वैश्विक मंच पर हिन्दी का पुनर्जागरण

15-04-2026

वैश्विक मंच पर हिन्दी का पुनर्जागरण

डॉ. चन्द्रशेखर तिवारी (अंक: 295, अप्रैल द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)


 (डॉ. तेजेन्द्र शर्मा के योगदान के विशेष संदर्भ में) 

 

इक्कीसवीं शताब्दी का वैश्वीकरण केवल अर्थव्यवस्था, तकनीक और संचार तक सीमित नहीं है; उसने भाषाओं और संस्कृतियों के समक्ष भी नई चुनौतियाँ और नए अवसर उपस्थित किए हैं। ऐसे समय में हिन्दी जैसी समृद्ध, संवेदनशील और जनभाषा को विश्व-पटल पर अपनी पहचान बनाए रखने के लिए जिन सतत और सजग प्रयत्नों की आवश्यकता थी, उनमें प्रवासी हिन्दी-सर्जकों की भूमिका ऐतिहासिक रही है। इस परिप्रेक्ष्य में डॉ. तेजेन्द्र शर्मा का नाम एक ऐसे साहित्यकार के रूप में उभरता है, जिन्होंने प्रवासी जीवन की सीमाओं के भीतर रहकर हिन्दी को वैश्विक संवाद और विमर्श की भाषा बनाने का महत्त्वपूर्ण कार्य किया है।

ब्रिटेन में प्रवासी हिन्दी साहित्य का स्वरूप अब केवल ‘भारत की स्मृतियों’ तक सीमित नहीं रह गया है। वहाँ की सामाजिक-सांस्कृतिक वास्तविकताओं को आत्मसात् करते हुए उन्हें साहित्यिक अभिव्यक्ति देने का श्रेय डॉ. तेजेन्द्र शर्मा, MBE को जाता है। भारतीय मूल के इस ब्रिटिश हिन्दी लेखक, संपादक और कथाकार ने पिछले कई दशकों से जिस प्रतिबद्धता के साथ प्रवासी हिन्दी भाषा एवं साहित्य को सक्रिय मंच प्रदान किया है, उसने हिन्दी के वैश्विक प्रसार, सामाजिक समरसता और बहुसांस्कृतिक संवाद को एक नई दिशा दी है।

डॉ. तेजेन्द्र शर्मा का जन्म 21 अक्टूबर 1952 को पंजाब के जगराँव नामक ग्राम में हुआ था। प्रारम्भिक शिक्षा के उपरान्त उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से अंग्रेज़ी विषय में स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त की। एयर इंडिया में सेवाकाल तथा दूरदर्शन, आकाशवाणी और बीबीसी लंदन से जुड़ाव ने उनके अनुभव-संसार को व्यापक बनाया। वर्ष 1998 में वे ब्रिटेन में स्थायी रूप से बस गए और वहीं से हिन्दी भाषा के प्रचार-प्रसार तथा साहित्य-सृजन को अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया।

प्रवासी हिन्दी साहित्य का सबसे बड़ा संकट यह रहा है कि वह या तो ‘देश-स्मृति’ में सिमट जाए या फिर स्थानीय समाज से कटकर आत्मकेन्द्रित हो जाए। डॉ. तेजेन्द्र शर्मा ने इस संकट को अपनी रचनात्मक दृष्टि और सक्रिय सहभागिता से तोड़ा। उनके कथा-साहित्य में भारतीय जीवन-मूल्यों के साथ-साथ यूरोपीय सामाजिक संरचनाओं की यथार्थपरक झलक मिलती है। यह द्वैत नहीं, बल्कि द्वंद्व और संवाद है, जो उनकी रचनाओं को वैश्विक अनुभव-लोक से जोड़ता है और हिन्दी साहित्य को नई संवेदनात्मक ऊँचाई देता है।

ब्रिटेन में स्थापित उनकी संस्था ‘कथा यू.के.’ हिन्दी साहित्य के एक सशक्त और प्रतिष्ठित मंच के रूप में उभरी है। इसके अंतर्गत प्रतिवर्ष ब्रिटिश संसद के हाउस ऑफ़ कॉमन्स में प्रदान किया जाने वाला ‘इंदु शर्मा अंतरराष्ट्रीय कथा सम्मान’ हिन्दी कथा साहित्य को वैश्विक स्तर पर प्रतिष्ठा दिलाने वाली एक अनूठी पहल है। यह आयोजन केवल पुरस्कार-वितरण तक सीमित नहीं, बल्कि साहित्य, संस्कृति और बहुलता के रचनात्मक संवाद का जीवंत मंच बन चुका है।

डॉ. शर्मा ‘पुरवाई’ जैसी प्रतिष्ठित हिन्दी साहित्यिक पत्रिका के संपादक भी हैं। ‘पुरवाई’ केवल एक पत्रिका नहीं, बल्कि ब्रिटेन सहित विभिन्न देशों में बसे हिन्दी-भाषी प्रवासियों की सोच, अनुभव और रचनात्मक चेतना का अंतरराष्ट्रीय मंच है। इसमें प्रकाशित रचनाएँ प्रवासी जीवन की पीड़ा, स्मृति, अस्मिता और सांस्कृतिक द्वंद्व को अभिव्यक्त करते हुए स्थानीय सामाजिक-सांस्कृतिक संदर्भों को भी साहित्य की भाषा प्रदान करती हैं। इस दृष्टि से ‘पुरवाई’ ने हिन्दी को वैश्विक साहित्यिक धारा में सम्मानजनक स्थान दिलाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

