साहित्य सिनेमा एवं आम आदमी

01-04-2019

साहित्य सिनेमा एवं आम आदमी

डॉ. छोटे लाल गुप्ता

भारतीय सिनेमा ने आम आदमी के साथ चलते-चलते सभी सामाजिक और धार्मिक वर्जनाओं और राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय सीमाओं को तोड़ा है लेकिन साहित्य का दामन कभी नहीं छोड़ा। हाँ, ऐसे दृष्टांत बहुतायत से देखने को मिले हैं कि साहित्यिक कथाओं को फ़िल्मों में तोड़-मरोड़कर प्रस्तुत किया गया है, व्यवसायिक फ़िल्मों की अंधाधुंध दौड़ की साहित्यिक कथाएँ भी फ़िल्माई जाती रही हैं और फ़िल्माई जाती रहेंगी। यद्यपि अँग्रेज़ी सिनेमा की भाँति हिन्दी सिनेमा में साहित्यिक कृतियों पर उतनी फ़िल्में नहीं बनाई गई, जितनी बनाई जानी चाहिएँ थीं।

जनसाधारण के शिक्षण और मनोरंजन के लिए साहित्य और सिनेमा अलग-अलग दो ऐसी विधाएँ हैं जो मनुष्य के क्रिया-व्यापार तथा उसकी जीवन-शैली को प्रत्यक्षतः प्रभावित करती रही हैं। सिनेमा साहित्य को मूर्त और यथार्थ रूप प्रदान करने का एकमात्र माध्यम है एवं साहित्य में जिस कल्पना और सृजनात्मकता के आधार पर विशेषतया मानव समाज की सिर्फ़ छवि प्रस्तुत की जाती है, उसे विश्वासोत्पादक जीवंतता तथा प्रभावोत्पादक विश्वसनीयता प्रदान करने का कार्य फ़िल्मों के माध्यम से किया जाता है। यद्यपि इस भूमिका में नाट्यमंच पहले से ही लोकप्रिय रहे हैं; तथापि अनेकानेक कारणों से सिनेमा ने नाट्य मंचों को बेहतर ढंग से प्रतिस्थापित किया है। प्रतिस्पर्धा की दौड़ में नाट्य मंच सिनेमा से बहुत पिछड़ चुके हैं और प्रौद्योगिकी के नव प्रयोगों ने इसे जो विशिष्टता प्रदान की है, वहाँ तक पहुँच पाना नाट्य मंचों के लिए न केवल कठिन है बल्कि असंभव-सा लगता है। प्राचीन काल से ही आम आदमी की पहुँच नाट्य मंचों तक बहुत कम रही है। फ़िल्मों में चलचित्रित समाज के सभी वर्गों, परिदृश्यों और इकाइयों में घटित घटनाएँ आम आदमी को स्वतः ही आकर्षित करती रही हैं, भले ही वह आम आदमी शिक्षित हो या अशिक्षित। इसके विपरीत साहित्य में वर्णित समाज और जीवन सीमित दायरे में साहित्य-पिपासुओं को ही सर्वप्रथम प्रभावित-प्रेरित कर पाता है तथा समाज पर उसका असर धीमी गति से होता है- इतनी धीमी गति से इसमें कई-कई दशक तक लग जाते हैं। किन्तु, जब इसे फ़िल्म रूप में प्रस्तुत किया जाता है तो इसकी प्रभावकारिता इतनी प्रबल और व्यापक हो जाती है कि यह काल और जगत की सीमाएँ भी सहज एवं शीघ्र नापा जाता है। इसलिए यह कहना अत्युक्ति न होगा कि सृजित साहित्य को यथाशीघ्र फ़िल्म में रूपांतरित किया जाना चाहिए ताकि साहित्य में अभिकल्पित जीवन यथार्थ रूप में जीने और भोगने की सीमा तक परिलक्षित हो सके।

इसमें कोई संदेह नहीं है कि साहित्य और सिनेमा मानव जीवन को ही बिंबित करते हैं। यहाँ सवाल यह उठता है कि इन दोनों विधाओं में उक्त मानव जीवन किस सीमा तक ‘मानवीय’ है। एक सामान्य धारणा यह है कि राजा-रानी, देव-दानव, तोता-मैना आदि से संबंधित निरूपित घटनाएँ और गढ़ी गई गाथाएँ वास्तविक जीवन से बहुत दूर होती हैं तथा उनमें मानवोचित सहृदयता, करुणा-दया भाव, स्नेह-आत्मीयता आदि का अभाव-सा होता है। बेशक, हिन्दी साहित्य की शैशवस्था और सिनेमा की आरंभावस्था में ऐसे ही पात्रों के ज़रिए जीवित और पट्नात्मक संसार का सृजन किया गया था तथा दोनों में किसान, मज़दूर, बेरोज़गार, ग़रीब, यतीम, विधवा, बेसहारा-बेघर, वृद्ध, अपाहिज तथा आर्थिक-सामाजिक रूप से अल्पविकसित-उपक्षितजनों को नकारा गया, जनसाधारण के समक्ष ऐसे अति धनाढ्य समाज का चित्रण किया गया जिसमें हर प्रकार से सुरक्षित तथा वैभवशाली अट्टालिकाओं वाले प्रासादों के भीतर उच्च-शक्ति संपन्न राजा-महाराजा, सुलतान-बादशाह और चमत्कार करने की क्षमता रखने वाले लोग रहते हैं जो जीवन की किसी भी सीमा से परिचित नहीं हैं और जिन्हें अपने सेवकों और जनसाधारण के दुख-दर्द से कुछ भी नहीं लेना-देना है; बल्कि वे अभावग्रस्त और उत्पीड़ित लोगों के प्रति अपने उपेक्षात्मक रवैए के लिए जन-समर्थक भी हासिल कर लेते हैं। बहरहाल, सिनेमा में ऐसे रवैयों और पूर्वाग्रहों के आवर्तन का साहित्य ने ही खंडित-मंडित किया।

