मैं थी
अल्हड़-अलमस्त
विचरती थी
स्वछंद
फिरती थी
कभी वन-उपवन में
तो कभी लताकुंज में
मेरे स्पर्श से
नाचते थे मोर
विहँसते थे खेत-खलिहान
किन्तु
इन मानवों ने
कर दिया कलुषित मुझे
अब नहीं आते वसंत-बहार
खो गई है
मौसम की ख़ुशबू भी।

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