आहट 

नोरिन शर्मा (अंक: 273, मार्च द्वितीय, 2025 में प्रकाशित)

 

सर्द रातों में 
कोहरे को चीरती
एक सुलगी सी आहट
बेलाग लिपट जाती है
बारंबार कुनकुनी धूप को
अपनी दोहर में लपेटे! 
 
कभी
चादर की सलवटों में
उदासी की संतप्त साँसें
बीतने नहीं देतीं
सिरफिरी ख़्वाहिशों को
उनकी उद्दाम उपस्थिति
अनमना कर देती 
अलसाई उषा की लालिमा को! 
 
मौसम के करवट की 
आहट भी नहीं
संदेसा भी नहीं
पूर्वानुमान भी नहीं
केवल 
भीगती ओस संग
बीतता 
चित्र सा सपाट
वक़्त है
और साथ चलने का
उसका निष्कपट आग्रह! 
 
स्वीकार की मुद्रा में
अपने को
ख़र्चते चले जाते हैं
ख़र्चते चले जाते हैं। 

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