चाय पर कविताएँ

01-06-2026

चाय पर कविताएँ

अनिता रश्मि (अंक: 298, जून प्रथम, 2026 में प्रकाशित)

 

1
दार्जलिंग की याद 

 
चाय की चुस्कियों में 
घुली मिठास संग 
याद आता दार्जलिंग 
दार्जलिंग के चाय बाग़ान 
 
चाय बाग़ानों की 
ऊँची, पथरीली, गीली राहें ढोतीं 
अनगिन गाँव-कस्बों के नंगे पाँव 
दुखते हाथ, चटकतीं दर्द से 
उँगलियाँ सुकोमल 
 
सर से अपने टाँगें हुए थैलियाँ 
सुस्ताती नहीं 
लगातार तोड़तीं पत्तियाँ हरी 
बिन थके 
शाम ढले जल्द 
घर जाने को अकुलाई हुईं
ये चाय बाग़ान की स्त्रियाँ
हमारे कपों में 
उतर आती हैं 
 
2
सुकोमल उँगलियाँ 

 
ख़ूबसूरत, सँवरे, सुंदर, सजीले 
एक लय में झूमते 
चाय बाग़ानों में
ठिठुरतीं उँगलियाँ 
माँगती हैं 
अपने होने का हिसाब 

अकड़ती हुईं 
जकड़ती हुईं 
कुछ कहे बिन 
निरंतर जूझतीं 
खटाखट सहेजतीं 
दो पोरों से 
चाय की हरिताभ 
कोमल पत्तियाँ 
 
माँगती हैं हिसाब 
अपनी घायल होने का 
वे चाय-पत्ती सी 
सुकोमल उँगलियाँ। 
 
3
एहसास 

 
कब हमने सोचा 
उन स्कार्फ़ बाँधी 
महिलाओं के बारे में 
जो दनादन 
दो नाज़ुक कैंचियों से 
तोड़े जा रही हैं 
हरी मासूम पत्तियाँ 
पीठ पर बाँधकर किल्टा
 
पेड़ तले सुला रखा 
कुछेक ने 
नन्हे शिशुओं को अपने
कब हमने की कोशिश 
जानने की 
कि कैसे उठता दर्द 
उँगलियों का 
पहुँच जाता है 
उनके कंधों तक 
 
हर सुबह बेड टी 
पीते हुए 
हम कहाँ महसूस पाते
दूर ठंडे प्रदेश की 
वह कनकनी भरी 
बरसाती सुबह
और उन बाग़ानों का सच। 
 
4
गुण-धर्म 

 
मना लेने का 
है गुण 
गर्मागर्म चाय में 
 
तभी तो 
एक गर्म कप 
चाय की भाप 
देखते ही
ललका मन 
पुलकित तन
 
बढ़ाने पर कप 
रूठा प्रिय 
मुस्कुरा दिया 
छू जाते ही 
प्रिया की ठंडी उँगलियाँ 
 
5
खौलती चाय
 
 
हर दिशा में पहुँच 
चुकी है सुगंध 
सौंधी चाय की 
भीनी ख़ुश्बू में 
भीग उठा मन 
तन भी अलसाया 
हो गया सजग
 
आने की दुलहन सी 
प्रतीक्षा गई बढ़ 
प्यालियों की टकराहट 
और खटपट में 
लगा है घुलने प्यास 
प्रेम की पीगें प्रतीक्षारत 
रात से सर्द पड़े 
संबंधों के बँध 
खुलने को हैं 
 
कहीं चाय का 
चढ़ा है पतीला 
खौल रही है चाय। 

1 टिप्पणियाँ

  • 23 May, 2026 10:38 AM

    अच्छी कविताएं

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