पार्वती के कर्णफूल की मणि: मणिकर्ण
अनिता रश्मि
वे बसंत, फागुन के बीतने, चैत्र के आगमन के दिन थे, जब हम देवभूमि हिमाचल प्रदेश के शिमला के लिए राँची से निकले थे। राँची एयरपोर्ट से दिल्ली की ओर रवानगी मन में ख़ुशी की फागुनी बयार की रवानी के साथ परवान चढ़ रही थी। दिल्ली में दो दिन रुककर हम दोनों और बेटी दिल्ली से उड़ चले। चार दिनों तक शिमला में रहने के बाद आगे की यात्रा का प्रोग्राम था।
वहीं की गाड़ी से आगे मनाली जाते हुए अल्पज्ञात मणिकर्ण जाने का कार्यक्रम एकाएक बन गया। मणिकर्ण की तरफ़ हम बढ़ने लगे। वही मणिकर्ण, जहाँ नानक देव ने पार्वती नदी के खौलते जल में रोटी डालकर पकाई-खिलाई थी। और जहाँ बनाया गया विशाल मणिकर्ण साहिब गुरुद्वारा अपने अंदर खौलते जल का कुंड या कुआँ समेटे हुए है . . . दूर-दूर से आकर सिक्ख और अन्य धर्मावलंबी यहाँ समय बिताते हैं।
गहरी, हरे रंग की, हरीतिमा से घिरी व्यास नदी ने साथ पकड़ लिया शिमला से ही। मदिर-मदिर समीर मन के तारों को झंकृत कर रहा था।
भूंतर . . . पार्वती घाटी के प्रवेश द्वार से आगे बढ़ने का रास्ता। एक स्थान पर व्यास एवं पार्वती नदियों का संगम हुआ है। फिर पार्वती तटिनी एक राह पर, व्यास सरिता मनाली की ओर अलग राह पर।
हम पार्वती नदी के साथ गुरुद्वारे की तरफ़। पतली, कच्ची-पक्की सड़क के सहारे। एक तरफ़ ऊँचे पहाड़, दूसरी तरफ़ एकदम गहरी घाटियाँ! घाटियों के पार अन्य मनमोहक पहाड़ी शृंखलाओं का विस्तृत संसार। मैं सोच रही थी—लोग इस पार से उधर कैसे जाते होंगे?
कुछ ही दूरी पर जवाब हाज़िर . . . डोंगीनुमा ट्राॅली पर लोग सामान के साथ बैठकर भयानक, गहरी तथा काफ़ी चौड़ी तराइयों को मात दे रहे थे। मनुष्य के साहस और जिजीविषा के प्रति ख़ुद ही सर झुक गया। एक प्रश्न मन में कुलबुलाया, ‘क्या यह जीने की जद्दोजेहद में मानव की ज़िद के साथ घमंड तो नहीं? . . . प्रकृति के साथ प्रतिस्पर्धा तो नहीं?’
ऐ काल
तुझ से होड़ है मेरी
-याद आया।
हम ढूँढ़ रहे थे, पुराने ज़माने के तिरछी छतोंवाले घर। थे कहाँ? सब तरफ़ तो विकास की आँधी! . . . गिरि के उतुंग शिखरों का सीना चाक करते हुए। उसमें खो गई पुरानी छतें, पुराने मकां। पर्वतों को काटकर रोपे जाते कंक्रीट के जंगल। एक . . . बस, एक मकान वैसा दिखा, जिसके बारे में बचपन में पढ़ा था कि पर्वतों पर बर्फ़बारी से बचने के लिए ढलुआ छतें बनती हैं।
हम थोड़ी देर रुक वहाँ देखते रहे। सर्पीले रास्ते में नीचे घाटियों में अनेक बस्तियांँ हैं। बादल फटने, भूस्खलन आदि का भय यहाँ भी बना रहता है।
फिर था, पक्का रोड, किकुड़ती ठंड ख़त्म होने के बाद लाहौल स्पीति या अन्य ऊँचे स्थलों की ओर वापस जाते हुए पैदल यात्री . . . साथ भेड़ या बकरी के रेवड़, सर पर गट्ठरों का बोझ थामे पट्टू पहनी स्त्रियों की कर्मठता, तराई, हिमालय की चौकीदारी, होटलों-ढाबों का संसार!
और पार्वती नदी का आवाह्न!