भारत में जिस दौर में सिनेमा ने आम जनजीवन में दस्तक दिया था, उस समय हिन्दी साहित्य में प्रगतिशील विषय उफान पर थे और शायद ही कोई ऐसा सामाजिक वर्ग होगा जो उस उफान में न वहा होगा। हिन्दी साहित्य की विशेषता प्रगतिवादी, प्रयोगवादी आदि जैसी प्रगतिशील आम आदमी के जीवन को उसकी पूर्णता के साथ मुख्य करने के लिए जनमानस को उपेक्षित कर रही थी। समाजवादी और पूँजीवादी व्यवस्था को ध्वस्त करने के लिए जो आंदोलन ज़ोर पकड़ रहा था, उसके सूत्रधार मज़दूर, किसान, दलित और उपेक्षित जन हर प्रकार से हिन्दुस्तान की मुख्यधारा में आने के लिए जद्दोजेहद कर रहे थे। साहित्य और सिनेमा दोनों शीघ्र ही आम आदमी के जीवन का दर्पण बन गए। न केवल जनसामान्य के जीवन पर आधारित साहित्यिक कथाओं ने सिने पर्दों पर अपनी पैठ बनाई बल्कि पात्रों, उनके संवादों, उनके द्वारा गाए जाने वाले गीतों और उनके सामाजिक परिवेश में आम आदमी ऐसे कुंडली मारकर बैठ गया कि करिश्माओं, अतिमानवीय कारगुज़ारियों तथा सुपरमैन-सरीखे पात्रों के महिमामंडित संसार महत्त्वहीन, अर्थहीन और उपेक्षणीय होते गए।

सामाजिक जीवन में यह बहुत बड़ा बदलाव है कि सिनेमाघरों ने भेदभाव का अन्याय मिटाकर सभी को पास-पास बैठने के लिए आमंत्रित किया। इस प्रकार शुरूआती दौर में भी जबकि पौराणिक और धार्मिक कथानकों पर ‘हरिश्चंद्र तारामती’ (1913), ‘मोहिनी भस्मासुर’ (1913), ‘लंका दहन’ (1917), ‘कृष्ण जन्म’ (1918), ‘कालिय मर्दन’ (1919) आदि जैसी मूल फ़िल्में बनीं, सभी उच्च एवं निम्नवर्ग के दर्शकों ने इन्हें देखा-सराहा और सिनेमाघरों से बाहर निकलते ही रेस्तराओं और चाय-पान की गुमटियों में बैठकर इन पर साथ-साथ चर्चाएँ की। अख़बारों और पत्र-पत्रिकाओं में उन पर विस्तृत समीक्षाएँ छपीं जिन्हें दफ़्तरों और घरों में सभी ने पढ़ा। अस्तु, उस दौर में जबकि साहित्यिक रचनाओं को फ़िल्म-रूप में प्रस्तुत करने पर फ़िल्म-निर्माताओं का ध्यान कम ही जाता था, सिनेमाघरों ने कोई भेदभाव किए बिना आदमी से आदमी को जोड़ने की कोशिश की। इन सब बातों का नतीजा यह निकला कि समाज के अभावग्रस्त, उपेक्षित, दबे-कुचले दर्शकों के प्रवेश ने फ़िल्म-निर्माताओं को इस बात पर अमल करने और सोचने के लिए विवश कर दिया कि सिनेमाघरों की दर्शक-सीटों पर ही क्यों, सिने परदों पर भी क्यों ना आम आदमी की मौजूदगी दर्ज हो।

