घुटन
डॉ. राजकुमारी शर्मा
सुबह की हल्की धूप खिड़की के पर्दों से छनकर कमरे में फैल रही थी, पर उस उजाले में भी अजीब-सी घुटन थी। दीवार पर लटकी घड़ी की टिक-टिक, जैसे उसे हर वक़्त यह अहसास दिला रही थी कि समय तेज़ी बीत रहा है—पर उसकी ज़िन्दगी वहीं की वहीं ठहरी हुई है। काजल ने बिस्तर से उठकर खिड़की खोली। बाहर गली में कुछ बच्चे खेल रहे हैं तो कुछ स्कूल भी जा रहे थे। कुछ वृद्ध औरतें आपस में अपनी रामकथा एक-दूसरे से हँस-बोल रही थीं, और चाय की दुकान पर लोग अख़बार की चुटकियाँ लेकर कर नेताओं को कोस रहे थे। देश को खा गये ये नेता। सब अपने ढंग से चल रहे थे, लेकिन काजल को ऐसा लगता था जैसे वह इस जीवन को काट रही है। उसके जीवन में कोई उत्साह ही नहीं है।
काजल की शादी को पंद्रह साल हो चुके थे। शादी के शुरूआती दिन बेहद ख़ुशहाल थे। उसके पति, देव, बहुत ही समझदार और सुलझे हुए इंसान लगे थे। वह उसकी हर छोटी-बड़ी ज़रूरत का ख़्याल भी रखते थे। पर धीरे-धीरे वह प्यार और अपनापन कहीं खो गया। अब देव घर में रहते हुए भी घर में नहीं होते थे। उनका ध्यान सिर्फ़ अपने काम और फोन तक सीमित रह गया था। काजल उनसे कोई भी कहती, तो वह या तो ग़ुस्सा करते या झुँझला उठते। “इन बेकार की बातों के लिए मेरे पास समय नहीं है।” वह अक्सर ऐसा ही कह देते। यह सुनकर काजल चुप हो जाती। उसकी आँखों में अनेक सवाल होते, पर उनका कोई जवाब नहीं होता था।
धीरे-धीरे यह ख़ामोशी उसकी आदत बन गई। उसने अपने मन को शांत कर लिया और चुप रहना सीख लिया। वह घर के कामों में ही लगी रहती। किसी से कुछ नहीं बोलती लेकिन यह क़ैद अब उसे अंदर से तोड़ने लगी थी। यह उदासी, यह अनकहे शब्द—सब मिलकर एक घुटन बन गए थे। एक दिन काजल अपनी पुरानी डायरी निकालकर बैठी। उसमें उसने शादी के शुरूआती दिनों के बारे में लिखा था—घर-परिवार की कड़वी और सच्ची बातें और साथ ही कैसे देव उसे हर छोटी-छोटी ख़ुशी देते थे, कैसे दोनों साथ बैठकर घंटों बातें करते और ख़ुश रहते थे।
डायरी के पन्ने पलटते-पलटते उसकी आँखों से आँसू बहने लगे। उसे लगा जैसे वह किसी और की कहानी पढ़ रही है, अपनी नहीं। और अपने से सवाल करती, “क्या मैं वही काजल हूँ?” अचानक उसकी नज़र सामने रखे शीशे पर पड़ी। उसने अपने को देखा—चेहरे पर उदासी और थकान ने कितना असहाय और अर्थहीन सा बना दिया था। आँखों में सूनापन, और होंठों पर एक बुझी-सी मुस्कान। उसने धीरे से कहा अपने आप से कहा, “मैं ऐसी तो नहीं थी . . . ” उस दिन काजल ने ख़ुद से एक वादा किया कि वह इस घुटन से बाहर निकलने की कोशिश करेगी।
अगले दिन जब देव अपने काम पर जाने लगे, तो काजल ने हिम्मत जुटाकर कहा, “देव, क्या हम थोड़ी देर बात कर सकते हैं?”
देव ने घड़ी की ओर देखा, फिर कहा, “काम पर जाने के लिए मुझे देर हो रही है। शाम को बात करेंगे।” उसने सिर हिला दिया, लेकिन उसे पता था कि शाम को भी वही होगा—थकान, ग़ुस्सा, और एक अनचाही दूरी।
शाम को देव लौटे। काजल ने फिर कोशिश की, “देव, मुझे आपसे कुछ ज़रूरी बात करनी है।”
“यार अभी तो आया हूँ और तुम अपना वही राग फिर से मत अलापो।”
देव ने टीवी चालू करते हुए कहा, “काम से थक कर आया हूँ कुछ देर टीवी देख लूँ फिर बात करते है न।” एक-डेढ़ घंटे बाद काजल से अपने दिल में चल रही विवशता को बताया और कहा, “मुझे लगता है कि हम दोनों के बीच अब कुछ नहीं रहा है। हम पहले जैसे नहीं रहे . . . ” देव ने बीच में ही टोक दिया, “समय पर सब कुछ बदल जाता है, काजल। इसमें इतना सोचने की क्या बात है?”
