01-06-2019

ख़ुश हूँ पापा…

डॉ. दीपा गुप्ता

रमेश को नींद नहीं आ रही है जब कि सप्ताह भर बाद नाती नवल की शादी से आज ही पत्नी नीना के साथ लौटा है। थके तन में बेचैन मन कसमसा रहा है... कभी इस करवट तो कभी उस। कभी बिजली विभाग को गाली देता, तो कभी प्रशासन को मन–ही–मन कोसता। बिहार का छोटा सा गाँव। यहाँ बिजली के तारों का जाल तो हर कमरे में दिखाई देता है पर बेबस बल्ब लाचार से टकटकी लगाए जलने को आतुर निराश लटके रहते है। कभी बिजली आती भी है तो वैसा ही लगता है मानो अपना पूरा दम लगा दिया हो लालटेन को पिछाने (पछाड़ने) में; इसलिए गाँव में ज़्यादातर लोग जिनके घर के छत पक्के होते हैं, वे छत पर ही सोने की व्यवस्था कर लेते हैं। जगमगाते तारों के बीच खुले आसमान में रमेश पल–पल काट रहा है। हालाँकि बगल में सोई नीना को जगाने का मन भी हुआ पर बढ़ाया हाथ यह सोचकर वापस खींच लिया कि सप्ताह भर शादी में दिन भर इधर–उधर यह भी भागती ही रही है फिर यहाँ आकर घर की पूरी साफ़–सफ़ाई, उसे जगाना ठीक नहीं। दिमाग़ में तरह–तरह के ख़्याल आते रहे। नज़र आकाश की ओर टिक गई। तारों की झिलमिलाहट से नज़रें खींचती चली गईं। एक तारा बहुत जाना–पहचाना सा लगने लगा। उसकी झिलमिलाहट रग–रग में समाने लगी। कहीं यह पारुल तो नहीं? हाँ पारुल ही तो है! वही हँसी, वैसा ही तेज जो मेरी सारी थकान काफ़ूर कर दे। देखो कैसे खिलखिलाती हुई पूछ रही है मुझसे "पापा भूल गए क्या मुझे, नहीं पहचाना? मैं हूँ, आपकी पारुल। आपकी प्यारी बेटी पारुल।"

मैं आप लोगों को यहाँ से रोज़ देखती हूँ। जानती हूँ आप लोग आज ही नवल की शादी करवा के लौटे हैं। नींद नहीं आ रही है न! दिन में इतना क्यों सो लिए? याद है मुझे जब रात को नींद नहीं आती थी और मैं आपको कहानी सुनाने के लिए कहती थी तब यही कहते थे न मुझसे– “दिन में इतना क्यों सो लेती हो अब तारों से बातें करो।”

अतीत के पन्ने फड़फड़ाने लगे। रमेश उस दिन बहुत ख़ुश था जब ऑपरेशन थियेटर से बाहर निकल कर नर्स ने बताया कि लड़की हुई है। उसने तुरंत पाँच सौ का नोट पर्स से निकालकर नर्स को थमा दिया। ख़ुश होता भी क्यों नहीं; घर में पहली बार लक्ष्मी ने जन्म लिया। उसे अपनी सूनी कलाई की तो आदत हो गई थी पर अपने बेटों की भी सूनी कलाई देख कुंठित हो जाता था।

सुंदर सलोनी पारुल नाज़ों–नखरों से पलने–बढ़ने लगी। भाई–बहन के झगड़ों में रमेश पारुल का ही पक्ष लेकर बेटों को डाँटते। पापा की सोनपरी ख़ुशी से इतराने लगती। रोज़ पापा की बाँहों में ही चाँद–तारे व परी रानी की कहानियाँ सुनती हुई सोती। पलक झपकते दिन–महीने–साल गुज़रने लगे। 

गर्मी की छुट्टियों में सहेलियों के साथ आम के बग़ीचे में जाकर टिकोरा तोड़ने में पारुल को बहुत मज़ा आता। जब नीना बच्चों को दोपहर में ज़बरदस्ती सुलाने की कोशिश करती तो बच्चे भी बंद पलकों से माँ के सोने का इंतज़ार करते और जैसे ही नीना को झपकी लगती, वे दबे पाँव निकल जाते और रास्ते में जो भी अस्त्र–शस्त्र मिलता, पत्थर–लकड़ी सब लेकर पहुँच जाते बग़ीचे में, जहाँ हुड़दंगों की टोली के साथ–ही–साथ पेड़ पर गदराई अंबियाँ भी लबेदा खाने का इंतज़ार करती रहती थीं। दो–चार आम हाथ लग गये तो बस क्या कहने! मुट्ठी के आम बादशाह के राजकोष से कम न थे। ब्लेड से धीरे–धीरे टिकोरे को छिलना, उसके बीज को ऊँगलियों से पिचकाते हुए किसी का नाम लेकर पूछना कि बता कौवा उसकी शादी किस दिशा में होगी, फिर जिधर वह उछल कर जाता, सब मिल कर चिल्लाते ‘उस दिशा में’। फिर ज़ोरदार ठहाकों की गूँज। टिकोरे को महीन–महीन काट कर नमक–मिर्ची लगाकर कपड़े में बाँधकर घूमाते हुए घुमउवा बनाते। उससे स्वादिष्ट तो धरती पर उनके लिए कुछ भी नहीं होता था। चटकारा मार–मारकर सब खाते। कई बार तो लड़ाइयाँ भी हो जातीं। ज़िन्दगी में कभी बात न करने व न खेलने की क़समें भी खाते पर सब रेत पर लिखे के समान ही होता, जो एक सुहाने झोंके से मिटकर फिर पावन बन जाता।
  
