दुनिया / ज़िंदगी

डॉ. सुरेन्द्र वर्मा

कितने रंग
ज़िंदगानी के संग
गिन सकोगे

मिली ज़िन्दगी
कब वापस जाए
पता ही नहीं

ज़िंदगी तो है
मौत की धरोहर
लौटानी होगी

माँगी नहीं थी
मिल गयी ज़िंदगी
करें शुक्रिया

प्यार से पली
अनुभवों में ढली
धनी ज़िंदगी

एक अनेक
व्यापक या संकीर्ण
दृष्टि दुनिया

पुराने दिन
कहाँ गई दुनिया
अच्छी दुनिया

दिन बदले
बदली नहीं दुनिया
वहीं की वहीं

0 Comments

Leave a Comment