समकालीन लेखिकाओं के उपन्यासों में मानव-मूल्य

17-02-2018

समकालीन लेखिकाओं के उपन्यासों में मानव-मूल्य

डॉ. राजकुमारी शर्मा

मूल्य मानव के जीवन को पूर्ण विकास की ओर अग्रसर करते हैं। इसके लिए मानव को अपने जीवन के लिए उचित उद्देश्य निर्धारित करने की आवश्यकता है। मूल्य अत्यंत आधारभूत होते हैं। जिसे मानव अनुभव करता है कि यह जीवन में कितने आवश्यक होते हैं। मानव मूल्यवान है। मूल्य जैसे कि मानव का जीवित रहना, मानव संतुष्टि, मानव सुख-शांति और एक स्वस्थ मानव।

“मूल्य” शब्द अँग्रेज़ी शब्द के पर्याय के रूप में ग्रहण किया गया है। प्रतिदिन के व्यवहार में ‘मूल्य’ शब्द का प्रयोग विभिन्न प्रकार से विभिन्न अर्थों में किया जाता है। विज्ञान के इस युग में मानव मूल्यों का विघटन हो रहा है; यांत्रिक सभ्यता ने मनुष्य की इस मूल्य दृष्टि को परिवर्तित कर दिया है अथवा परिस्थितियों के साथ जीवन-मूल्यों में परिवर्तन हो रहा है- समय, स्थान, स्थिति के अनुसार इसका अर्थ बदलता रहता है- पाल हान्ले फर्मे के अनुसार “किसी वस्तु की मानवीय आकांक्षाओं को पूरी करने वाली विश्वस्त योग्यता, किसी वस्तु का यह गुण जो व्यक्ति के समूह के लिए उसे रुचिकर बनाता है।”1 वस्तु का महत्व एवं उपयोगिता पर बल दिया गया है। डॉ. देवराज ने कहा है कि “मनुष्य द्वारा जिन वस्तुओं की कामना की जाती है, उसे ही मूल्यवान माना जाता है।”2 मानव मूल्यों का केंद्र माना जाता है। इस आधार पर विवेचन करें तो समकालीन लेखकों ने अपने उपन्यासों में मानव-मूल्यों की स्पष्टता का महत्व स्वीकार किया है। सामाजिक, सांस्कृतिक,आर्थिक और धार्मिक तथा अन्य मूल्यों का विकास-क्रम परिवेश के अनुसार विकसित किया है। उपन्यास ‘क्योंकि’ में लेखिका शशिप्रभा शास्त्री ने कहा है कि सामाजिक परंपराओं,रूढ़ियों के बदलते स्वरूप को देखते हुए निरंतर परिवर्तन आ रहा है। बेरोजगारी के कारण युवा अपने पथ से हट अनेक विसंगतियों में फँसता जा रहा है- “थके टूटे अनपढ़ जाहिल गंदे मैले कुचैले ये बहशी युवक देश के भविष्य के कर्णधार, युवकों के नाम पर हड्डी या फसफस हुई देहें,जुआ-चोरी-जारी,लूटपाट जैसे खुरापाती लतों को पाले हुए,छुरे-पिस्तौल के बल पर शक्ति समेटे ये युवक अपना क्षोभ दिखाते हुए,जबरन दूसरों के अधिकारों पर कब्जा करने वाले इन युवकों की एक बड़ी भीड़ देश के हर भाग में फैली हुई है। इनका वातावरण इनसे क्या नहीं करवाता होगा ? क्या होगा इस देश का?”3 समाज की स्थिति-परिस्थिति के बदल जाने से व्यक्ति का अस्तित्व ही बदल गया है। रोज़गार न मिलने के कारण व्यक्ति अपना एव देश का हित भी नहीं समझ रहा है। मानव विकास की ओर अग्रसर न होकर पतन की ओर चला जा रहा है। समाज एवं परिस्थिति व्यक्ति से न जाने क्या-क्या करवा लेती है पता ही नहीं चलता।

