दो नए ऐतिहासिक उपन्यास- एक था महान ’सिंकदर’ और एक थी ’महारानी हासेपसुत’

01-01-2020

दो नए ऐतिहासिक उपन्यास- एक था महान ’सिंकदर’ और एक थी ’महारानी हासेपसुत’

डॉ. रश्मिशील

लेखक : सुधीर निगम
पुस्तक : सिकंदर
पृ. संख्या: 112,
मूल्य : हार्डबाउंड-200/-पेपरबैक 100/-
प्रकाशन वर्ष : 2018, दिसम्बर
प्रकाशक : संवाद प्रकाशन, आई- 499 शास्त्री नगर मेरठ-250004

संवाद प्रकाशन मेरठ से सुधीर निगम के दो नए ऐतिहासिक उपन्यास प्रकाशित हुए हैं। इसके पूर्व भी ऐतिहासिक उपन्यासों की शृंखला में लेखक के तीन उपन्यास आए है, जिनमे से एक ’हेलन की आत्मकथा’ नामक उपन्यास का दूसरा संस्करण पेंगुइन प्रकाशन से आया है। समीक्षाधीन उपन्यासों में से सिकन्दर उपन्यास लघु कलेवर का होते हुए भी वस्तु विन्यास में अनूठा है। सिकंदर के जीवन पर अनगिनत पुस्तकें लिखी गई है, परन्तु उनमे मिथकों का बाहुल्य है। अपने बारे में तमाम मिथकों को सिकंदर ने स्वंय प्रश्रय दिया और इनके तथा पश्चातवर्ती मिथकों को लेकर एक पुस्तक अलेक्ज़ेंडर रोमांस के नाम से मिस्र के अलेक्ज़ेंड्रिया में प्रकाशित हुई। अलेक्ज़ेंडर पर लिखी गई तमाम पुस्तकें इससे प्रभावित रही है। प्रस्तुत पुस्तक में लेखक ने बड़ी सफ़ाई से मिथकों से किनारा किया और यथार्थ पर बल दिया है।

सत्रह अध्यायों में विभक्त समीक्ष्य कृति में सिकन्दर प्रारंभ से ही एक उत्साही युवक के सामने आता है। उपन्यास एक अत्यन्त रोमांचक घटना के साथ प्रारंभ होता है। थेसली से विक्रय के लिए आए एक श्रेष्ठ घोड़े को, जिसे कई अनुभवी घुड़सवार भी वश में कर उसकी पीठ पर सवार नहीं हो सके थे, सिंकदर ने अपनी चतुराई एवं साहस न केवल वश ने किया अपितु उस पर सवारी कर मैदान के दो चक्कर भी लगा लिए। उसके इस साहस पूर्ण कार्य से आह्लादित उसके पिता फिलिप ने उसे आशीर्वाद दिया “मेरे बेटे तुम अपनी महत्वाकांक्षाओं के अनुरूप एक बड़ा साम्राज्य तलाश करना क्योंकि मकदूनिया तुम्हारे लिए बहुत छोटा है।” (पृष्ठ 18)

पिता से प्राप्त आशीर्वाद ने उसकी महत्वाकांक्षाओं को और अधिक ऊँचाइयाँ प्रदान कीं16 वर्ष की आयु में ही वह कई युद्ध जीत चुका था। राजा बनते ही उसने पूरे यूनान को एक सूत्र में बाँध दिया। पर्शिया पर आक्रमण के प्रथम युद्ध में उसके सैनिक कौशल का इतना विश्वसनीय चित्रण किया गया है कि पाठक मान लेता है कि 15 ज़ार की सिकंदर की सेना शत्रु की ढाई लाख की सेना को परास्त कर सकती है।

