15-06-2019

साहित्य सृजन का पथ, उपासना का पथ

आकांक्षा शर्मा

लेखिकीय कार्य सचमुच उपासना है, अमरता की ओर ले जाने का पथ है। कहते हैं कही गई बात मिट जाती है किन्तु लिखी हुई बात अमर हो जाती है।

जो कह दिया सो बह गया
जो लिख दिया सो रह गया
एक प्रवाह बन गया 
दूसरा शाश्वत हो गया॥

कई बार किसी कहानी, या मर्मान्तक प्रसंग को पढ़कर मेरी आँखें बरबस सजल हो उठती है, ख़ास तौर पर रामायण व महाभारत के कई प्रसंगों पर - द्रोपदी के चीरहरण का प्रसंग, सीता की अग्निपरीक्षा या वनवास की बात, अहिल्या प्रसंग, चित्रकूट में भरत और राम के मिलन का प्रसंग इन सब को पढ़कर हर बार आँखों से अश्रुधारा का प्रवाह रोके से भी नहीं रुकता। कई बार सोचती हूँ साहित्य या कला की पूर्णता तो भावों से जुड़ने पर ही सार्थक होती है। जिस प्रसंग या घटना के प्रति मन एकरूप हो जाता है, जिससे पाठक अपने आप को जोड़ लेता है या रचना में पाठक स्वयं को भी अनुभूत करता है वही तो साहित्य का होना सार्थक होता है। जब महर्षि वेदव्यासजी ने एवं महर्षि वाल्मिकी ने अपना साहित्य सृजन किया होगा तो कहाँ से वेदना की इतनी मुखर अभिव्यक्ति का भाव ले कर आयें होंगे! 

वियोगी होगा पहला कवि 
आह से उपजा होगा गान।
उमड़कर आँखों से चुपचाप 
बही होगी कविता अनजान॥

शायद वेदना के सूक्ष्म चितेरे ही अपने हृदय की वेदना अपने भावों को इतनी ख़ूबसूरती से व्यक्त कर पाते हैं। दूसरे के हृदय से साधारणीकरण करने की कला, ये तो वही कर पाता है जिसके हृदय में सच्ची अनुभूति होती है। सूरदास ने मन की आँखों से कृष्ण के जिस रूप के दर्शन किये उस रूप के दर्शन कितने ही आँखों वाले साहित्यकार कहाँ कर पाये? स्वयं आचार्य रामचन्द्र शुक्ल कहते हैं- "वात्सल्य और शृंगार का जितना अधिक उद्घाटन सूर ने अपनी बन्द आँखों से किया है, उतना किसी और कवि ने नहीं।" मीरा ने पति रूप में हरि को पाने के लिए कोई कृत्रिम जतन नहीं किये, वो तो कृष्ण में ही एकाकार हो गई, तभी तो उनकी रचनाओं में इतनी सघन अनुभूति इतनी भावप्रवणता, इतना निवेदन, इतना भाव है कि जब भी पाठक उनकी काव्यधारा में उतरता है बस उस जल से बाहर ही नहीं निकल पाता।

साहित्य सृजन का पथ सचमुच इतना आसान नहीं, इस उत्कृष्ट साधना पथ पर वही उतर सकता है जिसने साधन और साध्य की पवित्रता के अन्तर को समझा है, जिसने साधना के इस श्रमसाध्य मार्ग में बिखरे कंटकों को फूलों की सेज माना हो। जिसके लिए शब्द मात्र भाषा का उपागम न हो। साहित्यकार के लिए उसकी रचना का एक-एक शब्द उसका अभिष्ट बन जाता है। उसे अपनी साहित्यिक रचना में प्रयुक्त शब्दों से उसके भावों से एकरूपता व तालमेल का जो उपक्रम करना होता है, वह किसी प्रयोजन से नहीं, न ही किसी चेष्टा से सम्पन्न होता है अपितु अनायास भावों के उद्गम का उद्दाम निष्क्रमण होता है, जिसमें काल, इतिहास और संस्कृति को साथ लेकर भावनाओं का सम्मिश्रण देखने को मिलता है। संस्कृत काव्य के शिखर पुरुष कालिदास से लेकर हिन्दी के साहित्यिक रत्नों के सृजन पथ पर दृष्टि डालने पर हम सदैव यही पाते हैं कि हमारे साहित्य को आलोकित करने वाले ये सृजनधर्मी सदैव किसी उच्च आदर्श से अनुप्राणित रहें होंगे अन्यथा इतनी उत्कृष्ट व संवेदनाओं से परिपूर्ण उच्च साहित्यिक कृतियों से हमारा साक्षात्कार होना संभव न होता।