एक दिन दुकान से घर आते वक़्त दोपहर में रमेश ने बच्चों को बग़ीचे में देख लिया, फिर क्या? चोरों की चोरी पकड़ी गई। सिट्टी–पिट्टी गुम। सबने सरंडर कर दिया। वहीं से सबको डाँटते–पीटते घर लेकर आये। पारुल भी सहमी सी भाइयों के पीछे–पीछे। उस दिन रमेश ने पारुल को भी बहुत डाँटा। लम्बे–लम्बे घेरदार कपड़ों वाले चाईमुई की कहानी सुनाई जो बच्चा चुराकर ले जाते हैं फिर उनकी आँखें निकालकर बेचते हैं। बच्चों के चेहरे पर चाईमुई का भय दिखने लगा। साथ ही नीना को भी हिदायत दी कि जब भी वह दोपहर में सोने जाए तो गेट में ताला लगा दे। फिर बच्चों ने अपनी दुनिया घर में ही बना ली। कभी सहेलियों को बुलाकर गुड्डा–गुड़िया खेलती, जिसमें कोई वर पक्ष से तो कोई वधू पक्ष का बन जाता। फिर शादी–ब्याह, तिलक–बारात सब होता वह भी धूम–धड़ाके व गाजे–बाजे के साथ। कभी दिन भर कैरम, लुडो या व्यापार चलता रहता। उसी में धमा–चौकड़ी मची रहती। जो जीतता उसकी हँसी, हारे को तीर सी चुभती, हारा छटपटाता, फिर दंगल शुरू। कभी–कभी लड़ते–झगड़ते सब सो भी जाते।

एक रात पारुल को नींद नहीं आ रही थी क्योंकि वह दिन में बहुत सो ली थी। उस रात वह रमेश को कहानी सुनाने की ज़िद्द करने लगी तब रमेश ने कहा था कि दिन में इतना क्यों सो लेती हो फिर रात में नींद कैसे आएगी। अब देखो इन तारों को और तारों को दिखाते हुए बताया था कि वो तेरी दादी, वो तेरी नानी। सब तुमसे बातें करना चाहते हैं। उनको ध्यान से देखो और उनको सुनने की कोशिश करो।

पारुल का बालमन शांत हो गया। उसने धीमे स्वर में पूछा– “पापा क्या एक दिन मैं भी तारा बन जाऊँगी, आप मुझे भी देखकर पहचान लेंगे न?”

रमेश के रौंगटे खड़े हो गये। उसने पारुल के मुँह को अपनी हथेली से बंद करके गले से लगा लिया, उस रात देर तक उसे कहानियाँ सुनाते रहे।

पारुल के बालमन ने लाड़–दुलार में पलते हुए युवा मन की दहलीज़ पर दस्तक दे दी। डिग्री तक की पढ़ाई तो गाँव में ही हो गयी पर लाडली बेटी ने माँ के इच्छा के विरुद्ध शहर जाकर वकालत की पढ़ाई करने के लिए अपने पापा को मना लिया।

पारुल के हॉस्टल जाते ही घर बहुत सूना हो गया। रमेश घर आते ही बहुत उदास हो जाता। अक्सर नीना व रमेश उसके बालपन की बातें करते। कभी आँखें भर आतीं, कभी बचकाना याद कर दोनों खिलखिला उठते। नीना अक्सर कहती– “अभी से आदत डाल लीजिए, एक दिन तो ससुराल चली ही जाएगी।”

“ससुराल चली जाएगी तो क्या? हर महीने बुलाऊँगा, नहीं तो ख़ुद ही जाकर मिल आऊँगा,” रमेश सीना तान जवाब देता।

रमेश सदा पारुल के हॉस्टल से आने के दिन गिनता। पारुल हॉस्टल से आते समय अपने जेब खर्च से बचाकर पापा–माँ व भाइयों के लिए कुछ–न–कुछ ज़रूर लाती। एक बार पापा के लिए टी–शर्ट लाई। रमेश को वह टी–शर्ट बहुत पसंद आई । टी–शर्ट या तो रमेश पर होती या तो धुलकर सूखती हुई तार पर। महीनों ऐसा चलता रहा। नीना ने पारुल को फोन करके कहा कि पापा के लिए और भी टी–शर्ट ले आए; वो तो इस टी–शर्ट को छोड़ते ही नहीं, फिर उसी दिन पारुल ने मॉल जाकर हॉफ़ दर्जन टी–शर्ट ख़रीदकर बैग में रख लीं।

विधि की आख़िरी वर्ष की परीक्षा होने के बाद जब पारुल घर लौट आयी तब रमेश व नीना की ख़ुशियों का ठिकाना न था पर पारुल कुछ खोई सी रहती थी। हालाँकि विप्रेंद्र ने कभी–भी उससे कुछ कहा नहीं पर डिग्री व लॉ की पढ़ाई साथ में करते हुए एक एहसास ने अपना स्थान बना लिया था। उस मधुर एहसास से वह मचल जाती थी पर कुछ कह नहीं पाती। विप्रेंद्र के साथ की सुखद अनुभूति को एकांत में स्मरण करती, मन रोमांचित व पुलकित हो उठता। कभी–कभी उसे लगता शायद विप्रेंद्र भी…।

घर में पारुल की शादी की बातें चलने लगीं। शादी के नाम से उसका चेहरा उतर जाता, वह वहाँ से उठकर चली जाती। चेहरा उतरना..., उठकर चले जाना..., रमेश का माथा ठनका।

रात का खाना खाने के बाद जब नीना रसोई समेट रही थी और रमेश छत पर सब के सोने के लिए बिस्तर व मच्छरदानी लगा रहे थे तब पारुल सुराही व गिलास लेकर छत पर चढ़ी और उसे किनारे रखकर अपने पापा की मदद करने लगी। रमेश ने पारुल की शांत नज़रों को भाँपते हुए पूछा– “क्या बात है? हम लोग जब भी तुम्हारी शादी की बातें करते हैं तब तुम्हारा चेहरा उतर जाता है।”

पारुल ने धीमे स्वर में कहा, “पापा, अनजान के साथ बँधने से डर लगता है, क्या विप्रेंद्र के साथ संभव नहीं?”

