डॉ. भारतेन्दु मिश्र की गीत सर्जना पर केन्द्रित बातचीत

20-02-2019

डॉ. भारतेन्दु मिश्र की गीत सर्जना पर केन्द्रित बातचीत

डॉ. रश्मिशील

 गीतों पर काम करते हुए मैंने अनुभव की सीढ़ी - में चर्चित नवगीतकार भारतेन्दु मिश्र के समस्त गीतों और नवगीतों को कालक्रम के अनुसार एकत्र करने का प्रयत्न किया है। यहाँ कुछ प्रारम्भिक गीत-मधुलिका काव्यांजलि (मधुलिका संस्था लखनऊ का काव्यसंग्रह प्रकाशन वर्ष-1984) और कुछ गीत-दस दिशाएँ- (युवा रचनाकार मंच, लखनऊ का काव्यसंकलन प्रकाशन वर्ष-1985) संग्रहों से भी संग्रहीत किए गये हैं। भारतेन्दु मिश्र के गीतों का रचना समय लगभग तीन दशकों तक फैला हुआ है। इसी अवधि के सन्दर्भ को देखते हुए कवि के विकास को अर्थात कवि की भाषा, उसके नवगीत शिल्प और सामाजिक परिप्रेक्ष्य को समझा जा सकता है।

भारतेन्दु मिश्र के गीत रचना कौशल के विकास को समझने के लिए यह आवश्यक है कि कवि के प्रारम्भिक दौर की तुकबन्दियों से सदी के प्रथम दशक तक की प्रगति को तीन काल खंडों में बाँट कर देखा जाए। आजकल जिस आकार प्रकार के काव्यसंकलन प्रकाशित हो रहे हैं उस तरह से इस पुस्तक में तीन चार नवगीत संग्रह बन सकते हैं। दूसरी बात यह कि इन गीतों और नवगीतों को विषयवस्तु के आधार पर हमने एकत्र करने का प्रयत्न किया है। गीत की नई पीढ़ी के पाठकों और शोधार्थियों के लिए गीतों के साथ ही उनका रचना समय भी दे दिया गया है। लगभग एक दशक पूर्व आदरणीय देवेन्द्र शर्मा इन्द्र जी ने भारतेन्दु जी के जुगलबन्दी शीर्षक नवगीत संग्रह की भूमिका लिखी थी। वह गीत संग्रह किन्हीं कारणो से प्रकाशित नहीं हो सका। यहाँ उसे ही भूमिका के रूप में प्रकाशित किया जा रहा है। इसी प्रकार परिशिष्ट में कवि के प्रथम गीत संग्रह पारो की भूमिका और प्रसिद्ध छन्दकार श्री अशोक कुमार पाण्डेय जी द्वारा लिखी समीक्षा आदि को संकलित किया गया है। अनुभव की सीढ़ी के गीतों का वर्गीकरण क्रमश: इस प्रकार है—

(क). बाँसुरी की देह (राग-विराग और गृहरति के गीत नवगीत)

(ख). बाकी सब ठीक है (नगरबोध और विसंगतियों के नवगीत)

(ग). मौत के कुएँ में (श्रम सौन्दर्य:स्त्री मजदूर और किसान चेतना के नवगीत)

(घ). जुगलबन्दी (राजनीति धर्म और दर्शन और सामाजिक द्वन्द्व के गीत नवगीत)

(ड.). शब्दों की दुनिया (कुछ अन्य मुक्तक और नवगीत)

 

इन पाँच खंडों में विभक्त भारतेन्दु मिश्र की गीत सर्जना को विधिवत समझने के लिए मैंने कवि से सीधे कुछ सवाल भी किए हैं, जो यहाँ दिए जा रहे हैं। मुझे लगता है कि भारतेन्दु जी की रचनाधर्मिता को समझने के लिए यह आवश्यक था।


रश्मिशील :

गीत गाये जाने वाली कविता है इसीलिए आलोचक उसे गंभीरता से नहीं लेते क्या आप सहमत हैं?
भारतेन्दु मिश्र : 