ऐसा साहित्य जिसमें साहित्यकार की निजी वेदना सामाजिक वेदना के साथ साझा नहीं कर पाती हो तो क्या वो किसी पाठक की भावनाओं से साझा कर पायेगी? पाठक उस रचना को पढ़कर बस इतिश्री कर लेता है, किन्तु उसे अपनी उपासना का साक्षी नहीं बना पाता। रामचरित मानस में तुलसी की व्यापकता एवं दर्शनीय भाव को जनमानस ने सहजता से स्वीकार किया, उसमें तुलसी के भावों की विराटता के साथ सहजता व सम्प्रेषणीयता भी है। राम सबके हृदय में है किन्तु राम के व्यक्तित्व को मानवीय तत्व प्रदान करने की चेष्टा यदि तुलसी नहीं करते तो संभवतया राम मानव हृदय में बैठ कर भी मानव की पहुँच से दूर ही रहते । 

जब-जब होई धरम कै हानी। बाढ़हि असुर महा अभिमानी॥
करहिं अनीति जाइ नहिं बरनी। सीदहिं बिप्र धेनु सुर धरनी॥
तब-तब प्रभु धरी बिबिध सरीरा।
हरहिं कृपानिधि सज्जन पीरा॥

 तुलसी ने अपने राम को केवल लिखा ही नहीं अपितु जिया है, महसूस किया है तुलसी उस हर स्थान पर पहुँचे हैं जहाँ राम की चरण रज पहुँची है। तुलसी के राम उनके हृदय में से निकल कर सीधे उनकी लेखनी को छू पाये हैं। कहने का तात्पर्य है कि भावों का लेखन में वही सम्बन्ध है जो बादल और वर्षा में है, जो फूल और ख़ुशबू में, जो नदी और पानी में है। लेखक या कवि की क़लम यदि अपनी रचना को जब तक अपना ध्येय अपना सर्वस्व समर्पित नहीं करती तो उसकी रचना में अधूरापन स्वतः ही लक्षित होता है। निराला जैसे सृजनधर्मी की क़लम से जो पुष्प सृजित हुए हैं उनमें लोककल्याण की भावना एवं हृदय की कई कोमल भावनाएँ प्रकाशित हुई हैं, चाहे अपने प्रियजनों को उन्होंने खो दिया, अपने अन्तिम समय में विक्षिप्तता को भी अंगीकार कर लिया, किन्तु साहित्य में अपना सर्वस्व अपना उत्कृष्ट योगदान दिया, अपनी वेदना को अपनी कमज़ोरी नहीं अपितु साहित्य सृजन की दिशा में एक बेहतर हथियार बनाया। महादेवी वर्मा के साहित्य साधना के पथ में घीसा, रामा, अलोपी, भक्तिन जैसे चरित्र उनके रचना के पात्र नहीं अपितु उनके साहित्यिक पथ के साथी अधिक लगते हैं जो उनके असाधारण मानवतावाद की कहानी कहते हैं। महात्मा बुद्ध के दर्शन की ओर जो उनका सहज रुझान था वह करुणावाद के रूप में उनकी रचनाओं एवं उनके पात्रों में यत्र-तत्र-सर्वत्र प्रतिबिम्बित होता है। स्वयं महादेवी के ही शब्दों में ही -

"बचपन से ही भगवान बुद्ध के प्रति भक्ति या अनुराग होने के कारण उनकी संसार को दुःखात्मक समझने वाली फिलॉसफी से मेरा असमय ही परिचय हो गया।"

महादेवी का चिंतन यह था कि सम्पूर्ण विश्व की करुणा उनके हृदय में समा जाए -

"शेष नहीं होगी यह, मेरे प्राणों की क्रीड़ा
 तुमको ढूँढ़ा पीड़ा में, तुममें ढूँढ़ूँगी पीड़ा।
X    X    X
है पीड़ा की सीमा यह
दुःख का चिर सुख हो जाना॥"

आत्मीयता से भरे साहित्यकार का जीवनदर्शन ही उसके साहित्यिक रचनाओं का बेजोड़ सौन्दर्य होता है। प्रकृति के सूक्ष्म चितेरे सुमित्रानन्दन पंत का जन्म कौसानी जैसी ख़ूबसूरत व शस्य श्यामला धरती पर, पर्वतों की रमणीय गोद मेें हुआ। उनका प्रत्येक क्षण प्रकृति के सहचर बनकर, उससे मूक वार्तालाप करने में व्यतीत न हुआ होता तो क्या उनकी काव्य प्रतिभा जो प्रकृति के सौम्य रूप में पोषित हुई क्या इतनी लोकलुभावनी बन पाती! पन्त ने इस बात का अनेकों बार ज़िक्र किया है-

"कविता करने की प्रेरणा मुझे सबसे पहले प्रकृति निरीक्षण से मिली है। जिसका श्रेय मेरी जन्मभूमि कुर्माचल प्रदेश को है।कवि जीवन से पहले भी मुझे याद है। मैं घण्टों एकान्त में बैठा प्रकृति के दृश्यों को एकटक देखा करता था और कोई अज्ञात आकर्षण मेरे भीतर एक अव्यक्त सौन्दर्य का जाल बुनकर मेरी चेतना को तन्मय कर देता था।"