सिकंदर विजित राजाओं के परिवारों के प्रति सद्व्यवहार करता है तो क्रूरता की सीमाएँ भी पार कर जाता है। यूनान के सबसे पिछड़े और असभ्य मकदूनिया के निवासी सिकंदर की मूल वृत्तियाँ उसका दार्शनिक गुरु अरस्तु भी नहीं बदल पाया। लेखक ने उसकी चारित्रिक विशेषताओं को रेखांकित करते लिखा है। “सिकंदर ने जहाँ पिता फिलिप से विवेक युद्ध कला, नेतृत्व और प्रशासन सीखा था, शिक्षक अरस्तु से राज्य को दृढ़ बनाने के लिए संयम और संतुलन की महत्ता समझी थी वहीं उन्माद, आवेश और अभिमान जैसे दुर्गुण उसे माता ओलिपिंआस से विरासत में मिले थे। सिकंदर का स्वभाव क्रोधी और असंयमित था, किंतु मस्तिष्क व्यावहारिक था।” (पृष्ठ-45)

असहमति होने पर वह अपने साथियों का वध कर देता। उसकी नृशंसताएँ चंगेखां के समकक्ष थीं पर उसके विपरीत उसके पास एक प्रेमिल हृदय भी था वैक्ट्रिया (कंधार और कंबोज के उत्तर में स्थित) के सामंत की हत्या करवा देता है, पर उसकी कन्या रोक्सेना से एक संक्षिप्त मुलाक़ात में उस पर रीझकर उससे प्यार कर बैठता है और विवाह कर लेता है- “सिकंदर पर बंकिम दृष्टि डालते हुए वह अचानक मुड़ी और धीरे ललित पग रखते गजगामिनी सी प्रत्यागमन कर कई पर सिकंदर के पराजित हृदय में निष्काम, निर्मल निश्चल, प्रेम भावना की लकीरें छोड़ गई। सिकंदर सोचता रहा कि यह दैवयोग का मंजुल परिणाम है या मनः योग का एक बार विजय प्राप्त करने के बाद सिकंदर की प्रवृत्ति विजितों से अच्छे संबंध बनाने की थी, अतः उसने तत्काल विवाह प्रस्ताव भेज दिया।” (पृष्ठ-67)

भारत में पोरस को पराजित करने के बाद उसकी अनम्यता से प्रभावित होकर उससे मैत्री संधि कर लेता है। स्वाभिमानी पोरस सिकंदर से मित्रता स्वीकार कर बाद में उसे सैनिक सहायता क्यों देता है? इसका लेखक ने बड़ा सटीक कारण दिया है- “पुरू ने निरपेक्ष भाव शून्य दृष्टि सिकंदर पर डालते हुए सोचा कि इसका प्रस्ताव अस्वीकार करने पर यह व्यक्ति जैसी कि इसकी ख्याति है, मेरे राज्य की निरीह निर्दोष प्रजा का संहार कर सकता है उसकी संपत्ति लूट सकता है अतः इससे बचने के लिए इसे काबू में रखना होगा भले ही मुझे अपने सिद्धांतों से समझौता करना पड़े। गण के क्षत्रियों की स्वाभाविक निर्बलता उसने इस ओट में छिपा ली।”(पृष्ठ-82)

पश्चिमी भारत में विजय के पश्चात सिकंदर की सेना आगे बढ़ने से मना कर देती है। मना करने के पहले सैनिक परस्पर विमर्श करते हैं। इस विमर्श को लेखक ने संवाद शैली में चित्रित किया है। इससे पूरे प्रकरण में नाटकीयता आने से रोचकता आ गई है। सैनिक अपना असंतोष भी अनुशासित रूप से व्यक्त करते है। उदाहरण दृष्टव्य है-

नायक एक- लेकिन हम विद्रोह नहीं करेगे। न सम्राट का अपमान करेंगे न अपनी तारीफ़ें झोकेगे, न पुराने मसले उठाएँगे।

नायक दो- फिर हम करेंगे क्या? बेकार ही इतनी देर से माथा पच्ची कर रहे हैं।

नायक एक- हम सिर्फ़ इतना कहेंगे कि हम घर वापस जाना चाहते है अतः हम आगे नहीं बढ़ेगे।...(पृ. 88)