साहित्य का आम आदमी सिनेमाघरों की सीटों से उठकर सिने पर्दों पर आने के लिए संघर्ष करने को सर्वप्रथम तेज़ी प्रदान की प्रेमचंद के साहित्य ने। उनके बारे में कुछ बातें ख़ास तौर पर उल्लेखनीय हैं। उन्होंने सन् 1907 से लेकर 1936 तक, आम आदमी को केन्द्र में रखकर नानविध सामाजिक विषयों पर ‘जागरण’, ‘हंस’, ‘जमाना’, ‘प्रताप’, ‘माधुरी’, ‘कलीम’, ‘उर्दू-ए-मुल्ला’, ‘मर्यादा’, ‘आवाज-ए-खल्क’, ‘आज’, ‘शुद्ध समाचार’, ‘कल्याण’, ‘समालोचक’, ‘युवक’, ‘धर्मवीर’ जैसी पत्र-पत्रिकाओं में प्रचुर लेख, संपादकीय, समीक्षाएँ और टिप्पणियाँ लिखी थीं जिन्हें सभी तबक़ों के लोगों द्वारा पढ़ा गया। इन सारगर्भित और प्रासंगिक लेखों, टिप्पणियों आदि में उन्होंने न केवल गुलाम भारत की दिलचस्प तस्वीर खींची अपितु अंतर्राष्ट्रीय स्पर पर सामाजिक एवं राजनीतिक परिदृश्य को प्रभावित करने वाले तथ्यों, घटनाओं और आम जनजीवन पर अपने बेबाक विचार प्रकट किए। वास्तव में, प्रेमचंद सामाजिक रूप से अत्यंत जागरूक और संवेदनशील व्यक्ति थे जो साहित्य में पदार्पण करने से पहले इस देश के आम जीवन का जायज़ा बड़ी सूक्ष्मता से ले रहे थे।

इसमें दो राय नहीं होनी चाहिए कि सिनेमा का प्रगतिशील काल प्रेमचंद के आगमन से ही चमत्कृत हुआ बल्कि यूँ कहना चाहिए कि सिनेमा का स्वर्ण युग प्रेमचंद की कहानियों के हस्तक्षेप से ही आरंभ होता है जबकि उन्होंने बड़े ठोस इरादे से मुंबई (दादर) के फ़िल्म-निर्माण उद्योग में वर्ष 1934 में वार्षिक अनुबंध पर प्रवेश किया था और मोहन भवनानी की फ़िल्म प्रोडक्शन कम्पनी ‘अजंता सिनेटोन’ से वे पटकथा लेखक के रूप में जुड़े थे यद्यपि वह वहाँ अपना पैर पूरी तरह नहीं जमा पाए थे। काल ने उनके साथ छल करते हुए वर्ष 1936 में उनका भौतिक अस्तित्व ही मिटा दिया; अन्यथा कुछ साल संघर्ष करने के पश्चात वह सिनेमा के न केवल न वैचारिक उन्नायक बनते बल्कि इसके कायांतरण में भी उनकी प्रखर भूमिका होती। बेशक वह फ़िल्म-निर्देशक और फ़िल्म-निर्माता भी बनते। तब तो सिनेमा का परिदृश्य ही बिल्कुल अलग होता जहाँ आम आदमी का प्रतिनिधित्व शत-प्रतिशत होता। उपन्यास सम्राट प्रेमचन्द का दृष्टिकोण गुलाम देश के आम जन-जीवन में क्रांतिकारी परिवर्तन लाना था। वह अन्यायपूर्ण अँग्रेज़ी सत्ता के कट्टर विरोधी तो थे ही, इस देश में सदियों से राजतंत्रीय व्यवस्था के क्रूर क़दमों तले कुचली जनता को अत्याचारों से निजात दिलाने के लिए भी कृतसंकल्प थे। उन्होंने अपने साहित्य के ज़रिए जो कुछ भी किया, वह आम आदमी के लिए ही था जिसे कभी नहीं भुलाया जा सकता है। आम आदमी के उद्धार हेतु ऐसे विचारों के साथ प्रेमचंद के सिनेमा-उद्योग में प्रवेश से एक वैचारिक क्रांति का सूत्रपात होना बहुत ज़रूरी थी। ऐसा तभी संभव हो पाता जबकि आम आदमी समाज में बेहतर ढंग से मुखर होता और सामाजिक जीवन का वह एक अभिन्न घटक बनता।

बहरहाल, निर्माता-निर्देशक मोहन भावनानी ने बड़े विरोध और अँग्रेज़ी शासन के ख़िलाफ़ श्रमिक एकता लाने के लिए वर्ष 1934 में श्रमिक जीवन को केन्द्र में रखकर उनकी एक क्रांतिकारी कहानी पर ‘मज़दूर’ फ़िल्म बनाने की गुस्ताख़ी की। प्रेमचंद ने ख़ुद इस फ़िल्म में एक श्रमिक नेता के रूप में अभिनय भी किया था, जिससे यह अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि फ़िल्म उद्योग में उनका पदार्पण महज़ इत्तफ़ाक़ नहीं था, बल्कि वह इसे लेकर बहुत गंभीर थे। बहरहाल, उक्त फ़िल्म के मुंबई में रिलीज़ पर वहाँ के एक प्रभावशाली बिजनेसमैन ने कोर्ट का स्थगन आदेश ले लिया था। दरअसल, इस फ़िल्म ने मज़दूर संगठनों को अपने हित और राष्ट्रीय स्वतंत्रता के प्रति इतना जागरूक बना दिया कि अँग्रेज़ हुक्मरानों ने इस पर सेंसर लगा दिया। यद्यपि इस फ़िल्म का प्रदर्शन कहीं-कहीं कुछ महीनों तक ही हो सका तथापि इसने साहित्य में पाँव जमा रहे उपेक्षित श्रमिक के रूप में आम आदमी को सिने परदों पर प्रतिबंधित करके फ़िल्म-निर्माताओं को नव-प्रयोगों के प्रति अत्यंत मुखर बनाया। इसके चलते उसी वर्ष फ़िल्म-निर्माता नानूभाई वकील ने प्रेमचंद के उपन्यास ‘सेवासदन’ के कथानक पर आधारित फ़िल्म बनाई और तत्पश्चात इसी उपन्यास पर वर्ष 1938 में तमिल फ़िल्म-निर्माता के. सुब्रमण्यम ने फ़िल्म बनाई जो बाॅक्स आफ़िस पर बेहद सफल रही। ‘सेवासदन’ पर बनी दोनों फ़िल्म केवल इसलिए मकबूल रहीं कि इनमें आम जनजीवन की जटिलताओं, स्त्रियों से संबंधित समस्याओं, उपेक्षितों के शोषण और सामाजिक क्रूरताओं का यथार्थ चित्रण है।

