डी एच लॉरेंस की विश्वविख्यात औपन्यासिक कृति : लेडी चैटरलीज़ लवर

01-02-2020

डी एच लॉरेंस की विश्वविख्यात औपन्यासिक कृति : लेडी चैटरलीज़ लवर

डॉ. एम. वेंकटेश्वर

अँग्रेज़ी के विश्व प्रसिद्ध उपन्यासकार डेविड हर्बर्ट लॉरेंस (D H Lawrence) का जन्म 1885 में इंग्लैंड के नॉटिंघम-शायर में हुआ था। वे एक खान मज़दूर पिता और मध्यवर्गीय माँ की पाँच संतानों में से एक थे। उनकी शिक्षा पहले नॉटिंघम हाईस्कूल में और फिर नॉटिंघम यूनिवर्सिटी कॉलेज में हुई। भावनात्मक रूप से वे अपनी माँ के अधिक निकट थे और उन्हीं के प्रभाव से उनमें साहित्य के प्रति अभिरुचि विकसित हुई। 1911 में उनका पहला उपन्यास ‘द व्हाइट पीकॉक‘ प्रकाशित हुआ। उनकी माँ की मृत्यु के कुछ ही सप्ताह पश्चात इसी वर्ष अस्वस्थता के कारण उन्हें स्कूल की अपनी अध्यापकीय नौकरी छोड़नी पड़ी। 1912 में वे अपने एक साथी शिक्षक की जर्मन पत्नी ‘फ्रेडा‘ के साथ जर्मनी भाग गए। 1914 में वापस इंग्लैंड लौटकर उन दोनों ने विधिवत विवाह कर लिया। लॉरेंस केवल अपने लेखन कार्य से आजीविका चलाने के प्रयत्न में लग गए। इस क्रम में उन्होंने अपने दो महत्त्वपूर्ण उपन्यासों, ‘ द रेन बो’ (1915), ‘सन्स एँड लवर्स ‘ और ‘विमेन इन लव‘ (1916) की रचना की। प्रथम विश्वयुद्ध के उपरांत संतोषप्रद जीवन की खोज में लॉरेंस अपने दार्शनिक विचारों के संग निकल पड़े। उन्हें पाश्चात्य संस्कृति और जीवन शैली के प्रति एक ऊब सी होने लगी थी। इस प्रतिरोधी मानसिकता के मर्म को समझने के लिए उन्होंने सिसली, श्रीलंका, ऑस्ट्रेलिया और न्यू मेक्सिको की यात्राएँ कीं। 1925 में वे इंग्लैंड लौटकर अपने अंतिम और जीवन के सबसे विवादास्पद उपन्यास ‘लेडी चैटरलीज़ लवर‘ की रचना में जुट गए। यह विश्व प्रसिद्ध उपन्यास अंतत: 1928 में प्रकाशित हुआ। प्रकाशित होते ही इस उपन्यास ने इंग्लैंड और अन्य सभी देशों में खलबली मचा दी। इसकी अंतर्वस्तु और कथ्य पर समाज के हर वर्ग से भीषण प्रहार हुए। इसे अनैतिक, अश्लील और असामाजिक घोषित कर इसे प्रतिबंधित कर दिया गया। किन्तु लॉरेंस को उनके संपूर्ण लेखन में यही उपन्यास सबसे प्रिय था। इस उपन्यास ने विवाह-संस्था को चुनौती देते हुए कई मूलभूत सवाल खड़े कर दिए। विशेषकर इंग्लैंड के अभिजात वर्ग में सनसनी फैल गई, क्योंकि इस उपन्यास की कथावस्तु इंग्लैंड के अभिजात वर्ग के वैवाहिक मूल्यों को ध्वस्त कर चुकी थी। दुर्भाग्य से सन् 1930 में मात्र 44 वर्ष की आयु में क्षयरोग से डी एच लॉरेंस की मृत्यु हो गई। 

‘लेडी चैटरलीज़ लवर‘ विश्व का ऐसा एक मात्र उपन्यास है जिसके तीन प्रारूप, लेखक द्वारा तैयार किए गए और इन तीनों प्रारूपों को प्रकाशित किया गया। ‘लेडी चैटरलीज़ लवर‘ उपन्यास का तीसरा और अंतिम प्रारूप, सबसे पहले 1928 में लेखक के जीवन काल में ही प्रकाशित हुआ। प्रथम प्रकाशन से उठे विवादों, अश्लीलता और अनैतिकता के आरोपों और इन सबके बीच क्षयरोग से डी एच लॉरेंस की मृत्यु के चौदह वर्ष बाद 1944 में इस उपन्यास का प्रथम प्रारूप प्रकाश में आया जिसे विधिवत प्रकाशित करने की आवश्यकता महसूस की गई, क्योंकि लॉरेंस की पत्नी फ्रेडा लॉरेंस और कई अन्य साहित्यकारों तथा आलोचकों की दृष्टि में यही इस उपन्यास का सही और श्रेष्ठतम प्रारूप है। इस प्रथम प्रारूप को साहित्य जगत में ‘द फ़र्स्ट लेडी चैटरलीज़ ‘ के नाम से जाना जाता है।लगभग पच्चीस वर्ष बाद सातवें दशक में, इस उपन्यास के दूसरे प्रारूप को भी प्रकाशित किया गया, जिसे ‘जॉन थॉमस एंड लेडी जेन ‘ या लेडी चैटरलीज़ लवर: द सेकेंड वर्जन ‘ के नाम से जाना जाता है। 

