राष्ट्र पीड़ा

01-04-2019

राष्ट्र पीड़ा

महेश पुष्पद

आज हमने अपने मन की,
कुंठाओं पर वार किया,
मजबूरी का लाचारी का,
चोला फेंक उतार दिया,
कब से यूँ ही हालातों के,
दास बने बैठे थे हम,
आज हृदय को विपदाओं से,
लड़ने को तैयार किया।

बहुत समय से बुरे समय के,
गीत सुनाते आये हैं,
अवसर और भाग्य के आगे,
शीश झुकाते आयें हैं,
जीवन के काले चेहरे का,
इक दिन नूर बदल देंगे,
भाग्य न बदला तो हम अपना,
वक़्त ज़रूर बदल देंगे।

छोटी-मोटी फिसलन हमको,
कब तक यूँ तड़पाएगी,
अँधियारों से लड़ने वाला,
कब तक दीप बुझाएगी,
कब तक ठहरेंगे अँधियारे,
सूने मन की गलियों में,
कब महकेंगी नई सुगंधें,
हृदय चमन की कलियों में।

निज विपदाएँ अर्थहीन हैं,
राष्ट्र-समस्या भारी है,
रोटी कपड़ा और भवन की,
जंग अभी भी जारी है,
खून बहेगा कब तक मेरी,
भारत माँ की छाती पर,
कब तक होगा वार देश के,
अरमानों की थाती पर।

क्या भूखे पेटों की रोटी की,
पूरी आस नहीं होगी,
क्या पतझड़ की शुष्क हवाएँ,
फिर मधुमास नहीं होगी,
रोशन कभी नहीं होंगे क्या,
अँधियारे चौबारों के,
बिना स्वार्थ के कब बोलेंगे,
ये पन्ने अख़बारों के।

रोज़ाना जो नंगे भूखे ,
सोते है फ़ुटपाथों पर,
क्यों संसद में बहस नहीं ,
होती उनके जज़्बातों पर,
क्यों कुछ बच्चे चौराहों पर,
हाथ पसारे रोते हैं,
क्यों कुछ कंधे बूढ़ेपन का,
बोझ अकेले ढोते हैं।

कब तक ठंडी होगी ज्वाला,
मेरे मन की पीड़ा की,
कब बदलेगी कार्यप्रणाली,
राजनीति की क्रीड़ा की,
कोई नहीं है जिस पर भारत,
माता का कोई क़र्ज़ नहीं,
मैं बस अपनी पीड़ा गाऊँ,
मैं इतना ख़ुदगर्ज़ नहीं।

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