रश्मिशील जी! एक हद तक आप ठीक कहती हैं, आलोचकों ने मंचीय गीतकारों के कविता विरोधी आचरण को लेकर ही गीतकारों को गंभीरता से नहीं लिया। आप अन्दाज़ा लगाइए कि कम से कम दर्जनों गीतकार दर्जनों विश्वविद्यालयों में प्राध्यापक रहे, कुछ आज भी हैं लेकिन गीत नवगीत विमर्श पर केन्द्रित कोई राष्ट्रीय संगोष्ठी कभी किसी ने आयोजित नहीं की एक-आध अपवाद को छोड़कर - चाहे वो शंभुनाथ सिंह, नईम, देवेन्द्र शर्मा इन्द्र, सोमठाकुर, रवीन्द्र भ्रमर, राजेन्द्र गौतम हों या फिर कुँअरबेचैन, विद्यानन्दन राजीव, श्रीराम परिहार, ओमप्रकाश सिंह अथवा रामसनेही लाल यायावर आदि हों। मेरी अधिकतम जानकारी में ये सभी हिन्दी के ही प्राध्यापक रहे हैं या हैं। तो अधिकतर गीतकार /नवगीतकार या तो आत्मकेन्द्रित हो गए हैं या दूसरों की बिछाई दरी पर तशरीफ़ रखने के अभ्यस्त हो गए हैं। जब गीतकार ही गंभीर नहीं हैं तो आलोचक को क्या पड़ी है। कुछ गीतकारों में स्वाभिमान बेचकर सामान की तरह बिक जाने तक की प्रवृत्ति देखी गई है। और आलोचना के नाम पर गीत के आलोचक अपने आप ही अपनी कविताओं पर टिप्पणी करने लगें तो उन्हें गंभीर मानने/समझने की भूल कैसे की जा सकती है। हर एक गीत आलोचना योग्य नहीं होता। ज़्यादातर कविता का पाठ्य रूप ही आलोचना योग्य होता है। 
रश्मिशील : 

आपको भी गीत की समीक्षा के लिए जाना जाता है? आपकी किताब भी आयी है?
भारतेन्दु मिश्र : 

जी लोग ऐसा मानते हैं। पिछले दिनों समकालीन छन्दप्रसंग नाम से मेरी समीक्षा की किताब आयी है। जो 1991 से 2001 तक की छन्दोबद्ध कविता की समीक्षा पर केन्द्रित है। असल में एक बार डॉ. नामवर जी के साथ डॉ. राजेन्द्र गौतम और मैं एकत्र मंच पर थे तब गीत की आलोचना की बात हो रही थी। उस अवसर पर नामवर जी ने कहा था। "गीत की आलोचना अब मैं क्या करूँगा? गीत की आलोचना राजेन्द्र गौतम और भारतेन्दु मिश्र करेंगे।" उन्होंने पता नहीं किस भाव से ये वाक्य अपने वक्तव्य में कहा लेकिन मुझे अच्छा लगा और बाद में छन्द प्रसंग का प्रकाशन हुआ।
रश्मिशील :

आपका प्रस्तुतीकरण तो बहुत सुन्दर होता है फिर आप कवि सम्मेलनों से क्यों नहीं जुड़े?
भारतेन्दु मिश्र : 

