एक मीठे गीत-सी तुम

17-05-2012

एक मीठे गीत-सी तुम

सुरेन्द्रनाथ तिवारी

(साभार "उठो पार्थ! गांडीव संभालो" काव्य संकलन से)

 

एक मीठे गीत-सी तुम गर लिपट जाओ अधर से,
आज मधुपायी भ्रमर-सा मत हो मैं गुनगुनाऊँ,
तुम कहो तो गीत गाऊँ---
हाँ, कहो तो गीत गाऊँ।


वक्र भौंहों में कसकती समंदर की रवानी
मदिर मधुबाला-सी मादका देहयष्टि, यह जवानी
ज्यों पिघल जाती हैं किरणें चाँद की आकर लहर तक,
मैं पिघल जाऊँ यूँ ही तेरे हृदय पर शीश रखकर
हँसे, इतराओ निहारो आईने में जब स्वयं को
फिर अगर नज़रें झुकाकर सोच कुछ-कुछ मुस्कराओ
आज संयम मेखला के बंध सारे तोड़ जाऊँ?
एक मीठे गीत-सी तुम गर लिपट जाओ अधर से,
आज मधुपायी भ्रमर-सा मत हो मैं गुनगुनाऊँ,
तुम कहो तो गीत गाऊँ---
हाँ, कहो तो गीत गाऊँ।


चाँदनी की छाँह में हम बुन रहे जो बेज़ुबानी
कुछ तुम्हारे रूप की, कुछ प्यार की मीठी कहानी
चाँद का दर्पण बनी यह, जब तलक नदिया बहेगी,
हर जवां दिल में प्रणय की यह कथा ज़िंदा रहेगी
पूर्णमासी की तरह गर मन-बदन पर बिखर जाओ
रजनीगंधा की कली-सा खिलखिला सौरभ लुटाऊँ।
एक मीठे गीत-सी तुम गर लिपट जाओ अधर से,
आज मधुपायी भ्रमर-सा मत हो मैं गुनगुनाऊँ,
तुम कहो तो गीत गाऊँ---
हाँ, कहो तो गीत गाऊँ।


तुम अगर बिंदिया लगाओ, तुम अगर आंचल उड़ाओ,
तुम अगर पायल बजाओ, अगर कंगना खनखनाओ
अगर झुककर इन पगों में आज आलक्तक लगाओ
तुम अगर नूपुर सजाओ, तुम अगर गागर उठाओ,
आज पनघट की डगर पर
मैं सुमन-सा बिखर जाऊँ।


एक मीठे गीत-सी तुम गर लिपट जाओ अधर से,
आज मधुपायी भ्रमर-सा मत हो मैं गुनगुनाऊँ,
तुम कहो तो गीत गाऊँ---
हाँ, कहो तो गीत गाऊँ।

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