वसंत पंचमी: सरस्वती तत्त्व के जागरण का पर्व

01-02-2026

वसंत पंचमी: सरस्वती तत्त्व के जागरण का पर्व

संदीप सृजन (अंक: 293, फरवरी प्रथम, 2026 में प्रकाशित)

 

वसंत पंचमी भारतीय संस्कृति का वह महापर्व है जो केवल ऋतु परिवर्तन का उत्सव नहीं, बल्कि मानव अंतःकरण में सरस्वती तत्त्व के जागरण का गहन आध्यात्मिक संदेश देता है। माघ मास की शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि पर मनाया जाने वाला यह त्योहार प्रकृति की बहार के साथ-साथ आत्मा की प्रज्ञा, बुद्धि और सृजनात्मक ऊर्जा के उदय का प्रतीक है। जब सर्दी की सुस्ती टूटती है और चारों ओर पीले सरसों के फूल खिल उठते हैं, तब यह पर्व हमें याद दिलाता है कि अज्ञान के अंधकार के बाद ज्ञान की किरणें कैसे फूटती हैं। यह पर्व सरस्वती तत्त्व के जागरण का उत्सव है, वह तत्त्व जो हमें मूक से वाग्मी, अँधेरे से प्रकाशित और स्थिर से सृजनशील बनाता है। 

सरस्वती तत्त्व केवल विद्या या ज्ञान तक सीमित नहीं है। यह वह दिव्य शक्ति है जो वाणी, बुद्धि, प्रज्ञा, स्मृति, संगीत, कला और सृजन की मूल ऊर्जा है। यह वह चेतना हैं जो सृष्टि की रचना के समय ब्रह्मा जी के मुख से प्रकट हुईं। देवी भागवत पुराण और अन्य ग्रंथों के अनुसार, जब ब्रह्मा जी ने सृष्टि रची तो उन्हें वाणी की आवश्यकता महसूस हुई। उनकी इच्छा से सरस्वती का प्रादुर्भाव हुआ। वे सफ़ेद वस्त्रों में, वीणा लिए, हँस पर सवार होकर प्रकट हुईं। उनका यह रूप बताता है कि सरस्वती तत्त्व शुद्धता, सरलता और गहन अंतर्दृष्टि का प्रतीक है। हँस उनका वाहन इसलिए है क्योंकि हँस दूध और पानी को अलग कर सकता है, ठीक वैसे ही सरस्वती तत्त्व सत्य और असत्य, ज्ञान और अज्ञान को अलग करता है। 

सरस्वती तत्त्व का जागरण अर्थात् व्यक्ति के भीतर वह क्षमता जागृत होना जब वह केवल जानकारी इकट्ठा करने से आगे बढ़कर समझने, विश्लेषण करने, सृजन करने और अभिव्यक्त करने में सक्षम हो जाता है। यह तत्त्व जागृत होने पर व्यक्ति की वाणी में मधुरता आती है, बुद्धि में स्पष्टता, हृदय में करुणा और जीवन में सृजनात्मकता। वसंत पंचमी का नामकरण दो भागों से हुआ, वसंत (ऋतु का राजा) और पंचमी (पांचवीं तिथि)। यह वह दिन है जब प्रकृति में नवजीवन का संचार होता है। सर्दी की जड़ता के बाद कोंपलें फूटती हैं, फूल खिलते हैं, पक्षी गाते हैं और हवा में मादक सुगंध फैलती है। ठीक इसी प्रकार आध्यात्मिक दृष्टि से यह दिन अंतःकरण में सरस्वती तत्त्व के जागरण का प्रतीक है। जब सर्दियों की ठंडक में सब कुछ स्थिर और निष्क्रिय हो जाता है, तब वसंत की पहली किरण अज्ञान की उस ठंडक को पिघलाती है। पीला रंग, जो सरसों के फूलों, सूर्य की किरणों और सरस्वती के वस्त्रों का रंग है, प्रकाश, उल्लास और प्रज्ञा का प्रतीक है। इस दिन पीले वस्त्र धारण करना, पीले व्यंजन बनाना और पीले फूल चढ़ाना केवल परंपरा नहीं, बल्कि सरस्वती तत्त्व को आमंत्रित करने का सूक्ष्म संदेश है। आध्यात्मिक व्याख्या में वसंत पंचमी को विद्या जयंती भी कहा जाता है। यह वह दिन है जब देवी सरस्वती का प्राकट्य हुआ और उन्होंने संसार को अज्ञान के अंधकार से मुक्ति दी। कई विद्वान इसे गुप्त नवरात्रि के पाँचवें दिन से जोड़ते हैं, जहाँ साधना के दौरान प्रज्ञा का अवतरण होता है। 

पौराणिक कथाओं में वसंत पंचमी का उल्लेख विविध रूपों में मिलता है, जिनमें ब्रह्मा और सरस्वती की कथा के अनुसार सृष्टि रचना के समय ब्रह्मा जी को वाणी की आवश्यकता पड़ी। उनकी इच्छा से सरस्वती प्रकट हुईं। उन्होंने वेदों का उच्चारण किया और संसार को ज्ञान दिया। इसीलिए इस दिन को उनका जन्मदिन माना जाता है। एक और पौराणिक कथा कामदेव की पुनर्जीवन कथा है, जब शिव जी ने क्रोध में कामदेव को भस्म कर दिया था। रति की प्रार्थना पर वसंत पंचमी को कामदेव पुनर्जीवित हुए। यह कथा बताती है कि सरस्वती तत्त्व केवल बौद्धिक नहीं, बल्कि प्रेम और सृजन की ऊर्जा को भी जागृत करता है। ये कथाएँ दर्शाती हैं कि सरस्वती तत्त्व सृष्टि का आधार है, बिना इसके न रचना सम्भव है, न अभिव्यक्ति। 

इस दिन की पूजा विधि स्वयं सरस्वती तत्त्व के जागरण को प्रेरित करती है, जैसे पीले वस्त्र और फूल, प्रज्ञा के प्रकाश का प्रतीक है। वीणा, पुस्तक और क़लम की पूजा, सृजनात्मक अभिव्यक्ति के साधनों का सम्मान है। ज्ञान के प्रति समर्पण का भाव बनाए रखने को प्रेरित करता है। सरस्वती वंदना, भजन, वाणी को शुद्ध और प्रभावशाली बनाने की साधना है। वहीं संगीत, नृत्य और कला कार्यक्रम सरस्वती के विभिन्न रूपों का उत्सव है। बच्चे इस दिन पहली बार अक्षर लिखते हैं (विद्या आरंभ संस्कार), जो उनके भीतर सरस्वती तत्त्व के प्रथम जागरण का क्षण होता है। 

वसंत पंचमी हमें याद दिलाती है कि सच्चा विकास बाहरी नहीं, भीतरी है। जब सरस्वती तत्त्व जागृत होता है, तब व्यक्ति केवल जीवित नहीं रहता, जीवन को सार्थक और सुंदर बनाता है। वसंत पंचमी केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि सरस्वती तत्त्व के जागरण का महोत्सव है। यह हमें सिखाता है कि हर सर्दी के बाद वसंत आता है, हर अज्ञान के बाद ज्ञान की किरण फूटती है। आइए, इस पावन अवसर पर हम अपने भीतर की उस दिव्य शक्ति को जागृत करें जो हमें अंधकार से प्रकाश, मौन से वाणी और स्थिरता से सृजन की ओर ले जाती है। 

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