बहुत बढ़िया सवाल आपने किया। इस विषय में एक प्रसंग है पहले वो सुनिए- मैंने कवि सम्मेलनों में जाकर देखा है। और इस सदी के सर्वश्रेष्ठ मंचीय गीतकार आदरणीय नीरज जी के साथ भी कविता पाठ किया है। लेकिन मेरा अनुभव अच्छा नहीं रहा। सन 1982 में होली की घटना है लखनऊ में चौक एक जगह है जहाँ के एक ज्वेलर खुनखुन जी का बड़ा कारबार है तो उन्हीं की कोठी के सामने सड़क पर ही यह कवि सम्मेलन आयोजित किया गया था। उसमें मैं भी स्थानीय युवा कवियों के रूप में शामिल था। बीस रुपये पारिश्रमिक मिला था तब मुझे याद है। बेरोज़गारी के दिनों में वो बहुत बड़ी राशि थी। ..खैर, उस कवि सम्मेलन ने मेरी दिशा बदल दी। उस कवि सम्मेलन में नीरज जी अध्यक्षता कर रहे थे, व्यंग्यकार के.पी.सक्सेना, सुमित्रा कुमारी सिन्हा, के अलावा सांड बनारसी और सूंढ फैजाबादी जैसे लोग थे। संचालन कोई प्रो. अनजान कर रहे थे। तो संचालक ने मुझसे पहले किसी युवा कवि को बुलाया- उसने कुछ गाने की कोशिश की और श्रोताओं ने हूट कर दिया। वह बेचारा काँपने लगा और जल्दी से किसी तरह कविता पढ़कर अपनी जगह पर जा बैठा। उसके बाद मुझे आमंत्रित करने से पहले संचालक ने कहा – "दोस्तों बस इसी क्रम में एक और युवा कवि हैं- भारतेन्दु मिश्र ‘इन्दु’ इन्हें भी दो मिनट झेल लीजिए।" ..खिलन्दड़े श्रोताओं ने तालियाँ बजाईं और मेरा नाम घोषित हुआ। इतने विशाल मंच पर सामने हज़ारों श्रोताओं की भीड़ थी। अच्छे-अच्छों के पसीने छूट जाते हैं। वह भी नीरज जी के सामने कविता पढ़ने का यह पहला मौका था तो मैं कुछ गंभीर था। वैसे भी संचालक को मालूम था कि मैं गीत पढ़ने जा रहा था। कम से कम इस प्रकार के बेहूदे संचालन के लिए कतई तैयार नहीं था। हमारी संस्था युवा रचनाकार मंच तब बन चुकी थी। युवा जोश तो था ही। मैंने खड़े होकर माइक पकड़कर कहा "दोस्तों आदरणीय नीरज जी की अध्यक्षता में जिस तरह से विद्वान प्रोफेसर अंजान ने मुझे अपमानित करते हुए कविता पाठ के लिए बुलाया है। मैं उसकी निन्दा करता हूँ। किसी हास्य कवि द्वारा गीतकार का अपमान है। मैं ऐसी कविता नहीं सुनाना चाहता जिसे आपको झेलना पड़े।" श्रोताओं ने मेरी बात को संजीदगी से लिया तालियाँ बजीं और नीरज जी ने हस्तक्षेप किया, संचालक ने शर्मिन्दा होकर मुझे गले से लगाया और मंच से क्षमा माँगी। एक बार फिर मुझसे गीत पढ़ने का आग्रह किया। मैंने श्रोताओं से मुखातिब होकर कहा "दोस्तों केवल चार पंक्तियाँ सुना रहा हूँ, अच्छी लगें तो आगे सुनाऊँगा नहीं तो जहाँ से उठकर खड़ा हुआ हूँ वहीं पर बैठ जाऊँगा।" ..फिर मैंने चार पंक्तियाँ सुनाईं जो इस प्रकार हैं-

आचरण भूल बैठे हैं हम
जागरण भूल बैठे हैं हम
सन्धियाँ हों तो कैसे भला
व्याकरण भूल बैठे हैं हम॥ 