एक ही उपन्यास के तीन प्रारूपों का प्रभाव पाठकों पर अलग-अलग ढंग से पड़ा। हालाँकि कथानक और विषय वस्तु की दृष्टि से ये तीनों एक ही कथा के तीन अलग-अलग रूप हैं। आलोचकों के अनुसार डी एच लॉरेंस द्वारा अपने जीवन काल में प्रकाशित इस उपन्यास का तीसरा और अंतिम प्रारूप, कथानक के गठन, कसाव और लेखकीय शिल्प एवं चरित्र-चित्रण की दृष्टि से उपन्यास का श्रेष्ठतम रूप है। किन्तु यह प्रारूप अपनी मूल विषय वस्तु से थोड़ा भिन्न और पाठकों के अचेतन में व्याप्त कामेच्छाओं को चौंकाने वाली शैली में प्रस्तुत करता हुआ प्रतीत होता है। उपन्यास के दूसरे प्रारूप को पहले और तीसरे प्रारूपों के बीच की कड़ी के रूप में देखा जा सकता है। जहाँ पहला प्रारूप एक कृत्रिम संस्कृति के बीच प्रेम और यौन संबंध की सहज, स्वाभाविक और नैसर्गिक अभिव्यक्ति से जुड़ी जटिलताओं पर केन्द्रित है वहीं दूसरा प्रारूप मानवीय प्रेम संबंधों से जुड़े वर्ग-संघर्ष और तीसरा प्रारूप एक कृत्रिम संस्कृति के बीच दैहिक कामेच्छाओं की उन्मुक्त अभिव्यक्ति पर केन्द्रित है। इस आकलन से ऐसा प्रतीत होता है कि डी एच लॉरेंस ने भिन्न-भिन्न पाठक वर्ग के लिए भिन्न-भिन्न प्रारूपों में अपने उपन्यास को प्रस्तुत किया। ऐसा अनुमान है कि पहला प्रारूप सामान्य पाठकों के लिए और दूसरा तथा तीसरा प्रारूप दार्शनिकों, चिंतकों, साहित्यकारों और समालोचकों के लिए लिखा गया। 

यह स्वत: सिद्ध है कि ‘लेडी चैटरलीज़ लवर‘ उपन्यास बीसवीं सदी का एक चौंकाने वाला दांपत्य संबंध के सामाजिक और वैयक्तिक पक्ष से जुड़ी चुनौतियों का सामना करने वाला पहला उपन्यास है। यह बीसबीं शताब्दी के एक ब्रिटिश अभिजात परिवार की दंभपूर्ण वर्गचेतना को स्त्री के देहवादी दर्शन के आलोक में प्रस्तुत करता है। यह एक जटिल दांपत्य समस्या को प्रस्तुत करता है जो अभिजात वर्ग की सामाजिक और नैतिक मान्यताओं की नींव को हिलाकर रख देती है। दाम्पत्य जीवन की एक मनोवैज्ञानिक गुत्थी को सुलझाने और उसके समाधान के लिए लॉरेंस ने इस उपन्यास की रचना की। 