इस प्रकार सिनेमा जगत का स्वर्णिम दौर 20वीं शताब्दी के तीसरे दशक से आरंभ हुआ। प्रेमचंद के अवतरण से पहले बांग्ला कथा-साहित्य का हिन्दी फ़िल्मों में आशाजनक प्रयोग किया गया। चूँकि उस दौर में हिन्दी का कथा-साहित्य अपेक्षानुसार समृद्ध नहीं था, इसलिए बांग्ला कथा-साहित्य का हिन्दी में धड़ल्ले से अनुवाद हो रहा था और इस दिशा में स्वयं बांग्ला साहित्यकार और खासतौर से बांग्ला फ़िल्म-निर्माता अगुवाई कर रहे थे क्योंकि उन्हें बहुसंख्यक हिन्दीभाषी जनता की हिन्दी फ़िल्मों की माँग जो पूरी करनी थी। यह बात विशेष रूप से रेखांकित की जानी चाहिए कि बांग्ला कथा-साहित्य हर नज़रिए से आम आदमी की जीवनचर्या और उसके क्रिया-व्यापार पर केन्द्रित था- आम आदमी की संवेदनाओं का सफल संवाहक था। आम आदमी को फ़िल्म और साहित्य के ज़रिए समाज में मुखर करने के लिए प्रयास भी हुए। शरतचंद्र चट्टोपाध्याय की बांग्ला कृति ‘देवदास’ पर आधारित 1936 में ‘प्रमथेस बरूआ’ फ़िल्म बनी जिसके कथानक का आधार बनाकर 1955 में दिलीप कुमार द्वारा अभिनीत एक फ़िल्म बनाई गई और 2002 में संजय लीला भंसाली ने भी ‘देवदास’ फ़िल्म बनाई। यह फ़िल्म हर आम आदमी के दिल में धड़कत प्यार की हृदयस्पर्शी कहानी कहती है। चट्टोपाध्याय के उपन्यास ‘परिणीता’ पर आधारित बिमल रॉय ने 1953 में, अजय कार ने 1969 में और प्रदीप सरकार ने 2005 में फ़िल्में बनाई।