“विप्रेंद्र! वही क्या जो तुम्हारे साथ पढ़ता है? चौक पर के बाबू साहेब का बेटा,” रमेश ने आश्चर्यचकित भाव से पारुल की ओर देखते हुए पूछा।

पारुल ने ‘हाँ’ कहते हुए नज़रें नीची कर लीं।

“कोई ख़ास बात हुई क्या?” दिमाग़ में कौंधते प्रश्न होठों से निकले।

“नहीं पापा ऐसा कुछ नहीं, बस उसका साथ अच्छा लगता है। उसने कभी कुछ कहा भी नहीं पर उसकी आँखें कहती हैं।” नीना के क़दमों की आहट से पारुल के शब्द ठिठक गए।

“पर विप्रेंद्र तो… कैसे संभव है… पूरे गाँव में…,” रमेश के शब्द दिल–दिमाग़ को झँझोड़ते हुए निकलने लगे।

“अच्छा तो यही सब चल रहा था, इसीलिए मैं…” नीना की रोष भरी आवाज़ पीछे से आई।

“नहीं, ऐसी कोई बात नहीं,” रमेश ने नीना को शांत कराते हुए मामले से अवगत कराया।

उस रात देर तक बातें होती रहीं। नीना व रमेश दोनों ही पारुल को तरह–तरह के तर्क देकर समझाते रहे। कभी प्रेम–विवाह की असफलता तो कभी समाज में अंतर्जातीय विवाह से होने वाली बदनामी। पारुल की नम आँखें तारों की टिमटिमाहट पर गड़ी रहीं, रिसाव होता रहा। तारों की टिमटिमाहट मद्धिम होने लगी। उसने आँखों की नमी को सीने में उतार माँ–पिता की मर्ज़ी पर अपनी मुहर लगा दी।

अब नीना व रमेश को थोड़ी जल्दबाज़ी होने लगी थी। बेटी पर विश्वास होने के बाद भी मन के कोने में छिपा भय उकसाने लगा कि उम्र के नाज़ुक दौर में कहीं ऐसा–वैसा…। 

एक दूर के रिश्तेदार ने अमित के बारे में बताया। शहर में घर, पिता अफ़सर, मोबाइल की बड़ी दुकान, खाता–पीता सुसंपन्न परिवार, मिलनसार प्रवृत्ति और फ़िल्मी हीरो सा आकर्षक व्यक्तित्व। रमेश ऐसा रिश्ता सुन फूले नहीं समाया। बात आगे बढ़ने लगी। अफ़सर पिता ने कहा भी कि यदि पारुल कोर्ट जाना चाहे तो हमें ख़ुशी ही होगी। धूम–धड़ाके से प्यारी बेटी विदा हो गई। घर में उसकी कमी तो बहुत खलती पर दुनिया की रीत के आगे राजा जनक भी हारे।

महीने भर बाद अमित के साथ ही पारुल घर आयी। ससुराल की बातें हँस–हँस कर बताती। अमित के दिलफेंक व्यवहार की गुदगुदी उसके चेहरे पर साफ़ झलक रही थी। बहुत ख़ुश लगी। माँ–पिता का मन तृप्त हुआ। अमित के मुख से भी पारुल के समान ही ‘मम्मी–पापा’ शब्द सुनकर रमेश व नीना प्रसन्नचित्त हुए। अमित ने कहा कि अब वह ही हमेशा इसी तरह बीच–बीच में पारुल को लेकर ख़ुद आएगा और चंद रोज़ ख़ुशियों के साथ गुज़ारेगा।

…ऐसा एक–दो बार ही हो पाया कि रमेश के नाना बनने की ख़ुशख़बरी आ गयी। सास भी ससुर के साथ उनकी नौकरी पर कभी–कभी शहर चली जाती। घर का पूरा दारोमदार पारुल के कंधे पर आ गया। दिन भर घर के कामों में उलझी रहती। रोज़ कोई–न–कोई रिश्तेदार आते रहते, आव–मान–भगत तो रग–रग में बसा, चाह–न–चाह करना ही होता। हवा में उड़ने वाली बिटिया अब पालतू चिड़िया सी बन इशारों पर फुदकने लगी।

पारुल धीरे–धीरे अमित के व्यवहार में भी बदलाव महसूस करने लगी। उसके बहुरूप देख कुंठित रहती। अब रात को अक्सर देर से लौटने लगा, पूछने पर वही जवाब– “क्या दिनभर केवल खटता–मरता रहूँ?”

