ख़ुदकुशी

16-01-2018

थकहार दुखों से एक दिन, 
सोचा जीवन का कर दूँ त्याग।
चल पड़ा कूदने, इक उक्त मापसे, 
मन में लिये कई करुण राग॥

घूम! काल भर पहुँच गया. . . फिर एक, 
पुल के पास मैं, 
लहरों से छलित. . . हो रहा था जहाँ, 
यह मन विशालमय,
जहाँ पवन मन्द करती थी. . . हृदय प्रघात भी, 
था वाहनों का शोर, और मन आघात भी॥

भर दोहरी साँस, कर दृढ़ प्रण, 
जो मूँदे चक्षु , अगले ही क्षण। 
कूदने को मैं था तैयार, 
किन्तु फिर आड़े आ गया, वह माँ का प्यार।
एक प्रतिबिम्ब. . . एक मधुर वाक्य ने, 
मेरे अस्तित्व ने, ममता के वाच्य ने।
भरे ज़ख़्म सारे, हरे दुख तमाम।
किया ज़िन्दगी को फिर.. मेरे नाम।
किया ज़िन्दगी को फिर .. मेरे नाम।

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