सिकंदर और उसकी सेना की कष्ट सहिष्णुता उसके विलोचिस्तान के रेगिस्तान से होकर पर्शिया पहुँचने में प्रकट होती है। बैक्ट्रिया आते समय तो कंद मूल फल यहाँ तक कि पत्ते तक खाने की नौबत आ गई थी रेगिस्तान में तो वे सब एक-एक बूँद पानी का तरस गए। परन्तु बेबीलोन पहुँचकर वे अपनी सारी विपत्तियाँ भूल जाते है। वहाँ सामूहिक विवाह एवं भोज का आयोजन होता है और देश व जाति की सीमाएँ नष्ट हो जाती है- “सिकंदर ने एक विशाल भोज आयोजित किया जिसमें 9 ज़ार लोगों ने एक साथ भोजन किया। इस भोज में केवल यूनानी ही नहीं वरन उसके साम्राज्य के सभी जातियों के लोग शामिल थे, भोज के पश्चात उपस्थित लोगों ने एक साथ देवताओं को जल चढ़ाया जो एक धार्मिक कृत्य था। शांति के लिए वहाँ उपस्थित लोगों के देशों के आपसी सहयोग के लिए तथा संपूर्ण संसार के चिंतन सहयोग तथा सदभावना के सिकंदर की प्रार्थना के साथ-साथ समारोह का अंत हुआ।” (पृ. 93)

सिकंदर की मृत्यु के कुछ दिन पूर्व उसकी वाणी विलुप्त हो जाती है पर मस्तिष्क चेतन बना रहता है जिसके कारण अन्तर्मन में अन्तर्द्वन्द्व होता रहता है। लेखक ने तत्समय के उसके मनोभावों की चरित्रानुकूल व्यंजना की है। देवचक्र की छाया में मैंने अपना जीवन बिताया, अपने सारे शौर्य, क्रोध, अभिमान के बावजूद दयनीय होकर मैं मृत्यु से परास्त होने जा रहा हूँ। अकलीज, जिसकी नियति थी भावी जीअस बनने की, अंत में धूल चाटता है...और सिकंदर की आँखों पर अंधकारमयी रात्रि उतर आती है।

एक सशक्त भूमिका एवं उपसंहार के साथ सशक्त भाषा शैली के कारण उपन्यास अत्यन्त प्रभावशाली है जो अंत तक पाठक को बाँधे रहता है। एक पठनीय जीवनी उपन्यास।

 

पुस्तक : महारानी हासेपसुत (उपन्यास)
लेखक : सुधीर निगम
पृ. संख्या : 156
मूल्य : हार्ड बाउंड 200/-पेपर बैक 100/-
प्रकाशन : 2018, दिसम्बर
प्रकाशक : संवाद प्रकाशन, आई- 499 शास्त्री नगर मेरठ-250004

संवाद प्रकाशन मेरठ से प्रकाशित सुधीर निगम का दूसरा उपन्यास है, महारानी हासेपसुत। राज रानियों के ऐसे विचित्र नाम 5 ज़ार साल पहले मिस्त्र में प्रचलित थे। महारानी हासेपसुत आजसे साढ़े तीन हज़ार साल पहले मिस्र की स्वतंत्र शासिका थी। मिस्र के ब्रगाहों में रानी की ममी मिलने में बहुत कठिनाई हुई पर उसका इतिहास जानने के बाद पुरातत्ववेत्ताओं ने उसे संसार की प्रथम मान महिला घोषित किया। महारानी की इस ऐतिहासिक प्रसिद्धि ने लेखक को इस उपन्यास को लिखने के लिए प्रेरित किया और गहन शोध के पश्चात यह उपन्यास सामने आया।