एक रात तो शराब पीकर लौटा। पूछताछ–झड़प–बहस घंटों चलती रही। पारुल के रोष को तमाचे से शांत करा दिया अमित ने। चिंता की वह रात करवटें बदलते तिल–तिल कटी। सुबह जब उसने सास से कहा तो सास के आश्चर्य जताने का अभिनय उसे खटका, फिर पड़ोस की एक भाभी, जिससे दोस्ती हो गयी थी, को दिल का दर्द सुनाया। भाभी पहले तो थोड़ा सकुचाई फिर उसने आत्मीय भाव से सहलाते हुए कहा– “अब तुमसे क्या छिपाना, यह तो पहले उसका रोज़ का धंधा था; तभी तो इतनी जल्दी झट–पट में उसकी शादी करवा दी। सबको लगता था कि घर में पूछने वाली आ जाएगी तो सँभल जाएगा। पढ़ाई–लिखाई में भी वैसा ही, कॉलेज बंक कर दिन भर मस्ती। तभी तो बाबूजी ने अपना पी एफ़ का पूरा रुपया निकाल कर उसके लिए मोबाइल की दुकान खुलवायी। वहाँ पर भी दोस्तों का वैसा ही जमावड़ा।”

भाभी की बातें तीर सी बेधती हुई पारुल को छलनी करती रहीं। अंतस् लहू–लुहान हो गया। रेत के आशियाने का इंद्रधनुषी रंग धुलकर बेरंग हो गया। आँखों में धैर्य बाँधे कमरे में चली गयी। तन्हाई पाते ही बवंडर सा उठा और आँखों का बाँध सैलाब बन फूट पड़ा। घंटों आँखों की कोरें रिसती हुई तकिये को भिगोती रहीं। कभी फफकती, कभी ख़ुद को सँभालती हुई हथेली से मुँह को दबा लेती। कभी छोड़ जाने का निश्चय करती, तो कभी उदर पर हाथ रख बिलखने लगती।

सासु ने समझाया– “अमित बच्चा ही तो है; ठीक हो जाएगा। अड़ोसी–पड़ोसी की बातों पर ध्यान न दो, सब जलते हैं और ज़्यादा चिंता करने की ज़रूरत नहीं है, इसका असर आने वाले बच्चे पर भी पड़ सकता है। इसलिए ज़्यादा न सोचो बस घर के काम व आने वाले बच्चे पर ध्यान दो, और मान लो कभी कभार पी–खा ही लिया तो कौन सा पहाड़ टूट पड़ा? सब तरफ़ ढोल पीटने की क्या आवश्यकता है और अब उसकी इज़्ज़त ही तुम्हारी इज़्ज़त है।”

धीरे–धीरे मन को मनाने लगी, हाँ उसकी इज़्ज़त ही मेरी इज़्ज़त है। अपने माता–पिता को भी कुछ नहीं बताया। फोन से बातें भी कम ही करती, दिनभर काम में व्यस्त रहती। थकी–माँदी रात को अमित की राह तकती रहती। कभी ठीक–ठाक लौटता तो कभी नशे में। अब उसकी दिलफेंक बातें चुभने लगीं, जिन्हें बरदाश्त करने के सिवा उसके पास कोई दूसरा रास्ता भी नहीं था। कुछ पूछने पर उसे ही उल्टा–सीधा सुना देता। कभी–कभी हाथ भी उठा देता।

पारुल सहमी सी रहने लगी। अमित को कुछ भी नहीं कहती। उसके ऐसे व्यव्हार से ख़ून के घूँट पीकर रह जाती। सुबह से शाम तक घर के कामों में लगी रहती। तरह–तरह का खाना घर के सभी लोगों को बहुत पसंद था। चार टाइम खाना बनाने व घर के काम–काज में ही उसके दिन गुज़रने लगे। प्रसव के दिन भी वह काम में ही जुटी रही।

नाना बनने की ख़बर सुन रमेश बहुत ख़ुश हुए। छठी के अवसर पर घर–परिवार के लिए कपड़े तथा नाती को गहनों से लाद दिया। पारुल की सूखी–थकी काया देखकर कई बार रमेश व नीना ने पूछा – “तुम ख़ुश हो न बेटा?”

 …और पारुल हर बार मुस्कुराकर “हाँ” कहते हुए सिर हिलाती हुई बातों को समेट देती। पहला बच्चा; मायका जाने का मुहूर्त भी साल भर बाद का निकला। गोद में दूध पीता बच्चा व कोख लवेरा भर गया। डेढ़ साल बाद पारुल बेटा व बेटी दोनों को साथ लेकर मायके गयी।

घर ख़ुशियों से झूम उठा। नाना–नानी नाती–नातिन में अपने बच्चों की झलक देख उनके नटखटपन की बातें करते। आस–पड़ोस मित्र मंडली सब पारुल से मिलने आते रहते। कभी–कभी विप्रेंद्र से भी मुलाक़ात होती और आँखों से काश… छलक उठता पर किसी ने उसे शब्दों में नहीं गढ़ा, दिल धड़कता रहता और बस औपचारिक बातें, पर ये चंद लम्हे ख़ुशनुमा होते। दोनों स्कूल–कॉलेज की बातें कर खिलखिला उठते। 

“तुम्हें तो सभी बातें अक्षरशः याद हैं,” पारुल ने उसी अल्हड़ता से विप्रेंद्र को देखते हुए कहा।

विप्रेंद्र ने भी शरारती नज़रों से देखते हुए कहा– “मैंने तो तुम्हे कॉलेज के विदाई समारोह वाले दिन ही कहा था जब तुमने मुझे अपनी डायरी लिखने को दी थी और मुझसे पूछा था कि सभी डायरी लिखावा रहे हैं, तुम क्यों नहीं लिखवाते? क्या तुम हम लोगों को याद नहीं रखना चाहते? याद है मैंने क्या कहा था?”

