कुंभ के बाद

प्रभांशु कुमार

कुंभ के बाद
क्या रहेगा यहाँ
नावों और चप्पुओं के शोक संवाद के अलावा
गंगा जल में तैरता अतीत और
ढेर सारी स्मृतियाँ
रेत के फैलावों में
सिर्फ़ भूली बिसरी यादों
पूजा पाठ धूप दीप नैवेद्य
होम अगियार की भूरी राख में
कुंभ की याद बची रह जायेंगी
उजड़ जायेंगे
आलीशान तम्बुओं के महल
देवदूत नहीं होंगे
नहीं होंगे उनके आशीर्वाद
न अख़बारों में प्रकाशित तस्वीरें
न सियासी वक्तव्य
हर तरफ़ दिखेंगे
रेत पर क़ीमती कारों के निशान
आकाश और पृथ्वी के बीच
उनकी यादों में बचें होंगे
ताज़े सुनहरे गुलाब
धीरे-धीरे कुंभ की याद पर 
धूल की एक परत जम चुकी होगी
नदी के किनारे उल्टी पड़ी नाव
उसमें जमी होगी घास 
चिलम के टुकड़े और
सिगरेट के धुँए, दोने, पत्तल
पूछ रहे होंगे कुंभ का पता
प्रवासी पक्षी चलें जायेंगे
वैसे ही बचा रहेगा
संगम के पानी में
आस्था का रसायन॥

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