प्रस्तुत उपन्यास सिर्फ़ महारानी की जीवन गाथा ही नहीं है यह मिस्र के प्राचीन इतिहास को, पिरामिडो के निर्माण की सूक्ष्म प्रक्रिया को, प्रभावशाली मृत व्यक्तियों की ममी में तब्दील किये जाने की विधि को, आम नागरिकों के जन जीवन को, युद्ध के जीवंत दृश्यों को तत्समय के कथा और काव्य साहित्य को प्रमुखता से प्रस्तुत करता है।

उपन्यास का प्रारंभ नील नदी की पूजा के सार्वजनिक उत्सव को जीवंत रूप में प्रस्तुत करने से होता है। उत्सव का प्रारम्भ संगीत और गायन से होता है। उस समय भी बाँसुरी वादन प्रचलित था। नील का उत्सव बहुरंगी है। झंडियों से सुसज्जित नौकाओं से देवमूर्ति को नदी पार स्थित दूसरे मंदिर में पहुँचाया जाता है। “मिस्रियों को अपनी सभ्यता पर अपनी परंपराओं पर गर्व है और वे मानते हैं कि संसार को सभ्यता और धर्म की सौगातें देने वाला उनका ही देश है। नावों में बैठे वे गाते हैं- शुरू हुई थी यहाँ सभ्यता/यहीं मिस्रियों ने पहली बार धरा की कोख में बीज डाला था/धर्म उगा था बीजों पर/देखा हमने सूरज की गरमी नरमी को/आभार अपोलो का जब हमने प्रकट किया/तभी शिल्पी ने जन्म लिया।”(पृ. 16)

हासेपसुत किशोरी ही थी कि महल में कठपुतली का तमाशा आयोजित होता है। खेल के माध्यम से महारानी के तीन पीढ़ी पूर्व मिस्र को विदेशियों द्वारा दो सौ वर्ष तक गुलाम रहने की कथा बताई जाती है। यही पर किशोरी हासेपसुत की पहली और अंतिम प्रेम कथा जन्म लेती है। इस प्रसंग में लेखक किशोर प्रेम की अभिव्यक्ति का रोचक वर्णन प्रस्तुत करता है “राजकुमारी की आँखें रागदीप्त हो उठी। दृष्टि की पिपासा किसी तरह निवृत्त नहीं हो पा रही थी। और होठों की पिपासा...उसका पूरा गात काँप उठा, शायद धड़क उठा। वह मंत्रविद्ध सी बढ़ी, स्वप्नचारी पैर उठाकर शय्या के पास घुटनों के बल बैठकर उसने अपने अनछुुए अनृप्त होंठ कलाकार के तृप्त होंठों पर रख दिए।”

कलाकार के प्रेम की दीवानी हासेपसुत कुछ समय पश्चात अपने पिता महाराज थुतमोस तृतीय के साथ युद्ध स्थल की ओर प्रयाण करती है। मार्ग में उसकी अनंत जिज्ञासाओं को शांत करते हुए पिता उसे मिस्र का इतिहास, पिरामिड निर्माण विधि, देवताओं की पूजा का रहस्य और युद्धों की अनिवार्यता बताता है। इसी युद्ध में हासेपसुत का पिता धोखे से मारा जाता है। उसे युद्ध से वितृष्णा हो जाती है और अपने 20 वर्ष के शासनकाल में ह कोई युद्ध नहीं लड़ती है। यद्यपि उस समय लूट के माल के लालच में पुरोहित अपने राजाओं को युद्ध के लिए भड़काते थे। हासेपसुत के शासिका बनने की प्रक्रिया में राजनीतिक दाँवपेंचों का लेखक ने बड़ी सूक्ष्मता से वर्णन किया है।