“हाँ–हाँ याद है, तुमने कहा था कि हम लोगों को याद करने के लिए तुम्हारा दिमाग़ ही काफ़ी है,” पारुल ने विप्रेंद्र की बात को बीच से ही काट दिया।

“फिर तुम कैसे चिढ़ गयी थीं याद है।”

“कैसे याद नहीं रहेगा, इसका मतलब क्या था कि हम लोग डायरी लिखवा रहे हैं तो हमारे पास दिमाग़ नहीं है।”

"मैंने तो ऐसा नहीं कहा,” आँखों में पुरानी शरारत झलकी।

“मतलब तो वही निकलता है,” अपने पुराने हवाई किले में जा बैठी।

दोनों ठहाका लगाकर हँसने लगे। रोम–रोम पुलकित। आँखों में ख़ुशियाँ तैरने लगीं, उसने विप्रेंद्र से पूछा– “बताओ विप्रेंद्र तुम जीवन में सबसे अधिक ख़ुश कब हुए?”

“ख़ुश का पता नहीं, बस दुखित होना याद है,” सपाट स्वर में सपाट जवाब।

“कब?” पारुल की वही चहचहाती आवाज़।

“तुम्हारी विदाई वाले दिन!” विप्रेंद्र के स्वर शांत हो गये।

टिमटिमाती चाँदनी रात को राहु ने ग्रस लिया। 

“मज़ाक कर रहा हूँ यार,” विप्रेंद्र बात बदल कर उसे सामान्य करने की कोशिश करने लगा।

विप्रेंद्र ने उसे घर के साथ–साथ कोर्ट ज्वाइन करने की भी सलाह दी पर पारुल हक़ीक़त की धरातल पर आ गयी– “हो गया, अब तुम ही अच्छे व नामी वकील बनो इसीसे मैं ख़ुश हो जाऊँगी।” 

“अच्छा चलता हूँ, तुम्हारा बहुत समय खाया,” कहते हुए विप्रेन्द्र उठा।

उसे जाते हुए नज़र भर देखती रही। जवाब देना चाहती थी कि तुमने समय खाया नहीं विप्रेन्द, मैंने वही समय जीया बस वही। पर सारे शब्द हक़ीक़त की धूप पाते ही ओस के समान काफ़ूर हो गये।

पारुल में अब वह चंचलता नहीं रही थी। सभी उम्मीदों व आकांक्षाओं से परे शांत रहने लगी। नीना ने कई बार पूछा– “इतना शांत उदास क्यों रहती हो बेटा?”

उसने कुछ भी नहीं बताया– “सब ठीक है माँ।” कहकर माँ को शांत करा देती पर माँ के बेचैन मन को शांत करना आसान नहीं।

अमित जब पारुल को लेने गाँव आया तो नीना ने उससे भी पूछा पर उसने सीधे कह दिया– “मुझसे क्यों पूछती हैं मम्मी जी अपनी बेटी से ही पूछ लीजिए, कभी हम लोगों ने किसी चीज़ की कमी की हो तो कहिए। दिन भर जैसे चाहती है, वैसे ही रहती है। मन किया तो काम किये नहीं तो मनमर्ज़ी, माँ को ही तो दिनभर लगे देखता हूँ।”

नीना निरुत्तर अमित को देखती रह गयी। कहे भी तो क्या, चंद शब्द ही निकले– “थोड़ा खाने–पीने का ध्यान रखिए, बहुत दुबली लग रही है।”

ससुराल भेजते समय पारुल के बैग में काजू, किशमिश, हॉरलिक्स, बादाम जो भी समझ आता, उसे खाने की हिदायत देते हुए माँ भरती जाती। जाते समय सबका मन उदास था। साल में दो–चार दिन उसके रहने से घर गुलज़ार हो उठता। बच्चों का तुतलाना नाना–नानी को भी तुतला बना देता। 

पारुल उस बार वापस ससुराल नहीं जाना चाहती थी पर अमित ने बताया कि माँ को काम में बहुत दिक़्क़तें हो रहीं हैं; इस कारण वह पारुल को ज़्यादा दिन नहीं छोड़ सकता। पारुल की आँखों में रमेश को एक अनजाना दर्द दिखाई दिया, जिसे पढ़ने की बहुत कोशिश की पर गहराई में डूबते गये जहाँ दर्द–ही–दर्द था जो पारुल के शब्दों को झूठे करते लगे। उसने फिर पूछा– “कोई कष्ट नहीं है न बेटा?” 

और पारुल का वही जवाब– “नहीं पापा, बस आप लोगों को छोड़ने का मन नहीं करता।”

ऐसे में पारुल को उस बार भेजना बहुत कचोटा।

तपतपाती दोपहर में रमेश सिर पर गमछा बाँधे खाना खाने के लिए घर आ रहा था कि उसी समय आम के बग़ीचे में बच्चे दौड़ते–भागते–झगड़ते दिखे। पारुल का बचपना आँखों में उमड़ आया। उदास मन से घर पहुँचकर हाथ–मुँह धोने लगा। नीना ने खाना परोसा ही था कि मोबाइल घनघनाना उठा। नीना खिझीयाई भी– “चैन से खाना तो खा लीजिए।"

स्क्रीन पर अमित का नाम देखकर माथा ठनका कि इस वक़्त? 

“पारुल की तबीयत ठीक नहीं है। उसके पेट में दर्द है। उसे लेकर हॉस्पिटल जा रहे हैं। आप लोगों को घबराने की आवश्यकता नहीं है। हम लोग सब सँभाल लेंगे,”अमित ने बुझे स्वर में कहकर फोन कट कर दिया।

रमेश व नीना की बेचैनी बढ़ गयी। एक तो पहले से ही उन लोगों का मन नहीं लग रहा था, ऊपर से फोन। खाना हलक से नीचे नहीं उतर रहा था। ड्रायवर को गाड़ी बाहर निकालने के लिए कहकर, जैसे–तैसे खाना ख़तम किया। अमित को फोन करके बताया कि वे पारुल से मिलने के लिए आ रहे हैं।