..तालियाँ बजने लगीं वंस मोर की आवाज़ें आने लगीं। मैं अपनी मंचीय अदा दिखाते हुए अपनी जगह पर बैठ गया। संचालक ने फिर मंच से माफी माँगते हुए मुझे दुबारा अपना गीत पढ़ने के लिए आमंत्रित किया। मैंने अपना सोनपरी वाला गीत प्रस्तुत किया। बाद में नीरज जी ने कहा- “बहुत दिनों के बाद आप जैसे युवा गीतकार को पाकर प्रसन्नता हो रही है। मेरा आशीर्वाद आपके साथ है।” फिर उन्होंने अपने गले की माला आशीर्वाद स्वरूप मेरे गले में डाल दी। वहीं उपस्थित के.पी. बाबू (प्रसिद्ध व्यंग्यकार के.पी. सक्सेना) ने कहा- "अमाँ यार, कमाल कर दिया आपने! आप तो जितना उम्दा लिखते हैं उतना उम्दा पढ़ते हैं।" लेकिन मंच पर ही विराजमान वरिष्ठ गीतकार सुमित्राकुमारी सिन्हा जी ने मुझे गले से लगा लिया और गदगद कंठ से कहने लगीं- “भैया! तुमने आज गीत की लाज बचा ली है। इन हास्यकवियों ने कवि सम्मेलनों को बरबाद कर दिया है।” ..बहरहाल मुझे नहीं लगा कि वह जगह मेरे लिए सही थी। ऐसे वातावरण में कब तक कोई गीत की लाज बचा सकता है। इस प्रकार मंच के प्रपंच से मेरी शुरूआत गलत हो गयी और तभी से मंच की ओर मै कभी नहीं गया। दिल्ली आने के बाद जब जैसे-जैसे नवगीत की समझ बढ़ी मैं मंच से और दूर होता चला गया। नवगीत दशकों में शंभुनाथ जी के संपादकीय पढ़ने के बाद मैंने अपने नाम के साथ लिखा जाने वाला ‘इन्दु’ उपनाम भी हटा लिया। अब मेरी मान्यता है कि मंच के प्रपंच सुनकर तो घृणा ही की जा सकती है। वैसे हिन्दी अकादमी दिल्ली, उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान लखनऊ, हिन्दी भवन भोपाल, आकाशवाणी, दूरदर्शन आदि के सरकारी/संस्थागत कवि सम्मेलनों में जब कहीं बुलाया गया तो वहाँ जाता रहा हूँ। लेकिन ठेकेदार कवियों द्वारा आयोजित कवि सम्मेलनों में जाना बन्द कर दिया। मुझे उसका कोई दुख नहीं है, मैं वहाँ फिट नहीं हो पाता। 1985 में कानपुर शिवाला में आदरणीय शिवमंगल सुमन जी के साथ कविता पाठ का अनुभव। 1998 में लालकिला मैदान में हिन्दी अकादमी के कवि सम्मेलन में भागीदारी। 2000 में आकाशवाणी के सर्वभाषा कवि सम्मेलन में भाग लेने का अवसर मिला जिसमें मैंने संस्कृत के आचार्य कवि राधावल्लभ त्रिपाठी जी की कविता का काव्यानुवाद प्रस्तुत किया था। तो ये कुछ अच्छे अनुभव भी रहे। दिल्ली के पुस्तक मेले में कई बार कविता पाठ किया। अभी हिन्दी साहित्य सम्मेलन वालों ने बोलियों के कवि सम्मेलन में बुलाया था, तो वह भी बहुत सुन्दर अनुभव रहा। अनेक दिल्ली के महाविद्यालयों/विद्यालयों में कविता पाठ के लिए यदा-कदा आता-जाता हूँ। 
रश्मिशील :

भारतेन्दु जी! मेरे लिए यह भी जानना ज़रूरी है कि दिल्ली के गीतकारों में आपने कैसे जगह बनाई ...और अब काफी समय से आप जैसे चर्चित कवि ने गीत नहीं लिखे?
भारतेन्दु मिश्र :