यह फ़िल्म औरत की अस्मिता को बार-बार रेखांकित करती है। वर्ष 1948 में शाहिद लतीफ ने इस्मत चुगताई की कहानी पर आधारित ‘ज़िद्दी’ फ़िल्म का निर्देशन किया। 1954 में विमल राॅय के निर्देशन में चट्टोपाध्याय के उपन्यास पर ‘बिराज बहू’ फ़िल्म बनाई गई। इन दोनों फ़िल्मों में भी सनातनी रवायत से आबद्ध आम औरत की ज़िन्दगी को व्याख्यापित किया गया है। सुबोध घोष की कहानी पर 1959 में ‘सुजाता’ का निर्देशन विमल रॉय ने ही किया। यह फ़िल्म छुआछूत की कुप्रथा पर केन्द्रित है। 1961 में चतुरसेन के उपन्यास ‘धर्मपुत्र’ पर केन्द्रित इसी नाम से यश चोपड़ा ने फ़िल्म बनाई। यह फ़िल्म एक मुस्लिम दंपति के अवैध संतान की कहानी है जिसमें उस मुस्लिम बच्चे का पालन-पोषण एक उदारवादी हिन्दू परिवार करता है। 1962 में विमल मित्र के उपन्यास ‘साहब, बीबी और गुलाम’ पर गुरूदत्त के बैनर तले अबरार अल्वी ने फ़िल्म बनाई। 1963 में त्रिलोक जेटली के निर्देशन में प्रेमचंद के उपन्यास ‘गोदान’ पर गाँव के परिवेश में वहाँ के दयनीय जीवनचर्या पर केन्द्रित फ़िल्म बनाई गई। चारूचंद्र चक्रवर्ती के बांग्ला उपन्यास ‘तामसी’ पर बिमल रॉय ने 1963 में ‘बंदिनी’ का निर्देशन किया और 1965 में रवीन्द्रनाथ टैगोर की कहानी ‘काबुलीवाला’ पर आधारित हेमन गुप्ता के निर्देशन में एक फ़िल्म का निर्माण किया। जनमानस के अभिनेता बलराज साहनी द्वारा अभिनीत यह फ़िल्म विदेश में रहने वाले देशभक्त की भावनाओं को व्यक्त करती है। 1966 में प्रेमचंद्र के उपन्यास ‘गबन’ पर फ़िल्म का निर्देशन ऋषीकेश मुखर्जी ने किया। 1968 में गुजराती कथाकार गोवर्धनराम माधवराम त्रिपाठी के उपन्यास को आधार बनाकर गोविंद सरैया ने ‘सरस्वतीचन्द्र’ का निर्माण किया। इस फ़िल्म में तत्कालीन संक्रमणशील समाज में सनातनी परंपराओं और पुराने मूल्यों के साथ नवीन मूल्यों को अपनाए जाने की कहानी गढ़ी गई है। 1969 में मृणाल सेन ने बलाई चंद्र मुखोपाध्याय की बांग्ला कहानी पर आधारित ‘भुवन सोभ’ का निर्माण और निर्देशन किया। यह फ़िल्म एक विधुर की कहानी है जो सिविल सेवा का एक आम कर्मचारी है। 1970 में असित सेन ने आशुतोष मुखर्जी के बांग्ला उपन्यास पर आधारित ‘सफ़र’ फ़िल्म का निर्देशन किया। यह फ़िल्म दो ग़रीब भाइयों के बीच एक औरत के प्रेम की कहानी कहती है। कहानी का अंत त्रासद एवं दुखांत होता है। 1971 में के.बी. तिलक ने शरतचंद्र चट्टोपाध्याय की कृति ‘बिन्दुर छेले’ पर ‘छोटी बहू’ फ़िल्म का निर्देशन किया जो एक मध्यवर्गीय परिवार की कहानी है। 1975 में कमलेश्वर की कहानी ‘आगामी अतीत’ पर केन्द्रित ‘मौसम’ फ़िल्म का निर्देशन-निर्माण गुलज़ार ने किया। यह फ़िल्म भी दो प्रेमियों के प्रेम की कहानी पर आधारित है जिसमें प्रेम में विफल प्रेमी कोई पच्चीस साल बाद अपनी प्रेमिका की तलाश में निकलता है जबकि उसे पता चलता है कि उसका विवाह किसी अपाहिज के साथ हो गया है और वह एक बच्ची को जन्म देकर मर चुकी है जो बड़ी होकर एक वेश्यालय में काम करती है। ऐसे मे उक्त प्रेमी को उसे अपनाने के लिए उसे ख़रीदना पड़ता है।

तरूण मजूमदार ने बांग्ला लेखक विमल कार के उपन्यास पर ‘बालिका बधू’ का निर्देशन 1976 में किया। यह फ़िल्म मध्यवर्गीय सनातनी परिवार में एक अविवाहित नाबालिग कन्या की कहानी पर आधारित है। सत्यजीत राय ने 1977 में प्रेमचंद की कहानी ‘शतरंज के खिलाड़ी’ पर आधारित फ़िल्म का निर्देशन किया। इसकी कहानी 1856 में अवध नवाब वाजिद अली शाह के दो अमीरों के इर्द-गिर्द बुनी गई है जो शतरंज के खेल में मशगूल होने के कारण अपने शासन, परिवार और जनता के हित को भी ताक पर रख देते हैं। इसकी क़ीमत उन्हें अपनी हुकूमत गवांकर चुकानी पड़ती है। यह फ़िल्म हमारी गुलामी के कारणों की बख़ूबी पड़ताल करती है। 1960 के दशक में बांग्ला फ़िल्मकार मोनी भट्टाचार्य के निर्देशन में चंद्रधर शर्मा गुलेरी की अमर कहानी ‘उसने कहा था’ पर भी फ़िल्म बनी जिसमें आम जीवन में प्रेम के महत्त्व को बेहतरीन ढंग से रेखांकित किया गया है। विमल राॅय प्रोड्क्शन की यह कहानी प्यार के प्रति समर्पण और त्याग का मार्मिक संदेश देती है कि आम आदमी के जीवन में प्यार का कितना महत्त्व है जहाँ जान न्योछावर करना भी कोई बड़ी बात नहीं होती।

1978 में रस्किन बांड के उपन्यास ‘ए फ़्लाइट ऑफ़ पीजन्स’ पर केन्द्रित ‘जुनून’ फ़िल्म का निर्देशन श्याम बेनेगल ने किया। 1980 में शतचंद चट्टोपाध्याय के उपन्यास ‘निष्कृति’ पर बासु भट्टाचार्य ने ‘अपने पराए’ नामक फ़िल्म का निर्देशन किया जो टूटते हृदयवहीन संबंधों की कहानी है। श्याम बेनेगल ने धर्मवीर भारती के उपन्यास ‘सूरज का सातवां घोड़ा’ को 1992 में फ़िल्माया। आज़ादी के बाद की पृष्ठभूमि में छोटे क़स्बे में निम्न मध्यम वर्ग के सामाजिक ताने-बाने को इस फ़िल्म का आधार बनाया गया है। 1998 में खुशवंत सिंह के उपन्यास पर केन्द्रित ‘ट्रेन टू पाकिस्तान’ फ़िल्म का निर्देशन पामेला रूक्स ने किया। 2002 में अर्जुन सजनानी ने गिरीश कर्नाड के अँग्रेज़ी नाटक ‘रेन एंड फायर’ पर आधारित ‘अग्निवर्षा’ का निर्देशन किया। 2004 में अनुराग कश्यप ने एस. हुसैन जै़दी के अँग्रेज़ी उपन्यास ‘ब्लैक फ्राइडे-द टू स्टोरी ऑफ़ बॉम्बे ब्लास्ट्स’ पर आधारित ‘ब्लैक फ़्राइडे’ नामक फ़िल्म का निर्देशन किया। राजकुमार हिरानी ने चेतन भगत के उपन्यास ‘फ़ाइव समयन’ पर केन्द्रित ‘थ्री इडियट्स’ का निर्माण 2009 में किया। साहित्यिक कथाओं पर आधारित इन सभी फ़िल्मों ने समाज में मानवीय भावनाओं और संवेदनाओं का संचार किया। इंसानी बेचारगी, अंधी परंपराओं और दकियानूसी रीत-रिवाजों के बोझ से बिलखते आदमी की मजबूरी, स्त्री-दासता, अँग्रेज़ी गुलामी, युवाओं के भटकाव आदि जैसे विषयों को बार-बार रेखांकित किया गया है।