अमित ने उन्हें आने से मना कर दिया– “नहीं, नहीं आने की कोई आवश्यकता नहीं। हम लोग देख रहे हैं, सब ठीक हो जाएगा।आप लोग परेशान न हों। अब पारुल ठीक है।”

रमेश की बेचैनी बढ़ती जा रही थी। “नहीं, नहीं एक बार पारुल को देख कर आ ही जाते हैं।” उसने अपने आप से कहा। रमेश और नीना कार में बैठ गये। मन बेचैन। बीच–बीच में ड्रायवर को थोड़ी तेज़ चलाने के लिए कहता। रेड सिग्नल देख समय पहाड़ सा लगने लगता। पॉकेट में मोबाइल फिर घनघनाया। स्क्रीन पर अमित का नाम देखते ही धड़कनों पर क़ाबू पाना असंभव हो गया। 

“क्या बात है अमित, पारुल कैसी है? हमें पारुल को देखने की बहुत इच्छा हो रही है बेटा। हम लोग आ रहे हैं।”

“पापा जी, पारुल नहीं रहीं। हम लोग हॉस्पिटल से घर ले जा रहे हैं,” रमेश ने रुआँसे स्वर में कहा।

एक सनसनाहट सी बदन में उठी और माथा झनझनाते हुए सुन्न सा हो गया। रमेश ने ड्रायवर को गाड़ी और तेज़ चलाने की हिदायत देकर अपना सिर सीट पर टिका लिया। आँखों की रिसती कोरों को भरने की नाकाम कोशिश। नीना रमेश के कंधे पर सिर टिकाए फफकती रही। दोनों के दिमाग़ में उधेड़–बुन चलती रही, क्यों, कब, कैसे, कहाँ ये सभी तीर हृदय को जार–बेजार कर छलनी करते रहे।

 दरवाज़े के बाहर लोगों का जमावड़ा तथा कुछ लोगों को अर्थी बनाते देखकर उनका हृदय फटकर चिंघाड़ उठा। 

“कहाँ है मेरी बच्ची, कहाँ है मेरी बच्ची?” कहकर चिल्लाती हुई नीना बेतहाशा दौड़कर अंदर चली गई। नीना की घबराई नज़रें चारों ओर खोजने लगीं। कुछ औेरतें सिर झुकाए मुँह गिराए बैठी दिखीं। 

“नाऽनी, मम्मी अंदल कमले में छो लई ऐ। छुबह छे नी उथ ली। मुझे बोत भूख लग ली थी, पापा ने ओलियो बिछकित दिया, नेआ तो बी दिया, तुम बी काओगी,” नवल अपनी दादी की गोद से उतर कर नानी के पास बोलते हुए आया।

नीना दौड़ती हुई अंदर कमरे की ओर जाने लगी। दरवाज़े पर ही पैर ठिठककर रुक गये। सुनसान कमरे में अकेली ज़मीं पर सफ़ेद चादर से ढकी काया। बेतहाशा दौड़ती हुई बगल में जा गिरी। सफ़ेद चादर हटाने के लिए जैसे ही हाथ बढ़ाया तो पीछे से आकर अमित की माँ ने नीना के बढ़े हाथ को पकड़ते हुए कहा– “मत हटाइये समधिन जी, नहीं देख पाइएगा। पूरा शरीर दवा के रियेक्सन से फूलकर एकदम भयानक सा काला पड़ गया है।”

नीना चिल्ला–चिल्ला कर रोने लगी। रमेश स्वयं रोते–सँभलते हुए नीना को सँभालने की कोशिश करने लगा। नीना ने बेतहाशा हाथ पीटते हुए चेहरे से चादर को हटाया। चेहरे पर काले धब्बे के निशान, मानो पूरी ऊँगलियाँ गवाही देने के लिए गाल पर खड़ी हों। नीना उसके गालों को सहलाती हुई चूमने लगी। मन में शंका कौंधी और उसने पूरी चादर एक ही झटके में उघाड़ फेंकी। पूरे बदन पर काले–काले चकते और गले में काली धारी के फूले हुए दाग। नीना व रमेश स्तब्ध देखने लगे। 

“नहीं... ये तो दवा का रियेक्शन नहीं है। सच–सच बताइए क्या हुआ? किसने ऐसा हाल किया मेरी बच्ची का?” नीना की करुणा रोष में बदल गयी।

“सब दवा का रियेक्सन है। लाश को इतनी देर घर में रखना ठीक नहीं। बाहर सब तैयारी हो गयी है। अब देर नहीं करनी चाहिए,” अमित के पिता गजाधर बाबू ने कहा।

“नहीं, यह दवा का रियेक्शन नहीं लगता समधी साहब। यह पुलिस का मामला है। बिना पुलिस आए हम किसी को छूने नहीं देंगे,” रमेश का आक्रोश सिर चढ़ गया।

“हम शरीफ़ लोग हैं, आज तक दरवाज़े पर पुलिस नहीं आई। पुलिस बुलाकर इसकी आत्मा को मत तड़पवाइये। पुलिस लाश का पोस्टमार्टम करेगी, क्यों साफ़–सुथरे शरीर का चीर–फाड़ करवा कर उसकी आत्मा को दुखित करना चाहते हैं? इसीलिए न मैं कह रहा था कि जितनी जल्दी हो दाह–संस्कार कर दो। जितनी देर होगी आत्मा भटकती ही रहेगी,” गजाधर बाबू ने नज़रें घूमाते हुए कहा।

“नहीं, अब तो पुलिस आएगी ही। मैं भी उसे छोड़ूँगा नहीं जिसने मेरी बच्ची की ऐसी हालत की है,” रमेश निश्चयात्मक स्वर में कहते हुए बाहर निकल गया।