सतही तौर पर ‘लेडी चैटरलीज़ लवर‘ एक अपाहिज पति, उसकी ख़ूबसूरत पत्नी और उस पत्नी के प्रेमी की यौन कथा प्रतीत होती है किन्तु वास्तव में ये तीनों पात्र प्रतीक मात्र हैं। ‘सर-क्लिफ़र्ड चैटरली‘ एक पथरीली, मृतप्राय, अपाहिज, देहविहीन हो चली संस्कृति, उसकी पत्नी ‘कॉन्स्टेंस (लेडी चैटरली)‘ जीवन की निरंतरता और शाश्वतता तथा उसका प्रेमी ‘ओलीवर मैलर्स‘ - मनुष्य के नैसर्गिक और भौतिक स्वरूप का प्रतीक है। सर-क्लिफ़र्ड और कॉन्स्टेंस अभिजात वर्ग के दंपति हैं और मैलर्स, सर-क्लिफ़र्ड के एस्टेट का रखवाला है, सर-क्लिफ़र्ड के वन्य संपत्ति का प्रहरी है। सर-क्लिफ़र्ड, प्रथम विश्व युद्ध में अपने दोनों पैर खो बैठा है और उसके शरीर का निचला हिस्सा पूरी तरह निष्प्राण हो गया है। वह एक बेजान सा व्यक्ति है जो व्हील चेयर पर ही अपना जीवन गुज़ारता है। उसकी ख़ूबसूरत पत्नी कॉन्स्टेंस अपने अपाहिज पति क्लिफ़र्ड के प्रति पूरी तरह समर्पित है और वह उसकी सेवा में कोई कसर नहीं छोड़ती। क्लिफ़र्ड और कोनी (कॉन्स्टेंस) का वैवाहिक जीवन उन लोगों की अपार संपत्ति, अभिजात जीवन शैली और उनकी आलीशान कोठी जो ‘ रैग्बी‘ के नाम से मशहूर थी, में ही सिमटी रह जाती है। सर-क्लिफ़र्ड को पत्नी की ख़ूबसूरत देहयष्टि का आभास है और वह अपनी यौन तृष्णा के प्रति जागरूक है किन्तु वह अपने अवयवों की निष्क्रियता से उत्पन्न विवशता को स्वीकार करता है। इस समस्या से निदान पाने के लिए वह अपने भव्य शयन कक्ष में पलंग पर लेटे हुए या व्हील चेयर पर बैठकर अपना सारा समय साहित्य और संगीत का आनंद लेते हुए बिताता है। मिसेज़ बोल्ट नामक एक कर्तव्य परायण अधेड़ उम्र की कुटिल और चतुर स्वभाव की परिचारिका सर-क्लिफ़र्ड की देखरेख के लिए प्रतिपल मौजूद रहती है। मिसेज़ बोल्ट लेडी चैटरली (कॉन्स्टेंस) की सुंदर देह के प्रति एक ईर्ष्या भरी दृष्टि रखती है। इस उपन्यास के माध्यम से डी एच लॉरेंस मनुष्य के देह धर्म और उसकी आंतरिक प्रवृत्तियों का गहराई से अध्ययन करते हुए दिखाई देते हैं। यह उपन्यास मूलत: स्त्री की यौनेच्छाओं के संदर्भ में पुरुष देह की सार्थकता पर विचार करता है। स्त्री सौन्दर्य के प्रति लॉरेंस के विचार उपन्यास की नायिका कॉन्स्टेंस के माध्यम से व्यक्त हुए हैं। कॉन्स्टेंस के अनुसार स्त्री का सौन्दर्य केवल उसके बाहरी रूप या मुखमंडल ही में नहीं केन्द्रित रहता है बल्कि वास्तव में उसके आवरण में लिपटे और ढंके देह में समाया रहता है। स्त्री सौन्दर्य की अनुभूति उसके वस्त्रों के भीतर छिपे अवयवों और देहयष्टि से होती है। इसी दृष्टि से ग्रीक और रोमन (एफ़्रोडाइट और वीनस) सौन्दर्य की प्रतिमाओं को नग्न रूप में तराशा गया। कॉन्स्टेंस अपनी देह की सुंदरता के प्रति स्वयं मुग्ध थी किन्तु उसे अफ़सोस था कि उसका पति उसकी सुंदरता से विमुख और अनभिज्ञ है। वह अपने देह की मादक सुंदरता से क्लिफ़र्ड को सम्मोहित करने के लिए एक रात उसके सम्मुख निर्वस्त्र प्रकट होती है। वह पति के मुख से अपनी सम्मोहक देह की प्रशंसा सुनना चाहती थी जिससे आंशिक रूप से उसकी यौन तुष्टि मानसिक धरातल पर हो सके। किन्तु उसे अपने निर्वसन देह प्रदर्शन के लिए क्लिफ़र्ड से क्रोध भरी भर्त्सना मिलती है। क्लिफ़र्ड के इस संवेदनहीन नपुंसक नीरसता पर उसे खीझ होती है। वह कुंठित और अपमानित अवस्था में पति के शयन कक्ष से निकल आती है।उसे अपने सुंदर देह की निरर्थकता का बोध होने लगता है। यह बोध उसके लिए असहनीय और पीड़ादायक हो उठता है। वह उस यंत्रणा से मुक्त होना चाहती है। 

अपनी नपुंसक अवस्था के बावजूद सर-क्लिफ़र्ड के मन में वंश वृद्धि के लिए अपना एक उत्तराधिकारी प्राप्त करने की प्रबल आकांक्षा मौजूद थी। वह अपनी इच्छा को कॉन्स्टेंस के सम्मुख प्रकट करने के लिए उतावला रहता है। अंत में एक दिन वह अपनी भावना को व्यक्त कर देता है। वह कॉन्स्टेंस को किसी भी पुरुष से संसर्ग कर उसे एक वारिस देने की माँग कर बैठता है। कॉन्स्टेंस, क्लिफ़र्ड के इस मूर्खतापूर्ण प्रस्ताव को टाल देती है। 

कहानी के इस मोड़ पर कॉन्स्टेंस के जीवन में उथल-पुथल मचाने वाला पात्र ऑलीवर मैलर्स प्रवेश करता है। कॉन्स्टेंस का प्रथम परिचय मैलर्स से उन्हीं के जंगली इलाक़े में होता है। कॉन्स्टेंस, मैलर्स को अपनी झोपड़ी के पीछे अर्धनग्न अवस्था में स्नान करते हुए देखती है। वह छिपकर उसे देर तक निहारती है। मैलर्स का खुरदरा गठीला मांसल शरीर उसे मोहित कर लेता है। उसके तन और मन में कामुकता का भाव जाग उठता है। वह उस पुरुष के प्रति अनायास रूप से आकर्षित होती चली जाती है। मैलर्स के शरीर में जो खिंचाव था वह उससे बच नहीं पाती। मैलर्स भी लेडी चैटरली की सुंदरता से मोहित होकर अपना-आपा खो बैठता है और वह अपनी मालकिन को अपनी बाँहों में भरकर बेतहाशा प्यार करता है। कोनी कोई विरोध नहीं करती और वह अपने को उसके हवाले करती जाती है। दोनों में एक दूसरे के लिए तीव्र आकर्षण के साथ प्रेम का उन्माद फूट पड़ता है और वे दोनों एक दूसरे के लिए व्याकुल होने लगते हैं। अब लेडी चैटरली रोज़ किसी न किसी बहाने से ‘रैग्बी‘ से निकलकर मैलर्स की झोपड़ी में पहुँच जाती और स्वयं को मैलर्स को सौंप देती। इधर सर-क्लिफ़र्ड की देखभाल करने वाली मिसेज़ बोल्टन लेडी चैटरली पर नज़र रखने लगती है। 

