पूरण करती, नर को नारी

01-11-2020

पूरण करती, नर को नारी

डॉ. संतोष गौड़ 'राष्ट्रप्रेमी'

सृष्टि की रचना, सबसे प्यारी।
सजती सृष्टि, जीवन क्यारी।
प्रेम डोर में, बाँधे नर को,
ख़ुशियों की, वह है फुलवारी।
 
महानता की चाह न उसकी।
गहराई की थाह, न उसकी।
पिता, भाई, पति और पुत्र,
और कोई पहचान न उसकी।
 
घर में लाती है, ख़ुशहाली।
माता, बहिन हो, पत्नी, साली।
गृह लक्ष्मी की बरकत से ही,
घर घर मनती है, दीवाली।
 
जन्मदात्री, नर की नारी।
पालन-पोषण, जाती बारी।
नर को समर्पित, अपना आपा,
प्रतियोगी नहीं, नर की, नारी।
 
नर की देखो, जान है नारी।
युगों-युगों से, शान है नारी।
सूपर्णखा, सीता या द्रोपदी,
नर जीवन की, आन है, नारी।
 
प्रकृति की श्रेष्ठ कृति, नर-नारी,
ज़िम्मेदारी है, उनकी सारी।
नारी को नर, पूरण करता,
पूरण करती, नर को नारी।

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