नेहा और नवल का ध्यान आते ही नीना की सहमी नज़रें दौड़ने लगीं। नवल को अपने पास ही पीछे खड़ा देखा। 

“नेहा, नेहा कहाँ है?” उसने हड़बड़ाते हुए पूछा।

“वो रही नीलम की गोद में,” पास खड़ी औरत ने कहा।

“ये नीलम कौन है?” नीना ने उसे देखते हुए पूछा।

“अमित के दूर की बुआ की बेटी है।” 

धड़धड़ाधड़ पुलिस घर में भर गई। लाश का पंचनामा कराकर पोस्टमार्टम कराने के लिए भेज दिया गया। देखते–ही–देखते पारुल पंचतत्व में विलीन हो गई। अमित व उसके माँ–बाप को भी पुलिस पकड़ कर ले गयी।। सब कुछ तहस–नहस हो गया। हो–हल्ले के बीच नीना कुढ़ती–कसमसाती–सिसकती रही। नीना ने नेहा को नीलम की गोद से लेकर सीने से लगा लिया। नवल भी पास आकर बैठ गया। नीना दोनों बच्चों को सहलाती रही। पास खड़ी औरत बगल में आकर बैठ गयी। नीना ने गिड़गिड़ाती नज़रों से उस औरत की ओर देखते हुए पूछा– “क्या हुआ था बहन जी, कुछ तो बताइए। आपका घर को बिलकुल इस घर से सटा हुआ है। कुछ तो पता होगा।”

औरत सहमते हुए इधर–उधर देखने लगी, फिर उसने कहा– “आपकी बेटी बहुत सहनशील थी बहन जी। उनके कमरे से ही सटा हमारा कमरा है। एक ही दीवार होने से सभी आवाज़ें साफ़ सुनाई देती हैं। रोज़ का मार–पीट, कभी–कभी तो रात–रात भर सिसकने की आवाज़ें आतीं। अमित को कौन नहीं जानता, शुरू से ही शराबी व अय्याशी। फँस गई बेचारी इस अय्याश के चक्कर में।" नीना स्तब्ध सुनती रही, काटो तो खून नहीं।

"कल तो आठ–नौ बजे से ही लड़ने की आवाज़ें आ रही थीं। पारुल चीख–चीख कर पूछ रही थी कि जब तुम्हारा संबंध पहले से ही नीलम के साथ था तो तुमने मुझसे शादी ही क्यों की? मैं आज सबको बता दूँगी कि तुम और नीलम मेरे ही कमरे में… भाई-बहन के रिश्ते की आड़ में क्या गुल खिला रहे हो।

"अमित बार–बार उसे चुप कराने की कोशिश कर रहा था। पारुल चीख रही थी। बीच–बीच में बेल्ट के सड़ाप की आवाज़ भी आ रही थी। मैंने अपने पति से कहा भी कि चलिए कहीं कुछ अनहोनी न हो जाए। उन्होंने यह कह कर मना कर दिया कि यह तो उनके रोज़ का धंधा है चुपचाप सो जाओ, पर मुझे नींद नहीं आ रही थी। इसके बाद नीलम की भी आवाज़ आने लगी। शायद उसने ही पारुल का हाथ पकड़ा होगा तभी पारुल चीख रही थी छोड़ो मेरा हाथ, छोड़ो मेरा हाथ। अमित कह रहा था किसे बताएगी माँ को, बाबूजी को या अपने बाप को, ले बता और बता। पारुल के हाँफने की आवाज़ भी आ रही थी जैसे उसे किसी ने दबाया हो। फिर उसके बाद सन्नाटा सा छा गया।

"पारुल की मौत को सामान्य बनाने के लिए ही अमित ने रमेश को बताया कि पारुल के पेट में दर्द है और वह दर्द से ही… पर अमित के मना करने के बावजूद आप लोगों के यहाँ आ जाने से उसके सारे मनसूबों पर पानी फिर गया। वह तो आप लोग के पहुँचने से पहले ही क्रिया–कर्म पूरा कर देना चाहता था ताकि वह साफ़–साफ़ निकल जाए पर शायद आप लोगों को बेटी का आख़िरी दर्शन बदा था।”

नीना अपने दोनों घुटनों के बीच सिर रखकर रोती ही रही। रमेश आकर नीना को ढ़ाढ़स देते फिर कहीं एकांत कोने में जाकर कुहनी पर सिर टिका फफकने लगते। सब कुछ तहस–नहस हो गया।

गजाधर बाबू ने साफ़–साफ़ कह दिया कि घटना वाली रात तो वो और उनकी पत्नी दूसरे शहर में अपनी ड्युटी पे थे; इस कारण वे जल्द ही जेल से लौट आए। अमित जेल में रहा। केस साल दो साल पड़ा रहा। बीच–बीच में रमेश पेशी वाले दिन कोर्ट जाते, अमित को देख मन बौखला जाता। एक बार अमित ने मौक़ा पाकर कहा– “माफ़ कर दीजिए पापा जी।” 

रमेश ख़ून के घूँट पीकर रह गये। हर पेशी के बाद निराश क़दमों से लौट आते। पता चला कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट बदलवाने के लिए उन्होंने ढ़ाई लाख रुपए खर्च किये थे। नवल और नेहा के बालमन को भी समझा दिया कि उनके नाना–नानी अच्छे नहीं हैं; उन्होंने ही उसके पापा को जेल भिजवाया है।