 समाज जैसे-जैसे बदल रहा है व्यक्ति की सोच में भी परिवर्तन आता जा रहा है। पहले शादी घर-परिवार की रज़ामंदी से तय की जाती थी। आज मूल्यों में परिवर्तन होने से शादी बड़ों की मर्जी से ना करके अपनी पसंदाअनुसार करना चाहते है। लेखिका शशिप्रभा शास्त्री ने इस संबंध पर व्यंग्य कसते हुए कहा है “आपके बच्चे लव मैरिज कर ले तो बात जुदा है,तब तो आपके वश की बात नहीं है, उस समय भी आप यह ज़रूर चाहेंगी,जहाँ तक मैं सोचती हूँ कि भले ही बच्चे कैसी शादी कर लें, पर अगर आपने उसे शादी के लिए अपनी सहमति दे दी है, उसे स्वीकार कर लिया है, तो आप चाहेंगे कि आपके बच्चे की शादी अपने ढंग से हो”।4 सोच बदलने के कारण रीति-रिवाजों, परंपराओं में परिवर्तन दिखाई पड़ रहा है। बच्चों की सोच के अनुसार ही आप अपनी रज़ामंदी दे देते हैं, तो समाज में आपकी प्रतिष्ठा अनुसार विवाह संपन्न कर पायेगें। आज की युवा पीढ़ी अपनी सोच के अनुसार आगे बढ़ना चाहती है। विवाह करने की समस्या का चित्रण है, तो कहीं समय पर विवाह न करने की त्रासदी को लेखिका शिवानी के अपने उपन्यास ‘चौदेह फेरे’ में उठाया गया है। आर्थिक समस्या से ग्रस्त युवा पीढ़ी अपनी ज़िम्मेदारियों का बोझ ढोते-ढोते निराश एवं हताश हो गई है। विवाह समय पर ना होने की पीड़ा को अभिव्यक्त करते हुए कहा है- “नई पीढ़ियाँ बहक कर रह गई थी,पर कर्नल की दृष्टि में दोषी नई पीढ़ी नहीं, पुरानी पीढ़ी थी। जैसे मनुष्य के पेट की क्षुधा समय पर भोजन न जुटने से निकृष्ट कार्य करने की वांछित कर देती हैं,ऐसे ही शरीर की क्षुधा को भी मनुष्य भला भुला नहीं सकता। सब समय पर ही कन्यादान की सप्तपदी से मुक्ति क्यों पा लेते?।”5 लेखिका आज की पीढ़ी पर कटाक्ष करते हुए अपनी वेदना व्यक्त कर रही है। शादी भी समय पर हो जानी चाहिए। समस्या और स्थिति में व्यक्ति को कितना असहाय बना दिया है। स्वार्थ और ज़रूरतों के कारण व्यक्ति केवल अपना ही हित सोचता है। शाल्मली जीवन में कुछ करना चाहती है। पति उसे न तो आगे बढ़ने देता है, बल्कि बात-बात पर अपमान भी करता है। शाल्मली इस पीड़ा से उभरना चाहती है। शाल्मली अपनी वेदना को व्यक्त करते हुए कहती है- “हर मनुष्य की बौद्धिक क्षमता की एक सीमा होती है और वही उसका मापदंड भी, जो ना किसी अन्य के प्रभाव को ग्रहण करती है, और न ही घटती-बढ़ती है। यह तो व्यक्ति की निपट निजी निधि है जहाँ अच्छी-बुरी संगति अवश्य ही व्यवहार प्रभावित करती है, सो नरेश से आशा करा कि उसका बौद्धिक विकास, अपनी शक्ति और परिधि को तोड़ते हुए बाहर निकल कर कुछ नया रच डालें, यह असंभव है, मगर उसके व्यवहार में बढ़ती उद्दंडता को वह अपने प्रयत्नों से अनुशासित तो कर सकती है।”6 नायिका शाल्मली पति नरेश के व्यवहार से अत्यंत दुखी है। नरेश के साथ जीवन जीना अभिशाप हो गया है। शाल्मली नरेश के प्रति अपना रोष प्रकट कर रही है। यहाँ लेखिका नासिरा शर्मा ने वैयक्तिक मूल्यों के रूप को स्पष्ट किया है।