“पर अब मैं ख़ुश नहीं हूँ आपके साथ,” काजल ने धीरे से कहा।
देव ने थोड़ी देर उसे देखा, फिर बोले, “तुम्हें क्या चाहिए? सब कुछ तो है तुम्हारे पास—घर, गाड़ी और आराम।”
काजल की आँखों में आँसू आ गए। “मुझे आप चाहिए, देव . . . आपका समय, आपका साथ . . . ”
देव चुप हो गए। कमरे में ख़ामोशी-सी छा गई।
उस रात दोनों एक ही बिस्तर पर लेटे थे, लेकिन उनके रिश्तों में दरार आ गई थी। दिन बीतते गए। देव पर इस बात का की असर दिखाई नहीं दे रहा था। उसने महसूस किया कि अब शिकायत करने से नहीं चलेगा। उसे ख़ुद पर काम करना होगा।
उसने घर के पास एक लाइब्रेरी में जाना शुरू किया। वहाँ उसे किताबों के नज़दीक जा में एक नया सुकून मिला। उसने लिखना भी शुरू किया—अपने मन की बातें, अपनी भावनाएँ, अपने दर्द। धीरे-धीरे उसे महसूस हुआ कि वह फिर से अपने को पहचाने लगी है।
एक दिन लाइब्रेरी में उसकी मुलाक़ात सुप्रिया से हुई। वह बहुत ही जीवंत और सकारात्मक सोच वाली युवती थी।
“आप हर रोज़ यहाँ आती हैं?” सुप्रिया ने हँस कर पूछा।
“हाँ,” कहकर जवाब दिया।
“अच्छा लगता है न, किताबों के बीच?” सुप्रिया ने कहा।
काजल ने सिर हिलाया, “हाँ . . . यहाँ पर मुझे अपने से मिलने का मौक़ा मिलता है।”
सुप्रिया उसकी बात समझ गई। धीरे-धीरे उनकी दोस्ती गहरी होती गई।
सुप्रिया ने एक दिन कहा, “काजल, कभी-कभी हम दूसरों में इतना खो जाते हैं कि ख़ुद को भूल जाते हैं। लेकिन ख़ुद को पाना सबसे ज़रूरी है।”
यह बात काजल के दिल को छू गई।
उसने अब अपने लिए समय निकालना शुरू किया—पढ़ना, लिखना, टहलना, और कभी-कभी अकेले बैठना। देव ने भी यह बदलाव महसूस किया। “तुम आजकल कहाँ रहती हो?” उन्होंने एक दिन पूछा।
काजल ने रुक जवाब दिया, “हाँ, मैं अब अपने लिए जी रही हूँ।”
पति समझ रहा था, लेकिन मानने को तैयार नहीं था कि काजल को अब मेरी कोई ज़रूरत नहीं रही है। एक दिन काजल ने अपनी लिखी हुई कहानी एक पत्रिका में भेज दी। कुछ हफ़्तों बाद उसे पत्र मिला—उसकी कहानी प्रकाशित होने वाली थी। उस दिन उसकी ख़ुशी का ठिकाना नहीं था। उसने यह ख़बर देव को बताई। देव ने पहली बार उसे ध्यान से देखा और कहा, “मुझे नहीं पता था कि तुम इतना अच्छा लिखती हो।”
काजल मुस्कुराई, “शायद मैंने ख़ुद को कभी मौक़ा ही नहीं दिया।”
देव के मन में भी कुछ बदलने लगा। उन्होंने महसूस किया कि उन्होंने काजल को कितना नज़र-अंदाज़ किया है। एक रात उन्होंने काजल से कहा, “मुझे माफ़ कर दो। मैं समझ नहीं पाया कि तुम क्या महसूस कर रही थीं।”
काजल ने कुछ देर सोचा, फिर कहा, “माफ़ी से ज़्यादा ज़रूरी है समझ . . . और साथ।”
देव ने सिर झुका लिया, “मैं कोशिश करूँगा।”
काजल ने हल्की मुस्कान दी, “बस कोशिश सच्ची होनी चाहिए।”
धीरे-धीरे दोनों के रिश्ते में बदलाव आने लगा। अब वे कभी-कभी साथ बैठकर बातें करते, हँसते, और अपने दिन के अनुभव एक-दूसरे शेयर करते।
काजल अब स्वतंत्र होकर जी रही थी अपने लिए। देव ने उसे समझना शुरू कर दिया।
काजल को ये अहसास हुआ कि घुटन सिर्फ़ बाहरी परिस्थितियों से नहीं होती, बल्कि आंतरिक भी होती है और तब तक होती है जब हम अपने अंदर की आवाज़ को दबा लेते हैं।
अब उसने अपनी आवाज़ को भी सुनना सीख लिया है और उसी के अनुरूप वह कार्य करती है।
एक दिन वह भूले-बिसरे फिर उसी खिड़की के पास जा खड़ी होती है। बाहर से वही सब आवाज़, लोग, हलचल दिखाई और सुनाई दे रही था। लेकिन इस बार उसे सब कुछ अलग लग रहा था।
उसने मंद मुस्कुराते हुए गहरी साँस ली और महसूस किया—अब उसे घुटन नहीं हो रही। चारों हर्ष का वातावरण बिखरा हुआ था।
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