चोर जेब

शेष अमित

पतलून के ऊपरी हिस्से के अंदर दाहिने,
एक जेब है सुषुप्त-
कभी टिकट जेब था,
अब रहते हैं मुड़े-तुड़े नोट कुछ,
या गोलाई अक्षरों में लिखा
एक प्रेम-पत्र,
या माँ की दी भभूत की एक पुड़िया,
जो सिर्फ धूप बत्ती की राख नहीं,
एक हौसला जो दुबका है अंदर,
आँखों से परे, कतरों से दूर,
नापता है मन उसका आयतन.
और बुढ़ाते विश्वास को एक लाठी,
अपने-अपने चोर जेब के साथ,
आँखों में आँखें डाले एक दूसरे के-
चल रहे,बढ़ रहे, हँस रहे-
अगोचर भय के साथ-
निर्वाक्...

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