वैवाहिक जीवन में संबंध जहाँ खुशहाली का प्रतीक माना जाता है वही आज कष्टकारी एवं दुखदायी बन रहा है। पति-पत्नी एक छत के नीचे रहते हुए एक-दूसरे की शक्ल भी नहीं देखना चाहते- कारण परिवार और समाज के बंधनों में बँधे हुए हैं। लेखिका कुसुम अंसल ने ‘अपनी-अपनी यात्रा’ में संबंधों में आए बिखराव की छटपटाहट को सुरेखा के माध्यम से दिखाने का प्रयास किया है- “एक-दूसरे को न चाहकर भी एक छत के नीचे रहते थे क्योंकि बंधन है परिवार का,समाज का और विवाह का। माँ-बाप जिसने उनका जी चाहता हैं अपनी लड्की या लड़के को बाँध देते हैं कि लो यह तुम्हारा जीवन साथी है। बस पकड़े रहो,सड़ते रहो कि अगर विद्रोह करोगे तो सब कहेंगे। चरित्रहीन है,बुरी है, निभाना नहीं आता।”7 विवाह जैसे संबंधों में दबाब नहीं होना चाहिए। समाज एवं परिवार का डर जीवन को नष्ट कर देता है। व्यक्ति की विचारधारा न मिलने के कारण मजबूरी में साथ रहना किसी सज़ा से कम नहीं है। लेखिका ने समाज की परंपराओं का विरोध कर परिवर्तन करने की माँग की है। संबंधों को ख़ुशी से जीना चाहिए दबाव से नहीं।

पुरानी जड़ परंपराओं का विरोध और नए मूल्य को स्थापित कर लेखिका मृदुला गर्ग ने अपने उपन्यास ‘मैं और मैं’ में स्पष्ट किया गया है- “तमाम रिश्ते, मूल्य, धारणाएँ ना झूठी हैं। लाशें जिन्हें कठपुतली वाले ने डोर से बाँध रखा है और इधर-उधर नाच रहा है। उसके इशारों पर नाचने को ज़िंदगी का नाम दे भले ही दें, है वह मौत का हिस्सा।”8 रिश्ते बन गए हैं। संबंधों में दरार आने से उत्पन्न कड़वाहट बढ़ती जा रही है। इसी बदलाव को लेखिका सिम्मी हर्षिता ने ‘संबंधों के किनारे’ में दृष्टिगत किया है। वैवाहिक स्त्री कैसे दोहरा जीवन जीती है। संबंधों में आए बदलाव को दिखाया गया है। विवाह के पहले और बाद के संबंधों में परिवर्तन के कारण विरोध की स्थिति को व्यक्त किया है- “विवाह अजीब पहेली है। उसमें कदम रखते ही आमतौर पर इंसान के लिए पहले के रिश्ते-नाते पिछला स्टेशन बन जाते हैं। रेलगाड़ी में बैठा इंसान पिछले स्टेशन के प्रति अगले स्टेशन के प्रति उत्सुक होता है।............ नए सिरे से वह पुराने संबंधों की जांच-पड़ताल करता है,कुछ की छँटनी करता कुछ को स्वीकार करता है............ कुछ को अनावश्यक समझकर अस्वीकार करता है। कुछ से वह अपने दोषों और कमियों के कारण आँखें चुराता है। आधुनिकता से उसे कुछ पुराने संबंध और संबंधी पिछड़े हुए दक़ियानूसी लगते है, तो उनसे बचता है। लोग तो अपने माँ-बाप और भाई-बहन की छँटनी कर देते है।”9 समयानुसार रिश्तों में परिवर्तन आ गया है। संबंधों का महत्व भी स्थिति-परिस्थितिनुसार बदलने लगा है। कोई भी रिश्ता सच्चा अच्छा नहीं लगता। स्त्री अपने द्वारा स्थापित संबंधों का ही मान-सम्मान करती है। स्त्री जीवन में संबंधों के अनुसार अपना जीवन जी सकती है।

संबंधों का निरंतर टूटना व्यक्ति को तोड़ देता है। आधुनिक युग में संबंधों की परिभाषा ही बदल गई है। संबंधों में प्यार, समपर्ण की जगह छल-कपट ने ली है। समाज में रिश्तों की उठा-पटक से वैवाहिक संबंधों में अविश्वास कमी होने लगी है। पति-पत्नी का एक-दूसरे पर विश्वास ही नहीं है। संबंधों में रिक्तता बढ़ने से उनका अस्तित्व ही ख़त्म हो गया है। उपन्यास ‘टूटता हुआ इंद्रधनुष’ में रिश्तों में खट्टास उत्पन्न हो गयी है। पत्नी के अन्य पुरुष से संबंध की जानकारी पति प्रभात को है। प्रभात का पत्नी शोभना के प्रति प्यार समाप्त हो गया है। पत्नी शोभना व्यंग्य करते हुए कहा है- “जीवन में कोई भी महत्वपूर्ण नहीं है कि उसके न होने से संपूर्ण जीवन ही नष्ट हो जाये जो बीत गया उसका शव लेकर बैठे रहना समझदारी नहीं है।”10 संबंधों में दरार आने से अच्छा है, उनका ख़त्म होना। रिश्तों को घसीटते रहना समझदारी नहीं है। मनुष्य का महत्त्व उसकी भावनाओं पर टिका हुआ है। भावना ख़ त्म तो रिश्तों को बहुत दूर तक ले जाया जा सकता।

