अंधे की लाठी

01-06-2026

अंधे की लाठी

अवधेश तिवारी (अंक: 298, जून प्रथम, 2026 में प्रकाशित)

 

प्यारे बच्चो, आइये, आज हम आपको एक बड़ी प्रेरक कहानी सुनाते हैं। 

एक गाँव में दो मित्र रहते थे, नैनसुख और सूरदास। दोनों में बचपन से गहरा प्यार था। प्रतिदिन दोनों शहर में भिक्षाटन करने जाते। राह चलते समय सूरदास अपनी लाठी का एक सिरा नैनसुख के हाथ में पकड़ा देता और उसके पीछे-पीछे बातें करते हुए तेज़ी से शहर तक पहुँच जाता।

रास्ते में सूरदास कहता, “मित्र, तुम मित्र तो हो ही, अंधे की लाठी भी हो।”

एक दिन शाम को शहर में बहुत भारी बरसात हुई। तेज़ ऑंधी-तूफ़ान के कारण इतना अँधेरा छा गया कि हाथ को हाथ नहीं सूझ रहा था। नैनसुख सोचने लगा, ‘घनी-अँधेरी रात है, कीचड़ भी हो गया है, ऊबड़-खाबड़ कच्चे रास्ते में मैं स्वयं भी ठीक से नहीं चल सकूँगा तो बेचारे सूरदास को कैसे ले जा पाऊँगा?”

उसने सूरदास से कहा, “मित्र, इस समय तो मैं भी तुम्हारी तरह कुछ नहीं देख पा रहा हूँ। मैं भी जैसे अन्धा हो गया हूँ। चारों ओर अँधेरा-ही-अँधेरा है। आज मैं तुम्हें गॉंव नहीं ले जा पाऊँगा। ऐसा करते हैं, शहर में ही किसी स्थान पर रात गुज़ार लेते हैं।”

सूरदास ने थोड़ी देर विचार किया और बोला, “मित्र, तुम चिंता मत करो। मैं प्रतिदिन तुम्हारी लाठी पकड़ कर पीछे-पीछे चलते हुए शहर आता था, आज मैं आगे चलूँगा और तुम पीछे-पीछे मेरी लाठी पकड़ कर चलना।”

नैनसुख आश्चर्य से बोला, “यह कैसे सम्भव है मित्र? तुम ऊबड़-खाबड़ कीचड़-भरे रास्ते पर कैसे चल पाओगे?”

सूरदास बोला, “मित्र, मेरे पैर रास्ते के एक-एक मोड़, एक-एक पत्थर को पहचानते हैं। तुम चिंता मत करो, इतने दिन तुम मेरे लिए ‘अंधे की लाठी’ बने रहे आज तुम्हें भी एक अंधे की लाठी का सहारा मिलेगा।”

अब क्या था, सूरदास ने लाठी का एक सिरा नैनसुख को पकड़ा दिया और स्वयं आगे-आगे चल पड़ा। कुछ देर में दोनों सुरक्षित घर पहुँच गए।

बच्चो, जिन्हें हम अहंकार-वश असमर्थ और लाचार समझते हैं, कई बार वे हमसे भी अधिक समर्थ और समझदार सिद्ध होते हैं। जो आँखों से स्वयं नहीं देख पाता, वह भी दूसरों को रास्ता दिखा सकता हैं। 

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