मैलर्स लेडी चैटरली को पाकर उसके प्रति समर्पित हो जाता है। वह उससे प्रेम करने लगता है। दोनों एक दूसरे से प्रेम करने लगते हैं। दोनों के बीच अतृप्त प्रेम की प्यास बुझाने का कभी न ख़त्म होने वाला सिलसिला चल पड़ता है। वे दोनों एक दूसरे के लिए पूरी तरह समर्पित हो जाते हैं। वे अपने मिलन के क्षणों में उस वर्गभेद को भुला देते हैं जो उनके बीच दीवार बन सकती थी। 

समय के साथ साथ कोनी से अपने लिए एक वारिस प्राप्त करने की इच्छा क्लिफ़र्ड में बलवती होते जाती है। किन्तु क्लिफ़र्ड की शर्त थी कि उसका वारिस किसी संभ्रांत व्यक्ति के समागम से पैदा हो। कॉन्स्टेंस, क्लिफ़र्ड की उच्च वर्गीय वर्ग भेद की मानसिकता को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं थी। वह प्रगतिशील विचारों वाली उन्मुक्त जीवन जीने की अदम्य जिजीविषा से युक्त स्त्री थी, वह ब्रिटिश समाज में व्याप्त वर्ग भेद का खुलकर विरोध करने का साहस रखती थी, किन्तु इसके विपरीत क्लिफ़र्ड अपने उच्च संभ्रांत वर्ग की जीवन शैली के प्रति अत्यंत सजग था। कॉन्स्टेंस, अपनी बहन हिल्डा को अपने और मैलर्स के प्रेम संबंध के बारे में सब कुछ बता देती है। हिल्डा अपनी बहन के एक स्वस्थ पुरुष के साथ पनपते हुए प्रेम संबंध को जानकर प्रसन्न हो जाती है किन्तु उसे मैलर्स की निम्नवर्गीय आर्थिक और सामाजिक स्थिति खटकती है। जब कॉन्स्टेंस मैलर्स से गर्भ धारण करती है तो उसके लिए निर्णय का क्षण आ जाता है। वह अपने और मैलर्स के संबंध को क्लिफ़र्ड के सम्मुख प्रकट कर देना चाहती है। इसके लिए वह उचित अवसर की प्रतीक्षा में रहती है। 

हिल्डा के आग्रह पर कॉन्स्टेंस उसके संग अपने पिता के पास कुछ समय बिताने के लिए लंदन चली जाती है। लंदन रवाना होने से पहले वह पूरी रात मैलर्स के संग जंगल के वीराने में स्थित उसकी झोंपड़ी में बिताती है उसकी रैग्बी में कॉन्स्टेंस की अनुपस्थिति में मैलर्स अनेक मुसीबतों में घिर जाता है। उसके और लेडी चैटरली के अवैध संबंध की चर्चा क़स्बे के खान मज़दूरों के बीच सुनाई पड़ने लगती है। मैलर्स की पत्नी जो उससे बहुत समय पहले अलग हो चुकी थी, वह उस पर अन्य स्त्री से अवैध संबंध के मुद्दे पर मुक़दमा कर देती है। क्लिफ़र्ड मैलर्स के काम से असंतुष्ट होकर उसे अपने एस्टेट से निकाल बाहर कर देता है। मैलर्स उसी क़स्बे की कोयले की भट्टियों में आजीविका के लिए काम करने लगता है। 

मिसेज़ बोल्टन के पत्र द्वारा जब कॉन्स्टेंस को मैलर्स की ख़बर मिलती है तो वह क्लिफ़र्ड के पास ‘रैग्बी‘ लौट आती है। वह मैलर्स को ढूँढ़ते हुए क़स्बे के कोयले की भट्टियों में पहुँचती है और मैलर्स को दयनीय अवस्था में पाती है। वे दोनों अपने भविष्य के लिए चिंतित होने लगते हैं। कॉन्स्टेंस किसी भी स्थिति में मैलर्स का साथ नहीं छोड़ना चाहती थी। वह मैलर्स और उसके बच्चे के साथ एक सुखी जीवन की कल्पना करने लगी थी। किंतु यह उस क़स्बे में असम्भव था। मैलर्स इंग्लैंड छोड़कर केनेडा चले जाने का विचार व्यक्त करता है। 