मलाना संस्कृति से संपृक्त कसोल घाटी से चार किलोमीटर दूर मणिकर्ण पहुँचते ही धीमी, शांत गति से बहती पार्वती उफनती, लरजती, गरजती दिखलाई पड़ गई। हम एक पुल के पास खड़े होकर नीचे बहती विशाल पार्वती नदी को देखते रह गए . . . एकदम स्वच्छ, नीलाभ वारि . . . उस पर वारि-वारि जाए जैसे मन।
पुल के पार काफ़ी प्राचीन श्वेत गुरुद्वारा। सादगी का प्रतीक।
पुल को पार कर विशाल गुरुद्वारे के अंदर घुसते ही सामने गर्म कुंड . . . उठती भाप! . . . ग़जब! . . . राजगीर, बिहार के गर्म कुंड से छात्र जीवन में ही भेंट हो चुकी थी। पर यहाँ इतना गर्म? आस-पास भी गर्मी का अहसास। एकदम तपी दीवारें। एक भीत पर हाथ रखा, झट हटा लिया अन्यथा जला देती। यहाँ पोटलियों में चावल, दाल डाल दें, तो पूरी पक जाएँगी।
यहाँ लोग पके चावल, दाल को प्रसाद स्वरूप ग्रहण करते हैं। ऊपरी कमरों में लोग भरे थे . . . आस्था में डूबे . . . स्वेच्छा से कारसेवा करते भक्त . . . गुरुवाणी, सबद-कीर्तन में लीन रहनेवाले कई महीनों से पड़े सिक्ख धर्मावलंबी।
हिंदुओं की आस्था भी देखने लायक़ थी।
मणिकर्ण के नामकरण के पीछे एक कथा आकार लेती है—पार्वती के जलक्रीड़ा के समय उनके कर्णफूल से मणि गिर गई थी। वह पाताल लोक में शेषनाग के हाथ लगी। शंकर के गणों के बारंबार ढूँढ़ने पर भी नहीं मिली। महादेव का तीसरा नेत्र खुल गया।
प्रलय आ गया। अब तो शेषनाग के सामने विवशता, उसने ज़ोर से फुफकार कर मणि को धरा की ओर यहीं उछाल दिया। तभी से यह स्थान मणिकर्ण।
हम पवित्र गुरूद्वारे से बाहर आए। पुल के पास उसकी एक दीवार से गर्म जल पार्वती तटिनी के उफान में गिर, उसमें एकाकार हो जा रहा था।
तप्त-शीतल का मिलन! मन के अंदर बहती उष्ण-शीतल भावना सी। आस-पास ज़्यादा होटल आदि नहीं दिखे। लेकिन पर्यटक मंदिरों और गुरुद्वारों द्वारा आयोजित लंगर पर भी स्वादिष्ट, हाइजीनिक भोजन कर सकते हैं।
कुल्लू से लगभग 45 कि.मी. दूर मणिकर्ण अपने बेहद तप्त पानी के चश्मों के लिए भी प्रसिद्ध है।
विशेष रूप से ऐसे पर्यटक जो चर्म रोग या गठिया जैसे रोगों से परेशान हैं, यहाँ आकर स्वास्थ्य सुख पाते हैं। गंधकयुक्त चश्मों में कुछ दिनों के स्नान के पश्चात् चर्म रोग दूर हो जाता है। मणिकर्ण के पहाड़ों पर वृक्षों की सघन उपस्थिति।
पर्वतीय क्षेत्र का अद्भुत सौंदर्य, पग-पग पर। ‘मेरे नगपति, मेरे विशाल’ . . . काव्य पंक्तियों ने हृदय पर दस्तक दी, जब हम लौट रहे थे। रोमांचित! अचंभित! आह्लादित!
ऋषि-मुनियों की इस साधनास्थली पर कुछ मंदिर दुर्गम स्थलों पर बने हैं। रघुनाथ मंदिर, शिव मंदिर, हनुमान मंदिर, शिखर शैली का राम मंदिर, नयना भगवती मंदिर तथा कृष्ण मंदिर आदि विशेष रूप से चर्चित हैं।
सब जगह जाना सम्भव नहीं था। वहाँ के देवालयों में समय बिताने के लिए कम से कम दो दिन का समय आवश्यक है।
हम कुछेक देवालयों को देख वापस भूंतर की ओर, पार्वती सरि के कलकल में डूबे। अब अगला पड़ाव मनाली . . . रात्रि की शुरूआत से पहले ही पहुँचने की हड़बड़ी थी। कहीं बीच में ही दिनकर विदाई का संगीत न सुनाने लगे।
भूंतर हवाई अड्डा पर्यटकों की राह आसान कर देता है। देश के कुछेक हिस्सों से छोटे विमान इस तल पर आते हैं।
दूर से, गहरी तराईयों में बहती हुई व्यास को देखते हुए हमारी गाड़ी मणिकर्ण को अलविदा कह देवभूमि के एक और ख़ूबसूरत स्थान मनाली की ओर दौड़ रही थी अब।