वह स्त्री सशक्तिकरण की प्रथम पुरोधा थी। राजमहल में उसके साथी और शासन के सहयोगी राजवंशी न होकर सामान्य युवतियाँ थीं। जहाँ अवसर मिला है लेखक ने स्त्रियों के शोषण से उपजी कुरीतियों पर चोट की है और इतिहास सम्मत ढंग से उनका निर्मूलन दिखाया है। इनमें सबसे निंदनीय प्रथा देवदासी की थी। शिक्षा और सामाजिक जागरूकता की अनिवार्यता को प्रमुखता से व्यक्त किया गया है। हासेपसुत अपने पिता से कहती है “मैं चाहूंगी कि मिस्र में शिक्षा का प्रसार हो। ऐसी शिक्षा नहीं जो उन्हें धर्मान्ध बनाए प्रत्युत ऐसी शिक्षा जो उन्हें उनके अधिकारों से परिचित कराए।” (पृ. 43)

महारानी का सौतेला भाई जब वयस्क हो गया तब राजनीति के अनुसार हासेपसुत को उससे शादी करना आवश्यक हो जाता है अन्यथा उसे सत्ताच्युत होना पड़ता। कृति में घटनाओं को ऐसा मोड़ दिया गया है कि- हासेपसुत को ज्ञात हो जाता है कि- वह नपुसंक है। यह ऐतिहासिक सत्य है जिसकी जानकारी महारानी को बड़े नाटकीय ढंग से मिलती है और वह उससे शादी कर लेती है। वह अंत तक अपने सौतेले भाई को अपने अँगूठे के नीचे रखती है। इस प्रसंग को इतने रोचक और रहस्यमय ढंग से वर्णित किया गया है कि पाठक भी दम साध कर पढ़ने के लिए बाध्य हो जाता है।

संसार का पहला चिड़ियाघर स्थापित करने का श्रेय भी महारानी हासेपसुत को ही है। वह अपनी सखीवत दासियों के साथ चिड़ियाघर का निरीक्षण करते हुए हर पशु पक्षी से वार्ता करती है। स्त्रियों का पशु प्रेम कोई नया नहीं है परन्तु कृति में उपन्यासकार इस पशु प्रेम की अभिव्यक्ति जिस ढंग से की है वह अवश्य नया है उदाहरण देखे- “शशक को देखकर वह नीचे बैठ गई। ’शशक, तुम कितने भोले हो।’ शशक ने कान फड़फड़ाए-अथार्त ठीक कहा।” फिर एक मृगी के पास गई। कुछ देर उसे देखती रही। कदाचित उसे अपने ऐडेक्स हिरन की याद आ रही थी जो अब मर चुका था। “ओह तुम्हारे नयन तो बड़े निर्दोष हैं

मृगी ने आँखें झपकाईं और अपना मुँह थोड़ा ऊँचा कर दिया।” (पृ. 100)

महारानी हासेपसुत का अंत बड़ा दुखद है। पुरातत्व वेत्ताओं के अनुसार वह कई व्याधियों से पीड़ित थी। उस समय की प्रचलित चिकित्सा झाड़-फूँक थी जिससे उसे घृणा थी। मृत्यु के बाद महारानी का शव गुप्त रूप से एक मंदिर में ले जाया जाता है और उसकी स्वनिर्मित समाधि के बजाय एक साधारण ब्र में दन कर दिया जाता है।

पूरे उपन्यास में घटनाओं का प्रवाह अत्यंत दुर्दम्य है। लेखक ने उसे तेज़ी से घटित होते घटना क्रम से और सुष्ठु भाषा से सँभाला है। पात्र एवं चरित्र उपन्यास को गति देने के साथ-साथ तत्कालीन सामाजिक, राजनैतिक, धार्मिक, परिवेश को अभिव्यक्त करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। देशकाल व वातावरण का सजीव चित्रण रोचकता के साथ जिज्ञासा को जन्म देता है। एक पठनीय उपन्यास।

समीक्षक- डॉ. रश्मिशील
3/8 टिकैत राय तालाब कालोनी
लखनऊ 226017
मो.-9235658688

0 टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

पुस्तक समीक्षा
बात-चीत
कहानी
व्यक्ति चित्र
स्मृति लेख
लोक कथा
हास्य-व्यंग्य आलेख-कहानी
सांस्कृतिक कथा
आलेख
अनूदित लोक कथा
विडियो
ऑडियो