कॉन्स्टेंस अपना निर्णय सुनाने के लिए रैग्बी पहुँचती है। वह क्लिफ़र्ड को अपने गर्भवती होने का समाचार देती है और साथ ही मैलर्स को उस बच्चे का पिता घोषित करती है। इस ख़बर को सुनकर क्लिफ़र्ड आगबबूला हो उठता है। वह मैलर्स और कॉन्स्टेंस के संबंध को स्वीकार नहीं कर सकता था। कॉन्स्टेंस, क्लिफ़र्ड से तलाक़ की माँग करती है जिससे कि मैलर्स के साथ विवाह करने के लिए क़ानूनी तौर पर उसका रास्ता सुगम हो जाता। लेकिन क्लिफ़र्ड साफ़ शब्दोँ में तलाक़ देने से इनकार कर देता है। लेडी चैटरली सर क्लिफ़र्ड को अलविदा कहकर हमेशा के लिए रैग्बी और पति क्लिफ़र्ड को छोड़कर चली जाती है। उपन्यास का अंतिम संस्करण जो मूल संस्कारण के रूप में प्रचलित है उसके अनुसार –

रैग्बी छोड़कर कॉन्स्टेंस हिल्डा के साथ लंदन चली जाती है और वहाँ से वह स्कॉटलैंड जाने का मन बना लेती है। मैलर्स भी लंदन के पास के एक गाँव के फ़ार्म हाउस में नौकरी करने लगता है। कॉन्स्टेंस और मैलर्स के बीच पत्र व्यवहार चलता है। तलाक़ के मुक़दमे में मैलर्स की पत्नी के हाज़िर न होने के कारण अदालत एक तरफ़ा फ़ैसला सुनाकर तलाक़ की मंजूरी दे देती है जिससे मैलर्स अपने पूर्व-विवाह के बंधन से मुक्त हो जाता है। वह कॉन्स्टेंस और अपने बच्चे के साथ एक नए जीवन को आरंभ करने के सपनों में डूबा रहता है। मैलर्स के पत्रों में कॉन्स्टेंस के प्रति प्यार की जानी-पहचानी ऐसी भावुकता होती थी जिसे पढ़कर वह कल्पनाओं में खोकर भविष्य के सुखद सपनों को देखा करती थी। आगे आने वाला समय उनके लिए संपूर्ण आज़ादी के साथ मधुर मिलन का संदेश लेकर आने वाला था। क्लिफ़र्ड ने वही किया जिसकी कॉन्स्टेंस को आशा थी। वह तलाक़ के मामले को अदालत में ले जाने के बदले ख़ामोश हो जाना चाहता था। उसकी ख़ामोशी ही उसकी तरफ़ से तलाक़ का संदेश था। धीरे-धीरे मैलर्स और कॉन्स्टेंस, दोनों के रास्ते की हर रुकावट दूर हो रही थी। दोनों को उस वक़्त का इंतज़ार था जब वह समाज के सामने पति-पत्नी का दर्जा पा लेंगे और वे अपने बच्चे के साथ सुखी परिवार बसा लेंगे। 

उपन्यास के प्रथम संस्करण में अंत अधूरा रह गया है। उपन्यास का अंत वहीं हो जाता है जब कॉन्स्टेंस क्लिफ़र्ड से मैलर्स से अपने संबंधों को उजागर करती है और उसके साथ विवाह करने का अपना निर्णय सुनाकर मैलर्स के बच्चे की माँ बनने की ख़बर उसे देती है। क्लिफ़र्ड आगबबूला हो उठता है। कॉन्स्टेंस उसी क्षण क्लिफ़र्ड की कोठी ‘रैग्बी‘ को छोड़कर चली जाती है अपनी नई दुनिया बसाने के लिए। 

डी एच लॉरेंस ने इस उपन्यास में प्रेम को प्राप्त करने के लिए काम अर्थात देह को आधार बनाया है वह भी जो किसी सामाजिक नीति-नियमों को स्वीकार नहीं करता। देह मिलन में आभिजात्य और अनभिजात्य का अंतर मिट जाता है। कॉन्स्टेंस, जो संभ्रांत समाज के अपंग पति की विवाहित पत्नी है वह जंगल की चौकीदारी करने वाले बलिष्ठ पुरुष के पौरुष की आग में पिघल जाती है। उसे मैलर्स के संग उन्मत्त काम क्रीड़ाओं में स्वर्गिक आनंद की अनुभूति होती है, जिसके लिए वह स्वयं को निछावर कर देती है। वह अपने अनगढ़ असभ्य किन्तु पौरुष से परिपूर्ण प्रेमी की उद्दाम काम क्रीड़ाओं का आनंद लेने के लिए कभी अँधेरी रात में तो कभी चाँदनी रातों में अपनी कोठी से छिपकर निकलकर मैलर्स की झोपड़ी में पहुँच जाती है और चरम सुख का आस्वादन करती है, साथ ही अपने प्रियतम को भी तृप्त करती है। कामोन्माद के इन दृश्यों का वर्णन डी एच लॉरेंस की रचनात्मकता को एक नई ऊँचाई पर ले जाता है। बीसवीं शताब्दी के इंग्लैंड का आभिजात्य वर्ग ऐसे कामोत्तेजक विवाहेतर संबंधों के वर्णन की अनुमति किसी भी लेखक को नहीं प्रदान कर सकता था। इसीलिए इस उपन्यास को इंग्लैंड में इसके रचना काल में मान्यता नहीं मिली। लॉरेंस के कॉन्स्टेंस (लेडी चैटरली) और मैलर्स के दैहिक मिलन के चित्र इस उपन्यास को अनूठा बनाते हैं। लॉरेंस जिस कौशल के साथ कॉन्स्टेंस को प्राप्त अनिर्वचनीय आत्मिक आनंद का अनुभव पाठकों को कराते हैं वह विलक्षण और वर्णनातीत है। डी एच लॉरेंस ने इस वर्णन में विश्व के महान से महान रचनाकारों को पीछे छोड़ दिया है। ब्रिटिश समाज के स्थापित नैतिक और आभिजात्य-संस्कृति के प्रति प्रदर्शित असामाजिक आपत्तिजनक विवाहेतर काम संबंधों के उन्मुक्त चित्रण के कारण यह उपन्यास इंग्लैंड के साथ साथ विश्व के अन्य देशों में भी पचास के दशक तक प्रतिबंधित रहा। 