प्रेमचंद के कथा-साहित्य ने भारतीय सिनेमा को जनसाधारण के जीवन पर आधारित समृद्ध कथाएँ गढ़ने की बेमिसाल परंपरा दी जिससे हटकर सोचने की बात आज के फ़िल्म-निर्माताओं के जेहन में आती ही नहीं। स्त्रियों और ख़ासकर विधवाओं की समस्याएँ, महाजनी व्यवस्था से त्रस्त गाँवों के दर्द, भेदभावपूर्ण, जातीय द्वंद्व, अस्पृश्यों की व्यथा, दलितों के उत्पीड़न आदि जैसे विचार उनकी परवर्ती फ़िल्मों में बार-बार प्रमुखता से उभरकर लोगों को द्रवित करते रहे हैं। 1936 में उनके स्वर्गवास के बाद जब उनके उपन्यास ‘गोदान’, ‘गबन’ और ‘रंगभूमि’ पर भी फ़िल्में बनीं तब ऐसा माना जाने लगा कि हिन्दुस्तानी फ़िल्मों का उद्देश्य ही उस गुलामी के दौर में आज़ादी की आवाज़ बुलंद करने के साथ-साथ देश की जटिल, भेदभावपूर्ण और पक्षपातपूर्ण व्यवस्थाओं में पिस रहे आम आदमी को आर्थिक, धार्मिक, जातीय और सभी प्रकार की सामाजिक बर्बरताओं से निजात दिलाना है और इन उद्देश्यों के लिए प्रेमचंदीय साहित्य सर्वोपयुक्त है। प्रेमचंद की कहानियों की फ़िल्मों में उपयोगिता लगातार बढ़ती रही है और इसकी सार्थकता इस बात से भी आँकी जा सकती है कि ख़ुद गुलज़ार ने उनकी कहानियों का प्रयोग अपनी फ़िल्मों में किया है।

यहाँ एक ख़ास बात उल्लेख्य है कि 20वीं शताब्दी के तीसरे दशक से ही साहित्य और सिनेमा के बीच द्वंद्वात्मक संबंध दृष्टिगोचर होने लगे थे। जिन साहित्यकारों की कथाओं पर फ़िल्में फ़िल्माई जाती थीं, उनका आग्रह था कि उनकी कहानियों में किंचित बदलाव न किया जाए जबकि फ़िल्मकार अपनी फिल्मों को लोकप्रिय और कमाऊ बनाने के लिए गंभीर साहित्यिक कहानियों में अतिरंजित हास्य-व्यंग्य का तड़का लगाकर दर्शकों के समक्ष परोसने पर आमदा थे। साहित्यकार वल्गैरिटी के ख़िलाफ़ थे जबकि फ़िल्म-निर्माता इस वल्गैरिटी को ही तरज़ीह देते थे क्योंकि इसी के बदौलत उनकी फ़िल्में बाॅक्स आॅफ़िस पर हिट होती थीं। फ़िल्म-निर्माताओं की इस आदत से फ़िल्मों में आम आदमी की मौजूदगी पर प्रश्नचिह्न लगने लगा क्योंकि वह भी अतिरंजित प्रस्तुतियों का एक हिस्सा बनकर किसी काल्पनिक जगत का पात्र बन जाता था। साहित्य और सिनेमा के भी इस खींचातानी के चलते आम आदमी के जीवन के यथार्थ चित्रण में दिक़्क़तें आना लाज़मी था। इस संबंध में, उन सभी साहित्यकारों को बड़ी आपत्ति रही है जिनकी कहानियों पर फ़िल्में बनाई जाती थीं।

