एकाएक उनका ध्यान सम्मान समारोह में न जाने के अपने निर्णय की ओर चला गया। भाई जैसे ख़ून के रिश्ते की परवाह किए बिना जो व्यक्ति हत्या जैसा जघन्य काम करता है उसके मन में क्या यह प्रश्न नहीं उठा होगा कि लोग क्या कहेंगे? ग़ुस्सा, रक्त में उबाल, लोभ का अतिरेक, कारण कोई भी रहा हो मगर मिलने-जुलने वालों की नज़र में उसकी छवि बिगड़ जायेगी, क्या एक क्षण के लिए भी विचार नहीं आया होगा उसे? ज़रूर आया होगा यह विचार। कितना भी गौण स्वरूप हो मगर यह विचार ज़रूर उभरा होगा उसके अन्तर्मन में। कैसे सम्भव है कि यहाँ कमलेश जी एक पुराने मित्र की धारणा को ग़लत सिद्ध करने की जद्दोजेहद में लगे हैं और वहाँ भाई ने सगे भाई की हत्या करते समय जनधारणा नाम की इस चिड़िया को क़तई महत्त्व नहीं दिया होगा? यहाँ केवल एक मित्र की कही हुई बात को रबड़ की तरह खींचकर वे फ़ैसला करने पर तुले हुए हैं। वहाँ हत्या जैसा कार्य करने से पहले एक भाई ने दुनियाँ जहान को भुला दिया। अगर मित्र की नज़र में कमलेश जी महत्त्व लोभी, प्रचार कामी और प्रसिद्धि पिपासा में लिप्त व्यक्ति हैं तो कौन-सा क़हर बरपा हो जाएगा? क्या यह प्रतिष्ठित सम्मान दूसरी बार मिलेगा उन्हें? क्या एक सुख देने वाले आनंदवर्द्धक अवसर को केवल एक फ़ितूर के पीछे बलिवेदी पर रख देना उचित है? यदि मित्र की धारणा विपरीत है तो दोषी वे कैसे हुए? मित्र की प्रदूषित दृष्टि नहीं माननी चाहिए क्या ज़िम्मेदार इसके लिए?

कमलेश जी की संवेदनशीलता संकेतों में कही गई बातों पर क्यों टिकनी चाहिए? दीर्घ सान्निध्य के बावजूद मित्र यदि वह सोचता है उनके बारे में जो वे नहीं हैं तो उसे ग़लत सिद्ध करने के लिए प्राणपण से जुट जाने की क्या ज़रूरत है? मित्र ने उन्हें किसी ऐसे कोण पर खड़े होकर देखा है जहाँ से कटा-फटा और अवांछित बिम्ब दिखाई देता है तो अपने आप को दोषी मानकर सज़ा देंगे क्या वे ख़ुद को?

तीन दिन! बहुत होते हैं तीन दिन। इस दौरान शरीर को यथासंभव सक्रिय रखकर कमलेश जी सम्मान समारोह में जा सकते हैं। थोड़ी-बहुत कमी रह जाती है तो कोई बात नहीं। इच्छा शक्ति को काम में लेकर वे क़ाबिज़ हो सकते हैं उसके ऊपर। जितनी चिंता उन्हें है मित्र की उनके प्रति धारणा को लेकर, उतनी परवाह, उतनी प्रसन्नता उसे भी होनी चाहिए प्रतिष्ठित सम्मान समारोह में उनकी उपस्थिति को लेकर। अकारण दुबले क्यों हुए जा रहे हैं कमलेश जी?

जाएँगे! वे ज़रूर जाएँगे सम्मान समारोह में!!

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