आज़ादी अभी अधूरी है

01-02-2021

आज़ादी अभी अधूरी है

कविता झा

गणतंत्र का दिवस मना ले, पूर्ण स्वतंत्रता अभी बाक़ी है।
‘एक भारत श्रेष्ठ भारत’ का सपना सच होना अभी बाक़ी है॥
 
भूख से व्याकुल बच्चे फुटपाथों पे आँधी-बारिश सहते हैं।
उनसे पूछो गणतंत्र का मतलब क्या वो ख़ाक समझते हैं॥
 
दिन रात मज़दूरी में लगा वो किसान ख़ाली पेट सोता हैं।
क्या गणतंत्र का ख़्याल उसके मस्तिष्क में कभी भी आता हैं॥
 
सत्ता के मद में चूर दूसरों के घरों को जो बेपरवाह जलाते हैं।
क्या गणतंत्र का अभिप्राय अपने हिसाब से वो नहीं लगाते हैं॥
 
जाति के नाम पर, मंदिर- मस्जिद के नाम पर गला काटते हैं।
उनकी अज्ञानता में अभी भी दूसरों की स्वतंत्रता बाक़ी हैं॥
 
भूखों को गोली, ग़रीबों को फ़रेबी, नंगों को कफ़न पहनाते हैं।
शहीदों की भूमि पे शहीदों के कफ़न का ही मोल लगाते हैं॥
 
नारी का सम्मान बीच बाज़ार नीलाम करने की प्रथा चलाते हैं।
उनकी आज़ादी, उनका अस्तित्व तक तो कुचल कर मिटाते हैं॥
 
सब अर्पित कर, रक्त बहा भारत की पावन धरा को जो सींचते हैं।
उन्हीं से उनके बलिदानों की क़ीमत क्या लगाएँ, पूछी जाती है॥
 
इंसान बिकता कोड़ियों के भाव, ईमान की बिक्री सरे आम होती है।
तन-मन से तो दास हैं यहाँ सब कोई, आज़ादी फिर कैसे पूरी है॥
 
रे! जागो अब गहरी नींद से, आवाज़ अपने हक़ के लिए उठानी है।
भारत माता की हर संतान की सुख-समृद्धि परिपूर्ण करवानी है।
 
गौरवशाली वसुधा को कर्तव्यों से अलंकृत कर फिर सजाना है।
सत्य अहिंसा ईमानदारी के गुल से गुलशन को महकाना है॥
 
तभी सवतंत्रता के अर्थ की वास्तविकता  में अनुभूति होती है।
जब हर वर्ग, हर तबक़े, हर जाति के लोग यथार्थता से जीते हैं॥


 

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