प्रेमचंद फ़िल्मों में वल्गैरिटी के सख़्त ख़िलाफ़ थे। वह साहित्य को फ़िल्म में यथावत रूपांतरित किए जाने के पक्ष में थे। उन्होंने अपने उपन्यासों और कहानियों में समाज के जिस यथार्थ और आदर्श स्वरूप का चित्रण किया है, उसके प्रमुख किरदार के रूप में मज़दूर और किसान का प्रतिनिधित्त्व आम आदमी के रूप में हिन्दी फ़िल्मों में लगातार बढ़ता रहा है। जिन साहित्येतर लेखकों की कहानियों पर फ़िल्में बनाई गईं, उनमें भी यह प्रभाव दिखाई देता है इसके अलावा, प्रेमचंद के समकाल के इर्द-गिर्द कथा-साहित्य लिखने वाले आचार्य चतुरसेन, अमृतलाल नागर, सुदर्शन, गुलेरी, भगवती चरण वर्मा, सेठ गोविंददास आदि के साहित्य पर जो फ़िल्में बनीं, वे आम के सरोकारों से जुड़ी रही हैं। इन साहित्यकारों में आचार्य चतुरसेन के ऐतिहासिक उपन्यासों में भी वर्णित राजतंत्र के वैभवशाली समाज में उन्हीं पात्रों को ज़्यादा रेखांकित किया गया है जिनसे आम आदमी स्वयं को अत्यधिक आत्मीय पाता है। इसका एक ज्वलंत उदाहरण उनके ‘वैशाली की नगरवधू’ पर लेख टंडन के निर्देशन में बनी फ़िल्म ‘आम्रपाली’ (1966) है जिसमें पाठक और दर्शक की पूरी सहानुभूति नगर की वेश्या आम्रपाली के प्रति रहती है जो स्त्री-दासता की सामाजिक व्यथा बयां करती है और जो पुरुष-भोग की एक आवश्यक वस्तु के रूप में वर्णित है। आम्रपाली भले ही एक ऐतिहासिक और पौराणिक पात्र है, वह प्रेमचंदीय नारी पात्रों की भाँति हमारी सहानुभूति, दया और सुरक्षा के लिए आर्त याचना करती हुई प्रतीत होती है। उसका आर्तनाद 1966 में फणिश्वरनाथ रेणु की कहानी ‘मारे गए गुलफाम’ की अनुकृति पर निर्मित बासु भट्टाचार्य की ‘तीसरी क़सम’ की प्रमुख किरदार हीराबाई की दमित आह के समानांतर गुंजित होता है।

प्रेमचंद के कथा-साहित्य को फ़िल्माने की कोशिश बार-बार की जाती रही है। टेलीफ़िल्में भी बनाई गईं। एक फ़िल्म ‘सद्गति’ है जिसे सत्यजीत राय के निर्देशन में तैयार किया गया। वर्ष 1981 में दूरदर्शन पर इसका प्रसारण हुआ। यह फ़िल्म चर्चा के केन्द्र में रही क्योंकि इसमें भारत के आम जीवन में विवहृत जातीय भेदभाव को जमकर उभारा गया है।

साहित्य की बेहतर समझ रखने वाले बांग्लाभाषी बासु भट्टाचार्य ने वर्ष 1969 में राजेन्द्र यादव के उपन्यास ‘सारा आकाश’ और वर्ष 1974 में मन्नू भंडारी की कहानी ‘यही सच’ (‘रजनीगंधा’) पर आधारित दो और फ़िल्में बनाई जिनमें औरत के किरदार को भारतीयता के रंग नारी के समानांतर रखा गया है। आम औरत के चरित्र को बड़े महीन स्तर पर उकेरने वाली ये दोनों फ़िल्में इतनी मार्मिक हैं कि मानस पटल पर औरत की छवि स्थायी रूप से अंकित हो जाती है। ‘सारा आकाश’ एक मध्मर्गीय परिवार की कहानी है जिसमें पति-पत्नी में विवाहोपरांत उत्पन्न विवाद को उठाया गया है।

कमलेश्वर की कहानियों ‘काली आँधी’ पर 1975 में बनी फ़िल्म ‘आँधी’ और उन्हीं की कहानी ‘फिर भी’ पर 1969 में ओ.पी. रल्हन द्वारा निर्देशित फ़िल्म ‘तलाश’ ऐसी फ़िल्में हैं जिनमें अवसादग्रस्त आदमी की निराशा और हताशा को रूपायित किया गया है। ये दोनों फ़िल्में सभी वर्गों द्वारा प्रशंसित हुई। इसका एक महत्त्वपूर्ण कारण यह भी है कि इन फ़िल्मों की कहानियों और पात्रों से हर वर्ग के और ख़ासतौर से आम आदमी ने स्वयं को जोड़कर देखा है। वास्तव में, फ़िल्म क्षेत्र में कमलेश्वर के हस्तक्षेप ने फ़िल्म जगत को मर्यादित ऊँचाइयाँ दी हैं। उनका संपर्क गुलज़ार जैसे साहित्यिक रुचि वाले अनेक फ़िल्मी हस्तियों से भी था जिन्हें कैरियर का लंबा तजुर्बा रहा है। उनके उपन्यास ‘एक सड़क सत्तावन गलियाँ’ और ‘डाक बंगला’ पर क्रमशः 1971 और 1974 में बनी दोनों फ़िल्में ‘बदनाम बस्ती’ और ‘डाक बंगला’ आम आदमी की संवेदनाओं और भावनाओं को ख़ुद में बख़ूबी समेटे हुई हैं। इस सातवें दशक में सिनेमा जगत में बौद्धिक चेतना पूरी निखार पर थी और ऐसा लग रहा था कि आम आदमी के जीवन पर केन्द्रित साहित्यिक कथाओं को फ़िल्माने का एक ताबड़-तोड़ दौर आरंभ होने वाला है। किन्तु, इसी दरम्यान, फ़िल्म जगत में दो सुपरस्टारों राजेश खन्ना और अमिताभ बच्चन के अवतरण से ऐसी साहित्येतर कथाओं को तरज़ीह दिया जाने लगा जिनसे फ़िल्मों के ऐक्शन, मार-धाड़, ग्लैमर और विस्फोटक संगीत को बढ़ावा मिल सके और फ़िल्में कमाऊ बन सकें। फ़िल्मी स्टारों ने भी अपनी मक़बूलियत के अनुसार अभिनय करने के लिए अपनी-अपनी ऊँची फ़ीसें नियत कर दीं। निर्माता-निर्देशकों की तो बात ही मत पूछिए, उन्होंने भी फ़िल्म उद्योग को सिर्फ़ सोने के अंडे देने वाली मुर्गी मान लिया। बहरहाल ऐसे निर्माता-निर्देशकों की कोई दुर्भिक्ष नहीं है जो साहित्य को आधार बनाकर फ़िल्म बनाने से बाज़ नहीं आ रहे हैं और छिटपुट ही सही, व्यावसायिक और मारधाड़ वाली ग्लैमरयुक्त फ़िल्मों के साथ-साथ साहित्यिक कृतियों पर आम आदमी पर केन्द्रिय फ़िल्मों के निर्माण में पहल कर रहे हैं।