 इक्कीसवीं शताब्दी में जहाँ नारी का स्वरूप का बदला और उसका पुनरूत्थान हुआ। संविधान में स्त्री को समानता का अधिकार और जीवन में आगे बढ़ने की नई-नई राहें दिखायीं। पुरुष-प्रधान समाज में उसने पुरुषों के विरुद्ध अपनी नई पहचान बनायी। लेखिका मंजुल भगत ने नारी के संघर्ष और द्वंद्व को उपन्यास ‘अनारो’ में दिखाया गया है। अपने स्वाभिमान के कारण अनेक समस्याओं से जूझती है। पति के सामने उसका रुतबा बना रहे। उसके लिए वह प्रयत्नशील रहती और कहती है- “कर्जा तो यों चुटकियों में उतर जायेगा, पर मान, उसकी कदर बनी रहे, उसके मरद की नजर में।”11 अनारो अपनी बेटी की शादी में कर्ज़ा लेने के बाद भी उसे चुकाने की हिम्मत रखती। परिवार एवं समाज में अपनी प्रतिष्ठा को बनाए रखने के लिए दिन-रात मेहनत कर संघर्ष करती है। बेटी के लिए परिवार और समाज से भी लड़ जाती है, तो दूसरी तरफ़ रिश्तों में स्वार्थ आ जाने से उनके अर्थ ही बदल गए है। उपन्यास ‘बियावान में उगते त्रिशंकु’ में माँ-बेटी के रिश्ते में परिवर्तन को दिखाया गया है। लेखिका ने पात्र टीना के मन में हो रही छटपटाहट को दिखाया है- “ममा अपने पालन-पोषण का बदला चाहती है क्या मुझसे? मुझे कौन-सा रहना है इस घर में। जब तक हूँ, तब तक हूँ। मैं तो अपने सुख को सबसे अधिक महत्व देती हूँ। मुझे त्याग-बलिदान का बिल्ला नहीं चाहिए। नफ़रत है मुझे इन शब्दों से। त्याग-बलिदान के नाम पर अपनी अम्मा को दुखी बनाना सबसे बड़ा पाप है, जो मैं नहीं करूँगी। किसी के लिए भी यह पाप नहीं करूँगी।”12 माँ को अपने बच्चे के लिए किन-किन समस्याओं का सामना करना पड़ता है, लेकिन जब बच्चे बड़े हो जाते हैं, तो अपने रास्ते खुद ही चुन लेते हैं। माता-पिता की कोई फ़िक्र ही नहीं होती। वातावरण में कितना परिवर्तन आ गया है। नवीन मूल्य, परंपराओं और मान्यताओं को अपनाते हुए सुनैना समययानुसार परिवर्तन भी करती है और पूर्ण रुप से अधिकार भी चाहती है- “मुझे माई नहीं बनना, कैदी नहीं बनना। माँ ने आकाश में एक पंछी दिखाया था, जो एक ही जगह तीव्रगति से उड़ने की प्रक्रिया में लीन था। वह पंछी देखो। पंछी असीम अंबर में एक जगह पंख फड़फड़ा रहा था। लग रहा था कि सारा आकाश उसी का है। पर तो क्या? खाली अर्थहीन आकाश किस काम का? अंत आकाश में बेमतलब घुमड़ती ताकत है बेकार होगी पर दूर-दूर तक फैली कमज़ोरी में ताकत का असर हो सकता है,मुझे क्या पता था।”13 लेखिका गीताजंलि श्री ने उपन्यास ‘माई’ में नारी के अधिकारों की बात की गई है। समाज में स्वतंत्र होकर जीना चाहती है।जीवन में किसी का भी बंधन उसे स्वीकार नहीं है। उपन्यास ‘आँखमिचौली’ में नायिका रेणु अपनी शर्तों एवं दृढ़ निश्चय के साथ जीवन में आगे पढ़ना चाहती है। जीवन यूँ तो संघर्ष से भरा हुआ है। अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए वह हमेशा प्रयासरत होना चाहती है। रेणु जीवन में कुछ करना एवं पाना चाहती है- “जिंदगी से जो माँगा वह उसे कभी मिला। जो मिला उसके लिए कोई निश्चित एक बड़े प्रश्नचिहन की तरह आती-जाती रही और रेनू एक यंत्रचालित मशीन बन गई। पुर्जा-पुर्जा किन्हीं अदृश्य हाथों में संचालित होता है।”14 सामाजिक एवं पारिवारिक दबाब ने रेणु को अपने लक्ष्य से भटकाव की स्थिति में ला खड़ा कर दिया। रेणु जीवन में समस्याओं से निरंतर टकराते हुए अपने उद्देश्य तक पहुँचने के लिए कारण एवं उपाय ढूँढ़ती- “वह अपनी जिंदगी को बदल देना चाहती थी, लेकिन किस दिशा में,किस सीमा तक...........यह समझ में कब आया, इतनी क्षमता भी उसमें कहाँ भी। बड़े-बड़े सिद्ध पुरुष त्रिकालदर्शी यही तो मात खा जाते हैं। उसे अब भी किसी ऐसे पुरुष की तलाश थी, जो पूरी दृढ़ता से यह कह सके कि जिंदगी की बागडोर पूरी तरह उसके हाथ में है, वह जब किधर चाहे उसे मोड़ दे सकता है।”15 लेखिका ने रेणु की नवीन सोच एवं जीवन में आगे बढ़ने की लालसा को दिखाया है। एला परंपरागत रूढ़ियों और मूल्यों का विरोध कर अपने अस्तित्व को नई दिशा देते हुए कहती है- “मुझ पर उनका रत्ती भर भी प्रेम चाह नहीं है केवल शारीरिक आवश्यकता मिटाने के लिए वह शादी का स्वांग रच कर एक स्त्री की जिंदगी बर्बाद जिसने की वह मेरा प्रेम करे लूट सकता है। मैं उनमें से नहीं जो स्त्रियाँ अपने को क्रीत दासी समझा करती हैं।”16 एला पति के दबाव में नहीं रह सकती। उसे अपने जीवन को पति या परिवार तक ही सीमित नहीं रखना। पुरानी जड़ परंपराओं और किसी घसी-पिटी मान्यताओं में रहकर अपना जीवन व्यर्थ नहीं करना। लेखिका उषा देवी ‘मित्रा’ ने नारी के मन की व्यथा को अभिव्यक्त किया है।