रश्मिशील जी! यह मेरी दुखती रग है। मैं 1986 में नौकरी के सिलसिले में लखनऊ से दिल्ली आ गया था। मेरे पूर्व परिचित श्री बाबूराम शुक्ल जी ने तभी मेरा परिचय वरिष्ठ नवगीतकार देवेन्द्र शर्मा इन्द्र जी से कराया। राजेन्द्र गौतम, पाल भसीन, योगेन्द्र दत्त शर्मा ओम निश्चल से भी इन्हीं दिनों मिला। विजयकिशोर मानव आदि से भी यहीं दिल्ली आकर मुलाकातें हुईं। बाद में जब दयालपुर में रहा तभी अलाव के संपादक रामकुमार कृषक, सुरेश सलिल, जैसे गीतकारों से भी मुलाकात हुई। जानकीवल्लभ शास्त्री, वीरेन्द्र मिश्र, कुमार रवीन्द्र आदि से भी उनके दिल्ली प्रवास के अवसर पर मिल चुका था। हालाँकि तब तक गीतकारों को लेकर मेरे मन में अनेक भ्रम उत्पन्न हो चुके थे। 1990 तक गीतकारों की सोहबत में जाने बैठने का उल्लास बना रहा। रमेश रंजक से विट्ठलभाई पटेल हाउस में जलेस की बैठकों में कई बार मिला। वीरेन्द्र मिश्र जी ने कोई गीत किसी पत्रिका में पढ़कर मुझे खत लिखकर बुलाया और उनके सानिध्य में भी बैठने को मिला। उन्हीं दिनों शंभुनाथ सिंह, जानकीवल्लभ शास्त्री, त्रिलोचन शास्त्री और रामदरस मिश्र सरीखे वरिष्ठ कवियों का स्नेह और आशीर्वाद से भरे पत्र मिले। बहरहाल सबकी दुनिया अलग-अलग थी। और नवगीत दशकों के रचनात्मक प्रभाव को ये लोग ही क्षीण करने में लगे थे। तभी पारो, मेरे पहले गीत संग्रह को हिन्दी अकादमी से अनुदान मिला और 1991 में पारो का प्रकाशन हुआ। फिर तीन वर्ष - नवगीत एकादश(1994) - पर काम करता रहा। इसी बीच मेरा खण्डकाव्य- अभिनवगुप्त पादाचार्य(1994) प्रकाशित हुआ। त्रिलोचन जी अभिनवगुप्त पादाचार्य को लेकर बहुत बातें समझायीं। उन दिनों उनके साथ बहुत बैठकें हुईं। इन्हीं दिनों गीत और दोहे एक साथ लिख रहा था। 1998 में कालाय तस्मै नम: (सतसई) आई। सन 2000 में सतसई का दूसरा संस्करण भी आया। इस बीच और भी किताबें आईं, गीत सृजन चलता रहा पर गीत संग्रह प्रकाशित नहीं हो पाया। मैं समझता हूँ खंडकाव्य, सतसई और अवधी कविताओं की पुस्तक भी इसी बीच में आयी। मैं इन सभी कृतियों को गीत चेतना के ही विस्तार के रूप में देखता हूँ। दूसरी बात मेरी उदासीनता का एक प्रमुख कारण था मेरी उपेक्षा क्योंकि पारो को लेकर किसी वरिष्ठ कवि ने कोई सकारात्मक टिप्पणी/सुझाव नहीं दिया था। मैं समीक्षा मैनेज कराने के पक्ष में कभी नहीं रहा। मैंने किसी से पारो की भूमिका भी नहीं लिखवाई जिनसे लिखवाने का मन था उनके पास मेरे गीतों के लिए समय नहीं था। हालाँकि आज इसी प्रबन्धन का युग है। आर्थिक कारण भी उसमें एक रहा। अब प्रकाशक पैसा लेकर कविता की किताब छापता है। इसलिए भी संकलन नहीं छप सका। वैसे पत्रिकाओं में गीत नवगीत लगातार प्रकाशित होते रहे और आदरणीयों का आशीर्वाद भी मिलता रहा। 
रश्मिशील :

आपकी गीत रचनाधर्मिता पर देवेन्द्र शर्मा इन्द्र जी का कितना प्रभाव है?
भारतेन्दु मिश्र :

देखिए, वो मेरे आदरणीय हैं उनसे बहुत कुछ सीखा है। सीखने के बाद अपनी अलग पहचान भी बनाने की कोशिश की है। जहाँ तक प्रभाव की बात है तो मैंने यदि उनसे प्रभाव लिया है तो उनपर अपना प्रभाव डाला भी है। उन्हें पारो के नवगीत मैंने समर्पित किए फिर 1994 में उनकी षष्ठिपूर्ति पर नवगीत एकादश समर्पित किया। इसमें तीन वर्ष का समय लगा था। ‘देवेन्द्र शर्मा इन्द्र :व्यक्ति और शक्ति’ शीर्षक पुस्तक के रूप में उन पर केन्द्रित समीक्षात्मक पुस्तक का आयोजन पाल भसीन के साथ मिलकर किया। जो पुस्तक कुछ बाद में आयी। इसके बाद उन्होंने मुझे भी अपनी एक गीत पुस्तक समर्पित की। बिना आग्रह किए सस्नेह स्वत: मेरे गीतों पर एक टिप्पणी लिखकर दी। यह एक समय में जीने वाले दो रचनाकारों के बीच का रचनात्मक आदान-प्रदान होता है। वैसे वे कभी मेरे अध्यापक नहीं रहे। मैं औपचारिक रूप से हिन्दी का विद्यार्थी भी नहीं रहा। पारिवारिक सदस्य के रूप में उनका स्नेह अवश्य मुझे मिला किंतु उनकी अधिकांश रचनाधर्मिता अपने विस्तार के कारण आक्रांत करती है और जाने क्यों कभी-कभी मेरे मन में निराशा उत्पन्न करती है। मैं सर्वत्र उनसे सहमत नहीं हूँ, वो विस्तार के रचनाकार हैं मैं कविता की सूत्रात्मकता में विश्वास करता हूँ। मुझे लगता है शायद गीत में जो कहना था वो अब कह चुका हूँ। अन्य विधाओं में भी तो लगातार लिखता ही रहा हूँ। मुक्तछन्द कविताएँ, लम्बी कविताएँ और अवधी की कविताएँ आज भी प्रकाशनार्थ विलम्बित हैं। 
रश्मिशील :