प्रख्यात साहित्यकार काशीनाथ सिंह के संस्मरणात्मक उपन्यास ‘काशी का अस्सी’ पर केन्द्रित फ़िल्म का निर्माण चंद्रप्रकाश द्विवेदी ने किया है। ‘अस्सी मोहल्ला’ नामक फ़िल्म के प्रमुख किरदार सनी देओल और रवि किशन हैं। इस फ़िल्म में बनारस के आम आदमी के पारस्परिक द्वंद्वों और संबंधों का लोमहर्षक चित्रण किया गया है। चंद्रप्रकाश द्विवेदी के लिए इस फ़िल्म का निर्माण चुनौतीपूर्ण रहा है क्योंकि उक्त उपन्यास का निहिताशय अत्यंत गंभीर रहा है जो सिनेमा के लिए सहज संप्रेषणीय नहीं है। इसके अतिरिक्त अभिषेक कपूर की ‘काई पो छे’ चेतन भगत के नॉवेल ‘दि थ्री मिस्टेक्स ऑफ़ माई लाइफ़’ पर आधारित फ़िल्म है। कितना भी प्रौद्योगिक और कंप्यूटरी विकास में हम छलाँगे मार लें, पर मनुष्य ग़लतियाँ करने से बाज़ नहीं आएगा। तभी तो वह आम आदमी के नाम को सार्थक कर पाएगा। चेतन के दूसरे उपन्यास ‘फाइव प्वाइंट्स समवन’ पर राजकुमार हिरानी ने ‘थ्री इडियट्स’ बनाकर सिनेमा में आम आदमी की उपस्थिति को महत्त्वांकित किया है।

आम आदमी के साथ चलते-चलते भारतीय सिनेमा ने सभी सामाजिक और धार्मिक वर्जनाओं और राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय सीमाओं को तोड़ा है लेकिन साहित्य का दामन कभी नहीं छोड़ा है। हाँ, ऐसे दृष्टांत बहुतायत से देखने को मिले हैं कि साहित्यिक कथाओं को फ़िल्मों में तोड़-मरोड़कर प्रस्तुत किया गया है, व्यावसायिक फिल्मों की अंधाधुध दौड़ की साहित्यिक कथाएँ भी फ़िल्माई जाती रही हैं और फ़िल्माई जाती रहेंगी। यद्यपि अँग्रेज़ी सिनेमा की भाँति हिन्दी सिनेमा में साहित्यिक कृतियों पर उतनी फ़िल्में नहीं बनाई गई, जितनी बनाई जानी चाहिए थीं तथापि जिस महान स्वप्नद्रष्टा ने अपने निजी जीवन को कंगाली के बड़बानल में झोंकते हुए भारतीय सिनेमा को यथार्थ जगत पर अवतरित करने के लिए रात-दिन सपने देखे, उस व्यक्ति का भी यही सपना था कि सिनेमा आम आदमी का जीवंत दर्पण बने। निःसंदेह, दादा साहेब फाल्के का यह सपना धीरे-धीरे साकार हो रहा है। आज के निर्माता-निर्देशकों की साहित्य में दिलचस्पी बढ़ती जा रही है। आने वाले दिनों में साहित्य और सिनेमा दोनों मिलकर समाज में आम आदमी के जीवन को सर्वागीण तौर पर बेहतर बनाने की अपनी-अपनी भूमिकाओं को बखूबी निभाएँगे।

0 Comments

Leave a Comment

लेखक की अन्य कृतियाँ

साहित्यिक आलेख
सिनेमा और साहित्य
शोध निबन्ध
विडियो
ऑडियो