घर शिल्प है
सुबह-शाम उगलता धुआँ,
कई बार भोर का सपना,
ईंटें सजाता हास्यवदन कारादण्डी,
श्वान के मुख पर अस्थि-चर्वण तृप्ति,
नदी के रेत पर -
पके आम की रोशनी में,
बसेरे की ओर लौटती चिड़िया,
अपने डैनों के भुलावे से ले गई थी उस दिन,
दाँये पैर के पंजे पर उड़ेल कर 
नम रक्तिम बालू नन्हें हाथों से,
कोयल के सर्वहारा से 
बया की सुघड़ता तक।
नीड़ से अट्टालिकायें जगत की, 
अपने आश्चर्यों के साथ खड़ी थीं।

बालुका के रिक्त गर्भ में
तिनके का एक ध्वज,
अब चिड़िया सो गई थी\
घर से आज़ादी का पहला घर,
ढलती रही साँझ टुकड़ों में,
बनते रहे घर दिवस-पथ पर,
उग आये थे जंगल अब घरों के 
वनहारा अकेला,
घर देश है,
देह तक सिमटा देहात
घर में अण्डे हैं,
कलरव हैं,
निकलते पंख हैं
चार दीवारें हैं खिचड़ी छत है,
उदासी में लिपटा अजनबीपन है,
हर साँस के साथ दरकती चूलें हैं
एक स्तूप है खुदाई के भग्नावशेष हैं,
संग्रहालयों में शब्दों की वाचालता।

0 Comments

Leave a Comment