देहविहीन पति क्लिफ़र्ड के साथ कॉन्स्टेंस का दांपत्य जीवन नारकीय हो जाता है जब कि दूसरी ओर उसे वही दांपत्य सुख मैलर्स से प्राप्त होता है। देहविहीन क्लिफ़र्ड के साथ जीना उसके लिए किसी यातना से कम नहीं था। क्लिफ़र्ड के पास अभिजात अहं और अपाहिज जीवन को जीने की ज़िद के सिवाय कुछ भी न था। कॉन्स्टेंस अपने प्रेमी मैलर्स का स्पर्श पाकर जीवंत और परिपूर्णता महसूस करने लगती है। मैलर्स भले ही एक चौकीदार था, निम्न वर्ग का पुरुष था किन्तु उसके संसर्ग में वह परिपूर्ण स्त्री होने का अहसास करती है। दोनों के देह मिलन के परिणामस्वरूप कॉन्स्टेंस गर्भवती होती है। कॉन्स्टेंस इस मातृत्व से प्राप्त परम सुख की कल्पना से अभिभूत हो जाती है। स्त्री के लिए मातृत्व से बड़ा सुख और स्त्रीत्व की परिपूर्णता को लॉरेंस ने कॉन्स्टेंस के जीवन की रिक्तता को मैलर्स द्वारा पूर्ण करते हुए दर्शाया है। मातृत्व, चाहे वह किसी भी रूप में प्रकट हो, स्त्री के लिए वरेण्य है। यही लॉरेंस की स्थापना है। इस विचार से रूढ़िवादी समाज भले ही सहमत न हो किन्तु लॉरेंस को इसकी परवाह नहीं थी। 

डी एच लॉरेंस ने प्रस्तुत उपन्यास में क्लिफ़र्ड के माध्यम से जिस देहविहीन, असंवेदनशील समाज की कल्पना की है, वह समाज आज भी मौजूद है। 1925 में वह समाज पश्चिम तक ही सीमित था किन्तु आज यह समाज एक वैश्विक यथार्थ बन चुका है। इस दृष्टि से ‘लेडी चैटरलीज़ लवर‘ का महत्त्व और इसके प्रति संवेदनशीलता हर वर्ग और हर समाज के पाठकों में बढ़ने लगती है। उपन्यास के अंतिम अध्यायों में ‘डंकन’ नामक पात्र से वे कहलाते हैं कि “इसे हम स्वार्थ नहीं कह सकते, क्योंकि स्वार्थ भावना के साथ कहीं-कहीं एक संवेग जुड़ा रहता है। किन्तु अहंवाद एक छोटी सी लेकिन अपने आप में संपूर्ण और स्वचालित भाव है। अपने इस आधुनिक अहंवाद के कारण हम एक दूसरे की आँखों में धूल के कणों की तरह हैं, और हर वह चीज़ जो हमारे ‘मैं‘ से अलग है, हमारे लिए एक अनचाहे बोझ की तरह है, मैं, मैं और सिर्फ़ मैं।“ 

इसी तरह वे आगे की कुछ पंक्तियों में कहते हैं – “इच्छाओं और कामनाओं का प्रवाह ही जीवन है। यह प्रवाह ही मनुष्यों को एक दूसरे से जोड़ता है और राष्ट्रों को भी। स्वतन्त्रता और प्रजातन्त्र की परिकल्पना मनुष्य की इन्हीं इच्छाओं और कामनाओं का एक प्रबल प्रवाह थी, लेकिन अब मानो यह प्रवाह रुक सा गया है।“ 

डी एच लॉरेंस ने ‘लेडी चैटरलीज़ लवर‘ उपन्यास के माध्यम से देह विहीन संस्कृति के मर्म को आधुनिक समाज के सम्मुख उद्घाटित किया है। इस संबंध में लॉरेंस के दृष्टिकोण को समझने के लिए इस उपन्यास को पढ़ना आवश्यक है। यह निर्विवाद सत्य है कि कई अनिवार्य तत्वों के मेल से ही एक संपूर्ण मनुष्य का निर्माण होता है, जिसमें देह, हृदय, मस्तिष्क, आत्मा और यौन ऊर्जा जैसे तत्व शामिल रहते हैं। लेकिन जब कोई सभ्यता, धर्म या विचारधारा इनमें से कुछ तत्वों को महत्त्वहीन मानकर उनकी अवहेलना करने लगे तो मनुष्य का प्राकृतिक संतुलन बिगड़ने लगता है, और एक विकृत समाज का रूप प्रकट होता है। 