अंत में हाल का लिखा हुआ गीत सुनाएँ...जिसके बाद आपने नहीं लिखा?
भारतेन्दु मिश्र: 

आदमी सीढ़ी बना है शीर्षक गीत है देखिए, यह भी चार पाँच वर्ष पहले की रचना है जिसे आप अंतिम गीत कह सकती हैं - 

आदमी के वास्ते ही
आदमी सीढ़ी बना है। 

 

मोल श्रम का है न कोई
मोल बस बाजीगरी का
लोग कुछ उलटे खड़े हैं
वक़्त है जादूगरी का
हमें खुश रहना मना है। 

 

जाति-भाषा वर्ग की
कुछ धर्म की भी सीढ़ियाँ हैं
ख़ुश रहे शोषक सदा ही
दर्द सहती पीढ़ियाँ हैं
साफ कुछ कहना मना है।

 

जब जिसे चाहो खरीदो
जब जहाँ चाहो लगा लो
सीढ़ियाँ चढ़कर उतरकर
वक़्त को अपना बना लो। 
जाल वैभव का तना है। 


​​​​​​​रश्मिशील :

अंतर्जाल पर भी बहुत नवगीत लिखे जा रहे हैं, नवगीत की पाठशाला भी खुल गई है?.. आपको लगता है कि इससे नवगीत का विकास होगा?
भारतेन्दु मिश्र : 

देखिए, अंतर्जाल पर पूर्णिमा जी और कुछ अन्य मित्रों के प्रयास से जो नवगीत की पाठशाला आदि योजनाएँ चलाई जा रही हैं- वह छन्दोबद्ध कविता के विकास विस्तार की दृष्टि से ऐतिहासिक कार्य है लेकिन उसे नवगीत के विकास और उसके विवेचन की बारीकियों को समझने का अंतिम मंच नहीं माना जा सकता। नेट पर एक क्लिक करके हम बहुत कुछ दर्शाते हैं लेकिन संवेदना और भावना प्रकट करने के लिए वहाँ कोई स्थान नहीं होता। बहुत से अल्हड़ और फेक नाम वाले लोग भी हैं वहाँ। बहुत से नादान दोस्त हैं, बहुत से मठ और मठाधीश भी हो सकते हैं जिनकी समझ पर अचरज हो सकता है। तो ..वहाँ अलग दुनिया है जहाँ एक मित्र टोली बार-बार अधकचरे गीत को लाइक करती रहती है। कभी-कभी कोई आचार्य भी मिल सकते हैं जो सार्थक सुझाव आदि भी देते हैं। लेकिन बाद में सुझाव लेने वाला उनके प्रति कोई धन्यवाद का भाव रखने वाला हो यह ज़रूरी नहीं तो नेट पर छाए नवगीत ही नहीं अधिकांश साहित्य और साहित्यकारों /जानकारियों को बहुत प्रामाणिक नहीं माना जा सकता। ..किंतु तमाम नवगीतकारों तथा उनसे जुड़ी जानकारियों को एकत्र करने और नवगीतकारों को जोड़ने का काम पूर्णिमा जी के अनवरत प्रयास से हुआ है इसमें कोई दो राय नहीं। पूर्णिमा जी ने नवगीत अभियान को इस समय में पुनर्जीवित किया है। 


 

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