विभिन्न कालखंडों में नारी और सामाजिक दृष्टिकोण

01-07-2024

विभिन्न कालखंडों में नारी और सामाजिक दृष्टिकोण

अरविंद ‘कुमारसंभव’ (अंक: 256, जुलाई प्रथम, 2024 में प्रकाशित)

 

सृष्टि में मानव जीवन का यानी कि स्त्री और पुरुष का बराबर का महत्त्व है जैविकीय, सामाजिक, शारीरिक और धार्मिक रूप से भी। सृष्टि के प्रारंभ में भी माता अदिति और उसके बाद शर्मिष्ठा और देवयानी, विनिता, संध्या आदि का महत्त्व उस दौर के पुरुषों, देवताओं और ऋषियों से अधिक था। यह हम प्राचीन शास्त्र पढ़ कर जान सकते हैं। गार्गी, अनुसूईया, लोपामुद्रा, मैत्रेयी वैदिक ऋचाओं की रचनाकार रही हैं। लेकिन उत्तर वैदिक काल आते आते विशेषकर त्रेता-द्वापर के अंतिम चरण में यह स्थिति पलटने लगी और वहाँ हम भीष्म द्वारा जबरन राज कन्याओं का हरण, द्रोपदी प्रकरण, परशुराम माता रेणुका प्रसंग, विभिन्न ऋषियों द्वारा विवाह के लिये जबरन राज कन्याओं की माँग करना (कान्यकुब्ज प्रसंग), अहिल्या प्रसंग, नरकासुर द्वारा सोलह हज़ार कन्याओं को क़ैद, सुग्रीव पत्नी तारा आदि घटनाओं को देखते हैं जहाँ नारी को निजी वस्तु मान लिया गया था। हमें श्रीराम के कार्यकाल में शूर्पणखा और सीता के साथ हुए अन्याय को भी नहीं भूलना चाहिए। मध्य काल आते-आते यह सिलसिला बढ़ता गया जिसकी पराकाष्ठा मुग़ल-राजपूत काल में हुई जहाँ मुग़ल राजकुमारियों को विवाह से वंचित कर दिया गया था और राजपूत राज कन्याओं का विवाह उनकी बग़ैर मर्ज़ी के मुग़ल बादशाहों से कराया जाने लगा या फिर उन्हें चौसर का मोहरा बना कर ज़हर पीने को मजबूर कर दिया गया। साथ ही सती प्रथा को एक अनिवार्य नियम बना दिया गया। संयोगिता, कृष्णा कुमारी हरकू बाई, रोशनारा, जहाँआरा आदि का इतिहास हम देख सकते हैं। हालाँकि उसी कालखंड में या उसके तुरंत बाद के ब्रिटिश काल में रज़िया सुल्तान, नूरजहाँ, दुर्गावती, चाँद बीबी, अहिल्या बाई होलकर, लक्ष्मी बाई, रानी गाइदिनल्यू, बेगम ज़ीनत महल जैसी स्वाधीन तथा आत्मसम्मानी महिलाएँ भी थीं। कश्मीर में प्रसिद्ध कवयित्री ललद्यद शैव अध्यात्मिकता का प्रकाश कर रही थी। निःसन्देह बड़े लोगों का व्यवहार आम लोग भी अपनाते हैं तो फिर जनता भी वैसी ही हो गयी। हद तो तब हो गयी जब गुप्त काल में पुराणों, स्मृतियों को तब के चलन के मुताबिक़ संशोधित किया जाने लगा और कुरीतियों को लिपिबद्ध करके उन्हें नियम के रूप में मान्य घोषित कर दिया गया। मनु स्मृति जैसा उच्च कोटि का ग्रंथ इसी संशोधनवाद की भेंट चढ़ कर विकृत कर दिया गया। जहाँ दक्षिणी एशिया में यह सब कुछ हो रहा था वहीं पश्चिमी एशिया और अरब में महिलाओं की स्थिति इस्लाम के नाम पर और भी अधिक ख़राब की जाने लगी। तीन तलाक़, हलाला इसी के संकेत हैं। 