पश्चिम की आधुनिक सभ्यता, बीसवीं और इक्कीसवीं सदी की सभ्यता, देह, हृदय और आत्मा की अवहेलना करके केवल मस्तिष्क और यौन ऊर्जा के विकास पर बल देती रही है। बौद्धिकता को देह, भावनाओं और आध्यात्मिकता से श्रेष्ठतर मान लिया गया। परिणाम यह हुआ है कि मनुष्य अपनी देह और हृदय से कटकर, अपने प्राकृतिक और आध्यात्मिक सूत्रों से टूटकर, मात्र एक रोबो बनकर रह गया है। विश्व में आज भारत ही एकमात्र ऐसी सभ्यता और संस्कृति है जो कि इस अतिबौद्धिक, कृत्रिम सभ्यता का तर्कपूर्ण और प्रभावी ढंग से विरोध करने की क्षमता रखती है। दरअसल दुनिया के हर महान साहित्यकार ने मनुष्य को अपने परिवेश और प्रकृति से जोड़ने का प्रयास किया है। सिर्फ़ मस्तिष्क का विकास न केवल अपने आप में अपूर्ण और अविकसित है बल्कि यह हमें एक भयंकर और वीभत्स देह-विहीन सभ्यता की ओर ले जा सकता है। 

‘लेडी चैटरलीज़ लवर‘ उपन्यास की रचना प्रक्रिया में लॉरेंस की पत्नी फ्रेडा लॉरेंस उसके साथ घनिष्ठ रूप से जुड़ी थी। फ्रेडा लॉरेंस ने इस उपन्यास के लेखन के संबंध में अपने विचारों को व्यक्त किया है। इस उपन्यास की पृष्ठभूमि में इंग्लैंड के वैवाहिक एवं सामाजिक मूल्यों एवं परंपराओं के प्रति अँग्रेज़ी समाज की गहन निष्ठा को पुष्ट किया गया है। डी एच लॉरेंस ने इस उपन्यास की रचना एक ईमानदार और प्रतिबद्ध अँग्रेज़ की भाँति की है। फ्रेडा लॉरेंस के शब्दों में “~एक न्यू इंग्लैंडर ही इस तरह का उपन्यास लिख सकता था। अन्य देशों के समाजों में भी विवाह होते हैं, लेकिन यहाँ इंग्लैंड में होमर के कल्पनालोक की शुद्धता और निष्ठा आज भी क़ायम है। फ़्रांसीसियों में गुप्त प्रेम संबंधों और अमरीकियों में पल में ब्याह और पल में तलाक़ का प्रचलन है, किन्तु अँग्रेज़ों के लिए विवाह का एक विशिष्ट अर्थ होता है। यह परस्पर हितों, एक-दूसरे के साथ सहयोग या मात्र बच्चों से जुड़ा हुआ संबंध नहीं होता, यह एक ईश्वरीय संबंध होता है। इंग्लैंड की महानता वैवाहिक संबंधों में इसकी गहरी निष्ठा के साथ जुड़ी हुई है और यह निष्ठा इसके शुद्धतावाद का ही एक रूप है।“ डी एच लॉरेंस का दृढ़ विश्वास था कि हमारी सभी भावनाएँ हमारी देह से जुड़ी होती हैं। ‘लेडी चैटरलीज़ लवर’ उपन्यास का केंद्रीय भाव यही है। 

‘लेडी चैटरलीज़ लवर‘ का फ़िल्मी रूपान्तरण : 

विश्व साहित्य की अमर कृतियों को फ़िल्म के रूप में निर्मित करने की विशेष संस्कृति हॉलीवुड के निर्माता –निर्देशकों की रही है। ब्रिटिश संभ्रांत वर्ग के तथाकथित नैतिक मूल्यों को चुनौती देने वाले इस क्रांतिकारी उपन्यास को फ़िल्मी परदे पर प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करने के लिए हॉलीवुड के मशहूर निर्माता निर्देशकों ने पिछली सदी के पचास के दशक से प्रयास शुरू कर दिए। ‘लेडी चैटरलीज़ लवर‘ पर पहली बार सन् 1955 में अमेरिका में फ़िल्म बनी जो अमेरिका में प्रारम्भ में प्रतिबंधित रही परंतु 1959 में सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर इसे प्रदर्शन के लिए रिलीज़ कर दिया गया। इस उपन्यास पर आधारित हॉलीवुड में निर्मित फिल्मों में दो फ़िल्में महत्त्वपूर्ण है। सन् 1981 में जस्ट जेकिन द्वारा निर्देशित और मेनहेम गोलान व योराम ग्लोबस द्वारा निर्मित ‘लेडी चैटरलीज़ लवर‘ जिसमें सिल्विया क्रिस्टेल (लेडी कोन्स्टेंस चैटरली), निकोलस क्ले (ओलीवर मेलर्स) और शेन ब्रियान्ट (सर-क्लिफ़र्ड चैटरली) ने मुख्य भूमिकाएँ निभाईं। यह फ़िल्म पूरी तरह उपन्यास के कथानक को सम्पूर्ण रूप में चित्रित करती है। फ़िल्म में लेडी चैटरली की कहानी का अंत उपन्यास के अंत के अनुरूप ही प्रस्तुत किया गया है। 