गजाधर बाबू ने रमेश से समझौते की बात कही। अफ़सोस प्रकट करते हुए कहा– “जो होना था सो हो गया, बीते को कोई वापस नहीं ला सकता। अब उनकी निशानी को हमें ही सँभालना है। यतीम से पल रहे हैं फूल जैसे बच्चे। आप जैसा चाहते हैं अमित को सज़ा भी हो जाएगी पर बच्चे जीवन भर के लिए यतीम बन जाएँगे। अमित घर में आ जाएगा तो कम–से–कम बच्चों को तो देखेगा ही। हम कब तक जीवित रहेंगे। बच्चों के नाम दस–दस लाख रुपए जमा करा दिया गया है, उन्हें पैसों की कोई कमी नहीं होगी पर माँ–बाप का स्थान तो कोई नहीं ले सकता न।”

गजाधर बाबू की बातें रमेश के दिमाग़ में घूमती रहीं, कई रात रमेश को नींद नहीं आई। हर समय पारुल के बारे में सोचता रहता। नेहा व नवल का मासूम चेहरा बेचैन कर देता। सालों–साल कोर्ट के चक्कर व हर पेशी के बाद निराश क़दमों से वापसी, मन कुंठित हो जाता। दिलो-दिमाग़ का अंतर्द्वंद्व चलता रहता। दिल कहता कि अपने जान के टुकड़े के क़ातिल को छोड़ना नहीं; जैसे भी हो उसे फाँसी दिलानी ही है और शातिर दिमाग़ बीच में ही टपक पड़ता कि क्या इससे पारुल वापस आ जाएगी? ऊपर से उसकी आत्मा और कुंठित होगी कि उसके बच्चे यतीम से पल रहे हैं। कम–से–कम बाप रहेगा तो एक नज़र देखेगा ही। दिमाग़ ने फ़तह पा ली। बेटी का क़ातिल आज़ाद हो गया।

पारुल के जाने के बाद रमेश बिलकुल गुमसुम हो गया। उसकी याद उसे बेचैन करती रहती। उसके सभी सामानों को एकटक निहारता रहता। कभी नीना से कहता कि काश हम उसकी शादी विप्रेंद्र से ही कर देते तो कम–से–कम हमारी बेटी तो रहती, समाज जो कहता सो कहता। कहाँ है समाज जो क़ातिल को सज़ा भी नहीं दे पा रहा। फूट पड़ता रमेश का ग़ुस्सा फिर ख़ुद फूट–फूट कर रोने लगता।

सौतेली माँ आते ही बाप भी सौतेला हो जाता है। बच्चे दादा–दादी व नाना–नानी के आँचल में लाड–दुलार में ही खेले–बढ़े। होश सँभालते ही नवल को हॉस्टल में डाल दिया। पढ़ाई में हर वर्ष अव्वल अपनी माँ की तरह। नवल को इंजीनियरिंग के आख़िरी वर्ष में ही मल्टीनेशनल कंपनी में कैंपस सलेक्शन से पैंतीस लाख के पैकेज की नौकरी लग गयी। ज्वानिंग के बाद ही नवल नाना के लिए टी–शर्ट व नानी के लिए रेशमी साड़ी लेकर आया। थोड़ी सकुचाहट से नाना की ओर देखते हुए कहा– “नाना जी, मेरे साथ ही कॉलेज में साक्षी पढ़ती थी। उसकी भी मेरी कंपनी में ही नौकरी लगी है। बहुत अच्छी लड़की है। नेहा भी उसे बहुत पसंद करती है। एक बार आप लोग उससे मिल लिजिए, यदि पसंद आई तो…"

“यदि तुम्हें और नेहा को पसंद है तो अच्छी ही होगी बेटा। हम ज़रूर मिलेंगे,” कहते हुए सहर्ष स्वीकार लिया।

सालों गुज़र गए, पर कोई दिन ऐसा नहीं गुज़रा होगा कि रमेश को पारुल का ख़्याल न आया हो। सदा आस–पास ही महसूस करता। नवल की शादी से मन प्रसन्न है। रात देर तक शादी की बातें होती रही। बार–बार कहता –आज पारुल रहती तो बहुत ख़ुश होती।

शादी की थकान से नीना नींद की आग़ोश में चली गयी पर रमेश को नींद नहीं आ रही। करवट बदलते–बदलते एक तारे पर ध्यान टिक गया। बहुत देर तक निहारता–मुस्काता–बतियाता रहा, वह कह रही है – मेरी चिंता मत करो। मैं बहुत ख़ुश हूँ पापा। यहाँ कोई शारीरिक कष्ट नहीं। शरीर तो मैं नीचे ही छोड़ आई। मेरे शरीर को अमित बहुत कष्ट देता था पापा। बात–बात पर मुझे मारता था। बेल्ट की सड़ाप से मेरी आत्मा तक काँप जाती थी। कई बार जलते सिगरेट से मेरे अंदरुनी को भी दागा। आप लोगों को सुनकर बहुत दुख होता, इसलिए मैंने आप लोगों से कुछ नहीं कहा।

पारुल की बातें बेचैन करने लगीं। घबराहट ऐसी बढ़ी कि पूरे शरीर पर ओस की बूँदें सी फूट पड़ीं। उठकर बैठ गया। साँसें लम्बी होने लगीं। दम फूलने लगा। नीना को झकझोर कर उठाया फिर तारों की ओर इशारा करते हुए कहा– “उठ न नीना... देख अपनी पारुल है वहाँ।”

“कैसे समझाऊँ आपको, अब अपनी पारुल नहीं रही, वो हम सब को छोड़कर चली गई,” नीना ने रमेश को अपनी बाँहों में समेटते हुए कहा।
 

2 Comments

  • 16 Jun, 2019 08:22 AM

    "Drishtant hota yatharth se bhra ek sasakt kahani.....a complete literature."

  • 16 Jun, 2019 02:52 AM

    दिल को छूने वाली रचना। एक सांस में पूरी कहानी पढ़ गया। बहुत सुंदर।।

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