डॉ. तेजेन्द्र शर्मा के अब तक दो दर्जन से अधिक कहानी-संग्रह तथा कई कविता-संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। ‘काला सागर’, ‘ढिबरी टाइट’ और ‘देह की कीमत’ जैसे कथा-संग्रह उनके रचनात्मक वैशिष्ट्य को रेखांकित करते हैं। उनके संपादन में प्रकाशित संकलन—‘समुद्र पार रचना संसार’, ‘यहाँ से वहाँ तक’, ‘ब्रिटेन में उर्दू कलम’ और ‘समुद्र पार हिंदी ग़ज़ल’—प्रवासी साहित्य की भाषिक और सांस्कृतिक बहुलता को सशक्त रूप में प्रस्तुत करते हैं।

हिन्दी के अंतरराष्ट्रीय मंचों—विश्व हिन्दी सम्मेलन, प्रवासी हिन्दी आयोजन, साहित्यिक संगोष्ठियाँ और पत्र-पत्रिकाएँ—इन सभी में डॉ. तेजेन्द्र शर्मा की उपस्थिति केवल औपचारिक नहीं रही। उन्होंने हिन्दी को ‘भावनात्मक भाषा’ से आगे बढ़ाकर ‘संवाद और विमर्श की भाषा’ के रूप में स्थापित करने का सतत प्रयास किया। युवा पीढ़ी को हिन्दी से जोड़ने के उनके प्रयत्न विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं; क्योंकि किसी भी साहित्यिक पुनर्जागरण की वास्तविक आधारशिला यही कर्मशील प्रेम होता है।

इसी व्यापक साहित्यिक और सांस्कृतिक योगदान के लिए उन्हें ब्रिटिश सरकार द्वारा “Member of the Order of the British Empire (MBE) ” सम्मान से अलंकृत किया गया। मेरी जानकारी के अनुसार, ब्रिटेन में हिन्दी के वे पहले लेखक हैं जिन्हें यह सम्मान प्राप्त हुआ। यह उपलब्धि न केवल उनकी व्यक्तिगत साधना की पहचान है, बल्कि हिन्दी साहित्य के वैश्विक प्रसार की दिशा में एक ऐतिहासिक मील का पत्थर भी है।

निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि डॉ. तेजेन्द्र शर्मा का साहित्य केवल शब्दों का संकलन नहीं, बल्कि समय, समाज और संस्कृति का एक जीवंत, प्रामाणिक और ऐतिहासिक दस्तावेज़ है। उन्होंने यह सिद्ध किया है कि भाषा केवल भूगोल से नहीं, बल्कि संवेदना, विचार और सतत कर्म से जीवित रहती है। कहना असंगत नहीं होगा कि वैश्विक मंच पर हिन्दी का पुनर्जागरण ऐसे ही सजग, समर्पित और सृजनशील साहित्यकारों के कारण सम्भव हुआ है—और डॉ. तेजेन्द्र शर्मा इस परंपरा के सशक्त हस्ताक्षर हैं। 

 

(साहित्य कुञ्ज में "विशेषांक: ब्रिटेन के प्रसिद्ध लेखक तेजेन्द्र शर्मा का रचना संसार" पढ़ें)
 

1 टिप्पणियाँ

  • साहित्य कुंज पत्रिका के विशेषांक में प्रसिद्ध कथाकार ,साहित्यकार आदरणीय प्रिय तेजेंद्र शर्मा MBE के संदर्भ में जो आलेख प्रकाशित हुआ है में भारतवासी कुन्ती पूरी तरह से उनके सारगर्भित साहित्यिक लेखन की अनुशंसा करती हूं , उनकी एक सैकड़ा से अधिक प्रकाशित कहानियां उनके प्रवासी भारतीय लेखक होने की वजह से उनके लेखन में पूर्व भारतीयता कचित्रण ,यादें ही नहीं पढ़ने को मिलती हैं अपितु उनके द्वारा अपनाए हुए देश की संस्कृति सभ्यता साम्यता अलौकिकता का अनोखा समावेश दिखाई देता है जो कि अन्य लेखकों के वस्तु विषयों से उन्हें एक अलग स्थान पर प्रतिष्ठित करता है। ब्रिटेन से प्रकाशित पत्रिका पुरवाई में सर्वप्रथम उनके द्वारा लिखित संपादकीय हजारों पाठकों की प्रतीक्षित संपादकीय है, मेरे अनुसार उनकी संपादकीय बेहद विशिष्ट समसामयिक ,विश्व को प्रतिनिधित्व करने वाली होती है ,निःसंदेह उनकी तथ्यों को विश्लेषण करके प्रेषित करने वाली समझ अनोखी है उनके द्वारा दिए जाने वाला , कथा यूके सम्मान साहित्य जगत में एक प्रतिष्ठित सम्मान है एकमात्र भारतीय प्रवासी लेखक को यूके से मिलने वाली MBE उपाधि के वे एकमात्र उत्तराधिकारी हैं, यू तो उनका व्यक्तित्व किसी भी सम्मान से अधिक बढ़कर है ,वे एक साहित्य का का चलता फिरता पुस्तकालय हैं ।में स्वयं हजारों पाठक उनके लेखन ,उनके साहित्य रचनाओं ,पुस्तकों के प्रशंसक हैं ,हम उनके उत्तम स्वास्थ्य शतायु जीवन निरंतर लेखन में रत जीवन की कामना करते हैं ,

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