इसी तरह फक्कड़ व क्रान्तिकारी कवि कबीर का साहित्यिक जीवन भी इस बात की पुष्टि करता है कि जो कुछ उन्होंने जिया जो कुछ महसूस किया उसी को उन्होंने अपने काव्य में पोषित किया। कबीर के अनुसार अनुभूति वाणी को अमृतमय बना देती है। कबीर ने प्रणयानुभूति को अपने काव्य का प्राण बनाया परमात्मा के प्रति उत्कट प्रेम कबीर को संसार भर से विरक्त कर देता है। वे अपने प्रिय के ध्यान में मग्न हो कर गा उठते हैं।

आंखड़ियाँ झांई पड़ी, पंथ निहारि-निहारि
जीहड़ियाँ छाला पड़या, नाम पुकारि-पुकारि॥

कवि जयशंकर प्रसाद की बहुमुखी प्रतिभा क्या किसी से छिपी है? प्रसादजी अपने पारिवारिक व्यवसाय को कुशलता के साथ निभाते हुए अच्छे-अच्छे पाक विशेषज्ञों के छक्के छुड़ाने की क्षमता रखते थे। ज्योतिष शास्त्र एवं रत्नों के अच्छे ज्ञाता थे साथ ही उच्च कोटि के वैद्य थे, उनका औषधीय ज्ञान उनके साहित्यिक ज्ञान से कहीं भी कम नहीं था। उनकी अपार व अप्रतिम लेखकीय ऊर्जा उनकी सभी अमर कृतियों में प्रतिबिम्बित होती है किन्तु उन्होंने कभी जीवन से पलायन नहीं किया। जीवन में रमे रहकर ही साहित्य सृजन किया। वरिष्ठ आलोचक एवं साहित्यकार विश्वनाथ त्रिपाठी द्वारा राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक पत्रिका आलोचना में दिये गए एक साक्षात्कार में इसी विषय पर मेरे द्वारा पूछे गये प्रश्न का बहुत ही सुन्दर जवाब देते हुए कहा - 

"आकांक्षा शर्मा- इतनी उम्र में भी आप साहित्य-जगत् को अपनी सेवाएँ दे रहे हैं। लेखन और आपके व्यक्तिगत जीवन में कैसे सांमजस्य कर पाते हैं आप?

डॉ. विश्वनाथ त्रिपाठी- साहित्य ही तो जीवन पर लिखा जाता है, इसमें सांमजस्य करने की क्या बात है? जो कुछ देखते हैं, अनुभव करते हैं, उनको लिखते हैं। जैसे ये मेरे मित्र हैं, आप आईं हैं। तो बस जो अनुभव होता है उसे क़लम से उतार देते हैं। सामंजस्य केवल इतना करना पड़ता है कि जो अनुभव है उनको शब्दों में उतार देते हैं ताकि दूसरे लोग उसे समझें। इसलिए हिन्दी में प्रायः जब से यह प्रथा चली कि केवल साहित्य में रहकर साहित्यकार केवल शुद्ध साहित्यकार रह गया तब से साहित्य घटिया हो गया है। पहले जयशंकर प्रसाद सुंघनी साहू भी थे और कविता भी करते थे। तब कवि ताना-बाना भी करते थे और कविता भी लिखते थे। मिल्टन डिप्लोमेट था, जुलयिस सीज़र बहुत बड़ा जर्नलिस्ट भी था और गद्यकार भी, सोल्जर भी था। तो हमारे यहाँ ऐसा है कि जो जीवन में रमे रहते हैं वो साहित्य भी अच्छा लिखते हैं। प्रामाणिक लिखते हैं। जीवन से कटकर जो सिर्फ साहित्य के लिए साहित्य लिखते हैं वो बहुत अच्छा साहित्य नहीं लिख पाते हैं। जीवन और साहित्य अपने आप में ही एक दूसरे के साथ हैं पूरक हैं।"

आशय यही है कि सच्चा साहित्यकार सच्चा इंसान पहले होता है, उसका मनुष्यत्व उसकी हृदयानुभूति पहले तरल होती है तब जाकर उसकी लेखनी में वेदना का भाव और शृंगार का रस आ पाता है। बिना सागर में उतरे मोती प्राप्त करने की आशा जितनी धूमिल है उतनी यह बात भी सच्ची है कि बिना जीवन को जिए, बिना संघर्ष किए बिना अनुभूति का स्पर्श किए जो लेखनी केवल शब्दों का माया जाल बुनती है; वह समाज के लिए प्रयोजनकारी नहीं हो सकती, न ही प्रासंगिक और न ही लोकरंजक। 

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