स्त्री अपनी सभी इच्छाओं का गला घोंट अपने परिवार का निर्वाह करती है। संबंधों में कोई टकराव एवं बिखराव उत्पन्न न हो। इसके लिए वह भरसक कोशिश करती है।समकालीन लेखिकाओं ने अपने उपन्यासों में सामाजिक एवं सांस्कृतिक क्षेत्र में मूल्य किस तरह बदल रहे है। पहले स्त्री अपनी मर्ज़ी का कुछ नहीं कर सकती थी लेकिन अब वह समाज में परिवार में अपना सम्मान चाहती है। उपन्यास ‘अकेला पलाश’ में लेखिका ने स्त्री की नवीन विचारधारा को दिखाया है। पति के साथ वह अन्य पुरुष के साथ संबंध को ख़राब नहीं समझती। घर-परिवार में यदि इस बात की भनक लग जाए तो ना जाने कैसे-कैसे नामों से बुलाया जाता है। ज़िंदगी और घर दोनों ही मरण समान हो जाते हैं। नायिका अपने मन की बात अपने भाई से कहती है। भाई अपनी बहन को ज़िंदगी का फ़लसफ़ा समझाते हुए कहता है- “नहीं........ मैं तो यही कहूँगा कि दीदी ने देर से सही, पर सही कदम उठाया है। अब मेरी दीदी घुट-घुटकर नहीं मरेगी। अब उसने भी खुली हवा में साँस लेना सीख लिया है।”17 स्त्री अब घुटकर नहीं जियेगी। अपनी इच्छा अनुसार अपना जीवन जियेगी। आधुनिक युग में नारी भी अपनी मर्यादा को छोड़कर वातावरण के अनुसार अनुसार ढल रही है। उपन्यास ‘यहाँ विस्तृता बहती है’ में लेखिका ने पात्र के माध्यम से आज की बदलती परिस्थितियों के बारे में कहा है- “अजी आप लोग खैर-खबर रखते भी हैं, कुछ एन्थोनी भाई? लड़कियों को शह दी है आपने, नहीं तो मजाल था कि वह मुँह उठाकर लड़कों को देख भी लेती? इधर तो पूरी मर्दमार बनती जा रही हैं लड़कियाँ।”18 आज की नारी अपने पहनावे एवं बोलने में पूरी स्वतंत्रता चाहती है। रोक-टोक रोष उत्पन्न करता है। नारी अब किसी भी स्तर पर अपने आप को कमज़ोर नहीं समझती।

