वही तो रक्त है

उपेन्द्र 'परवाज़'

अपमानों के घावों पर,
भुजाओं की शिराओं पर
न्याय के अभावों पर,
अत्याचारों के स्वभावों पर
होता जो अभिव्यक्त है,
वही तो रक्त है।

दिखते हों जब क्रन्दन,
पशुता से हत जीवन
कुटिलता से भरे हुए मन,
साँपों से ग्रसित चन्दन
बाँहों को कृपाण से करता
जो आसक्त है,
वही तो रक्त है।

खुलते हों द्रुपदा के केश,
धृतराष्ट्रों को हो न क्लेश
धर्मराजों का मौन भेष,
भीष्मों का बल हो शेष
गाण्डीव की टंकार से होता
जो व्यक्त है,
वही तो रक्त है।

युद्ध में पाकर विजय,
देख कर मानवता की क्षय
पापों का देखकर भय,
जीवन का यह प्रलय
व्याकुल होकर संसार से होता
जो विरक्त है,
वही तो रक्त है।

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