इनके ठीक विपरीत उस दौरान से आज तक पश्चिमी देशों में जिसे यूरोप कहते हैं, वहाँ महिलाओं के लिए नित्य नये दरवाज़े खोले जाने लगे। 

सारांश यह है कि महिलाओं का महत्त्व भारतीय सनातन पद्धति में कभी कम न था। केवल सामाजिक, धार्मिक कलेवर के बदलने से स्थिति बदली थी। क्या हम मंडन मिश्र की पत्नी का आदि शंकराचार्य के साथ हुआ शास्त्रार्थ भूल सकते हैं। अब सरकार, समाज, न्यायपालिका फिर से महिलाओं के सम्मान की अक्षुण्णता के प्रति जागरूक हुए हैं और बहुत शीघ्र परिस्थितियों में परिवर्तन देखने को मिलेगा। भारत के आर्थिक, सामाजिक, प्रशासनिक, राजनैतिक परिवेश में यह सहज परिवर्तन सभी को दृष्टिगोचर है। अरुणा आसफ अली, सरोजनी नायडू, ममता, जयललिता, मायावती, वसुंधरा राजे, इंदिरा गाँधी, महादेवी वर्मा, रुक्मिणी अरुण्डलै, दमयन्ती बंडोदकर, प्रतिभा पाटिल, सिरिमाओ बंदारनायके, बेनज़ीर भुट्टो शेख़ हसीना, लता मंगेशकर यूँ ही तो आगे नहीं बढ़ गयी थीं। साहित्य में एक से बढ़कर एक नामवर महिला साहित्यकारों ने माँ सरस्वती की वाणी और लेखनी को विश्वव्यापी प्रसार दिया। सभी का नाम लिखने से आलेख लंबा हो जायेगा। उन सब की क़ाबिलियत को इसी तथाकथित दोषी और बदनाम पुरुष समाज ने सिर आँखों पर लगाया है। पाँच हज़ार साल की विकृतियों को ठीक करने में कुछ समय तो लगेगा ही न।

पाश्चात्य तर्ज़ पर महिला दिवस, फ़ादर्स डे, मदर्स डे किसी एक दिन मनाना और अच्छी-अच्छी बातें करना तो ठीक है पर हमारे यहाँ तो माँ दुर्गा तो साल में 18 दिन पूजी जाती हैं, माँ सरस्वती की अर्चना नित्य सुबह समवेत स्वरों में स्कूलों में होती है, माँ लक्ष्मी के स्मरण में तो विश्व का सबसे बड़ा त्योहार ही मनाया जाता है। बग़ैर मातृ देवी जननी वंदना के तो न रावण को मुक्ति थी और न राम को विजय। महाभारत युद्ध में तो स्वयं श्री कृष्ण ने युद्ध भूमि में अर्जुन से देवी वंदना करवायी थी। क्या नारायण को लक्ष्मी, कृष्ण को राधा, शिव को उमा और ब्रह्मा को गायत्री के बग़ैर पूजने की कोई हिमाक़त कर सकता है। तो यह है हमारी संस्कृति। प्रगतिवादी लोग भले ही नारी मुक्ति आंदोलन चलायें। भारतीय संस्कृति में नारी मुक्त भी है, स्वतंत्र भी, मज़बूत भी, बलशाली भी। और यह कथित मुक्ति उस नारी को अपने परिवार, समाज और धर्म से नहीं चाहिए अपितु पुरुष लोगों की कुमान्यताओं और कुसंस्कारों से चाहिए जो उनमें सैंकड़ों वर्षों से अपनी भटकाऊ सामाजिक परंपरा से मिलते रहे हैं और जिनमें वे स्वयं भी हर बार कुछ न कुछ जोड़ते रहे हैं। निःसंदेह ऐसे कुसंस्कारी भी अब घटते जा रहे हैं अन्य सभी स्त्री उत्पीड़न के क्षेत्र में। बस केवल यौन उत्पीड़न के क्षेत्र को छोड़ कर जिसके लिए बहुत से फ़ैक्टर ज़िम्मेदार हैं केवल समाज और धर्म नहीं। 

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