इस उपन्यास पर दूसरी फ़िल्म सन् 2015 में इंग्लैंड में जेड मार्क्यूरियो के निर्देशन में सेरेना कलेन द्वारा निर्मित हुई। इसमें लेडी चैटरली की भूमिका में हॉलिडे ग्रेंजर, अपंग सर-क्लिफ़र्ड की भूमिका में जेम्स नॉर्टन और मेलर्स के पात्र को रिचर्ड मेडेन ने फ़िल्म के परदे पर साकार किया। उपर्युक्त दोनों ही फ़िल्में उपन्यास में वर्णित इंग्लैंड के क़्स्बाई स्थानीय परिवेश को वास्तविक रूपों में चित्रित करने में सफल हुए हैं। इंग्लैंड की बीसवीं सदी के अभिजात वर्ग की पारंपरिक ऐशो-आराम की जीवन शैली इन फिल्मों में आकर्षक दिखाई देती है। सर-क्लिफ़र्ड की कोठी ‘रैग्बी‘ के भीतर की दुनिया लेडी चैर्टली के लिए दांपत्य सुख के अभाव में जो दंश उतप्न्न करता है उसकी संवेदनशील दृश्यात्मकता उपन्यास को जीवंत कर देती है। 

‘लेडी चैटरलीज़ लवर’ उपन्यास को सन् 1993 में इंग्लैंड की लंदन फ़िल्म कंपनी ने 55 मिनटों के चार धारावाहिकों में बी बी सी के लिए निर्मित किया। इस धारावाहिक को विश्व भर के दर्शकों ने इस उपन्यास पर निर्मित सभी फ़िल्मी रूपांतरणों में सबसे अधिक लोकप्रिय तथा प्रभावशाली स्वीकार किया है। इसे धारावाहिक स्वरूप प्रदान करने का दायित्व इंग्लैंड के टी वी जगत के प्रख्यात निर्माताओं की एक टीम ने स्वीकार किया जिसके सदस्य रॉबर्ट हेगिंग, बेरी हेनसन, जोहान एलियाश और माइकेल हेगिंग थे। इस धारावाहिक का कुशल निर्देशन केन रसेल ने किया। सम्पूर्ण उपन्यास धारावाहिक की चार कड़ियों में समेट लिया गया है। इसमें तीव्र वेग से उपन्यास की कथा उद्घाटित होती है। पहले ही दृश्य से कथा वस्तु दर्शकों के सम्मुख उद्घाटित होती जाती है। इस धारावाहिक फ़िल्म को रोचक, रोमांचक और कौतूहलपूर्ण बनाने में कलाकारों का अभिनय उल्लेखनीय है। लेडी चैटरली की ख़ूबसूरती को फ़िल्म में जीवंत करती हुई अभिनेत्री जोली रिचर्डसन और ओलीवर मैलर्स के पात्र में शान बीन के साथ क्लिफ़र्ड के पात्र को जेम्स विल्बी ने प्रशंसनीय ढंग से प्रस्तुत किया है। मैलर्स और कोन्स्टेंस के शारीरिक मिलन के शब्द चित्रों का प्रभावोत्पादक दृश्यांकन इस फ़िल्म को अनुभव के यथार्थ के साथ जोड़ता है। कोन्स्टेंस और क्लिफ़र्ड के संवादों का प्रभाव फ़िल्म में अधिक विचारोत्तेजक बन पड़ा है। कुछ आलोचकों ने लेडी चैटरलीज़ लवर उपन्यास और उस पर बनी फिल्मों को अश्लील फ़िल्मों (पोर्न) की श्रेणी में वर्गीकृत करने का असफल प्रयास किया। किन्तु यह उपन्यास अपने दौर के सामाजिक और वैयक्तिक मूल्यों एवं मान्यताओं का विश्लेषण दाम्पत्य संबंध से जुड़े नैतिकता के प्रश्नों के परिप्रेक्ष्य में करता है। इस धारावाहिक में कहानी का अंत भिन्न है। इसमें लेडी चैटरली अंत में सर-क्लिफ़र्ड के संग अपने वैवाहिक संबंध को ख़त्म कर उसे अलविदा कहकर ‘ रैग्बी हॉल‘ से निकलते समय उसे मैलर्स का पत्र प्राप्त होता है जिसमें वह हमेशा के लिए इंग्लैंड छोड़कर केनेडा के लिए रवाना होने की सूचना देता है। पत्र को पढ़कर कोन्स्टेंस तुरंत अपनी बहन हिल्डा के संग साउथ हेम्पटन बन्दरगाह के लिए निकल पड़ती है। मैलर्स और लेडी चैटरली का मिलन केनेडा के लिए रवाना होते हुए जहाज़ पर हो जाता है। धारावाहिक में कहानी का अंत निष्कर्षात्मक कर दिया गया है। अस्सी के दशक से भारत में यह उपन्यास पाठकों के लिए उपलब्ध होने लगा। लेडी चैटरलीज़ लवर फ़िल्म भारत में प्रदर्शित नहीं हुई। इस उपन्यास पर अनेक परिवर्तन और संशोधन के उपरांत भारत में कन्नड़ और मलयालम भाषाओं में इस उपन्यास पर फ़िल्में निर्मित हुईं। इतालवी, फ़्रेंच और फिलिपिनो भाषाओं में भी यह उपन्यास फ़िल्म के माध्यम से चर्चित हुआ।

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