एक नन्ही सी परी

13-04-2017

एक नन्ही सी परी

हरिपाल सिंह रावत 'पथिक'

मैं उपवन में अपनी धुन में
कर रहा था चहल क़दम,
रुक गया मैं सुन तोते सी,
एक आवाज़ तुरंत
व्याकुल होकर मैं मुड़ा जब,
कर अपनी आँखें बड़ी-बड़ी 
श्वेत रंग में मैंने देखी
एक नन्ही सी परी।

मुँह और हाथ भरे थे उसके,
वसुंधरा की धूल से,
माली न जाने कहाँ थे,
उस नन्हें से फूल के,
भाल पे एक चमक थी उसके,
आँखें थी नीर से भरी-भरी 
श्वेत रंग में मैंने देखी
एक नन्ही सी परी।

वो व्याकुल थी गोदी में
शायद आने को मेरी,
यही सोच उठा लिया प्यार से,
न कर मैंने देरी,
चारों ओर देखा और पाया,
न कोई मनु न उसकी छाया,
पायी मैंने भादों बेला में भी,
उस दिन पतझड़ की सी झड़ी
श्वेत रंग में मैंने देखी
एक नन्ही सी परी।

नाम जो पूछा उससे मैंने,
वो तो कुछ लगी और ही कहने,
समझ गया कि कुछ बात अलग है,
साधारण से ये हालात अलग है,
मैं उसे लगाकर सीने से अपने चिल्लाया- 
किसकी है ये नन्ही परी? 
श्वेत रंग में मैंने देखी
एक नन्ही सी परी। 

मैं उस दिन उस उपवन में
पहरों - पहरों घूमा, 
कभी-कभी रोने से रोका,
कभी उसका माथा चूमा,
मैं जब हार के बैठ गया,
उसके अपनों की मिलने की आस,
तब एक अल्हड़ सी महिला
आई, रोते रोते मेरे पास,
देख उसे नन्ही गुड़िया ने,
किया मुझे बाँहों से बरी 
श्वेत रंग में मैंने देखी
एक नन्ही सी परी।

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