आज मूल्यों में इतना परिवर्तन आ गया है। पुरुष के साथ-साथ स्त्री भी किसी संकट के सामने घुटने नहीं टेकती चाहे वह सही हो या ग़लत। लेखिका मनु भंडारी ने उपन्यास ‘आपका बंटी’ में स्त्री कि दृढ़ निश्चय को दिखाया है। वह अपने व्यक्तित्व के लिए किसी भी परंपरा, मान्यता और रूढ़ि का विरोध कर सकती है। हर समस्या के लिए उपस्थित है- “भीतर-ही-भीतर चलने वाली एक अजीब ही लड़ाई थी वह भी, जिनमें दम साधकर दोनों ने हर दिन प्रतीक्षा की थी कि कब सामने वाले की साँस उखड़ जाती है और वह घुटने टेक देता है, जिससे कि फिर बड़ी उदारता और क्षमता के साथ उसके सारे गुनाह माफ़ करके उसे स्वीकार कर लें, उसके सारे व्यक्तित्व को निरे शून्य में बदल कर।”19 नारी के शिक्षित होने से वह किसी भी वह कठिन से कठिन समस्या का सामना कर लेती है।

समग्रत: कहा जा सकता है कि समकालीन लेखिकाओं ने अपने उपन्यासों में परंपरागत मूल्यों को अस्वीकार कर वर्तमान मूल्यों में हो रहे परिवर्तन को स्वीकार किया गया है। इन लेखिकाओं ने उपन्यासों में मूल्यों को स्थापित करने के लिए नवीन चिंतन और सामाजिक जीवन को आधार बनाया है। उपन्यासों में विघटित मूल्य, नारी शोषण और ‘स्व’ को स्थापित करने की कामना की स्थिति का अंकन किया है। पुरानी एवं नई पीढ़ी के विचारों के विरोधी स्थिति, मानसिक एवं शारीरिक विसंगतियों का चित्रण किया गया है। सामाजिक, आर्थिक एवं धार्मिक मूल्यों पर कटाक्ष किया है साथ ही साथ एवं पारिवारिक मूल्यों के महत्व देते हुए मानव मूल्यों की स्थापना के लिए संघर्षरत है।

संदर्भ :

1. पाल हान्ले फर्मे- अनुवाद, समाजशास्त्र का क्षेत्र एवं पद्धति- हरिश्चंद्र उप्रेती, पृ. 821
2. प्रेमचंद- गोदान, पृ. 13
3. शशिप्रभा शास्त्री- क्योंकि, पृ. 41
4. वही ,पृ. 48
5. शिवानी- चौदेह फेरे, पृ. 51
6. नासिरा शर्मा- शाल्मली, पृ 155-156
7. कुसुम अंसल –अपनी-अपनी यात्रा,पृ.47
8. मृदुला गर्ग -मैं और मैं, पृ. 3
9. सिम्मी हर्षिता- संबंधों के किनारे, पृ 219-220
10. मंजुल भगत- टूटता हुआ इंद्रधनुष, पृ.34
11. मंजुल भगत- अनारो, पृ. 104
12. डॉ. सुधा श्रीवास्तव- बियाबान में उगते त्रिशंकु, पृ. 86
13. गीतांजलि श्री- माई, पृ. 61
14. दिनेशनंदिनी डालमिया-आंखमिचौली, पृ. 220
15. वही, पृ. 220
16. उषादेवी ‘मित्रा’- नीड़, 191
17. मेहरुन्निसा परवेज- अकेला पलाश, पृ.152
18. चंद्रकांता- यहां विस्तृता बहती है, पृ. 59
19. मन्नू भंडारी- आपका बंटी, पृ 35-36

0 टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें