वर्तमान को दर्शाते हुए खरी-खरी कह जाने वाला दस्तावेज़—‘साहित्य की गुमटी’
अतुल्य खरेसमीक्षित पुस्तक: साहित्य की गुमटी (व्यंग्य संकलन)
लेखक: धर्मपाल महेंद्र जैन
शिवना प्रकाशन, सीहोर द्वारा प्रकाशित
प्रथम संस्करण: 2025
मूल्य: ₹275.00
पृष्ठ संख्या: 153
प्रभावी शैली के वरिष्ठ व्यंग्यकार, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी विशेष पहचान रखने वाले सम्मानीय लेखक, प्रवासी धर्मपाल महेंद्र जैन का नवीनतम व्यंग्य संग्रह ‘साहित्य की गुमटी’ समकालीन हिंदी साहित्य की एक महत्त्वपूर्ण कृति है। 50 व्यंग्य रचनाओं का यह संग्रह समाज, राजनीति, प्रशासन की विसंगतियों का एक बेहतरीन कच्चा चिट्ठा है जिसे शिवना प्रकाशन सीहोर द्वारा आकर्षक आवरण पृष्ठ के संग प्रकाशित किया गया है। इसमें शामिल समस्त रचनाएँँ यूँ आकार में तो छोटी हैं, किन्तु व्यवस्था की विसंगतियों पर चोट बड़ी ही करती हैं।
इसके पूर्व धर्मपाल जी के 8 व्यंग्य संग्रह एवं 4 कविता संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं जबकि विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में स्थायी स्तम्भ लेखन एवं सम्पादन कार्य की लंबी सूची है एवं साहित्य विभूषण तथा व्यंग्य भूषण जैसे प्रतिष्ठित सम्मान के साथ ही समय-समय पर उनके साहित्य जगत में उल्लेखनीय योगदान हेतु विभिन्न संस्थाएँ भी उन्हें सम्मानित कर गौरवान्वित हुई हैं।
धर्मपाल जी की शैली विशिष्ट है, जहाँ हास्य के पुट के साथ एक गहरी सच्चाई एवं व्यंग्य छिपा होता है। वे अलंकारिक भाषा के बजाय बोलचाल की भाषा का प्रयोग करते हैं। उनके व्यंग्य में ‘मालवी’ परिवेश की सहजता के संग दीर्घकालीन विदेश प्रवास से प्राप्त अनुभवों की परिपक्वता का मिश्रण देखने को मिलता है। उनके तंज़ तीखे होते हुए स्पष्टतः पाठक की ही प्रतिक्रिया समान प्रतीत होते हैं। उनके कथानक में वह सरलता होती है जो पाठक को उससे जोड़ दे एवं बहुधा पाठक स्वयं को उस विसंगति का हिस्सा मान कर ही कथानक से संबद्ध होता है।
धर्मपाल जी की लेखन शैली अत्यंत सरल एवं भाषा चुटीली है। वे भाषाई क्लिष्टता से दूर प्रचलित लोक-मुहावरों और सामान्य शब्दों में अपनी बात कहते हैं। उनकी रचनाएँ समाज के ज्वलंत मुद्दे को निर्भीकता से उठाती हैं जिनमें वे सीधे सत्ता और व्यवस्था को कटघरे में खड़ा कर देते हैं।
संग्रह का शीर्षक ‘साहित्य की गुमटी’ अपने आप में एक गहरा व्यंग्य है। पूर्व में जहाँ साहित्य को समाज का दर्पण कहा जाता था, जो हमारी संस्कृति का वटवृक्ष रूप था वही आज किस स्तर पर आ गया है। हाल के दौर में पनपे हल्के स्तर के आचरण के द्वारा निम्नस्तरीय होते वैचारिक दायरों को एक गुमटी से संबोधित कर (गुमटी शब्द एक छोटी, अस्थायी दुकान के लिए प्रयुक्त होता है जिसे कुछ जगहों पर खोखा भी कहा जाता है) उसकी असलियत को उजागर किया है।
लेखक ने शीर्षक के माध्यम से स्पष्ट संकेत दिया है कि आज के दौर में साहित्य अपनी व्यापकता, गंभीरता खो कर अत्यंत संकीर्ण हो चुका है। वर्तमान साहित्यिक परिदृश्य गुटबाज़ी, सिफ़ारिशों, निहित स्वार्थों और पुरस्कारों की अंधी दौड़, के कारण एक ‘गुमटी’ के समान संकुचित हो गया है।
उनकी दृष्टि पैनी, अवलोकन सूक्ष्म तथा वार घातक हैं। वे राजनीति, धर्म, तकनीक और मानवीय स्वभाव को बख़ूबी पहचानते हैं। साथ ही उनके व्यंग्य लेखन के विषय में एक उल्लेखनीय तथ्य उनकी विषयगत विविधता है। सदा की तरह ही विभिन्न विषयों को उन्होंने अपने व्यंग्य के दायरे में समेटा है। उन्होंने अपनी रचनाओं में मुख्यतः व्यवस्था और लालफीताशाही को व्यंग्य के दायरे में लेते हुए ‘तानाशाह का मक़बरा’, ‘बजट की ढपली और छुटभैया राग’ जैसे व्यंग्य लिखे हैं जो सीधे तौर पर सत्ता और उसकी कार्यप्रणाली पर व्यंग्य हैं वहीं बजट की ढफली . . . बहुत हद तक सत्यता उजागर करती है। भिन्न-भिन्न रचनाओं में लेखक ने राजनीति में बढ़ते दिखावे और संस्थाओं के प्रयोग को अपनी पैनी दृष्टि से पकड़ा है। साथ ही उनकी रचनाओं में लोकतंत्र के वर्तमान स्वरूप, चुनावी वादों और सत्ता के गलियारों में होने वाली जोड़-तोड़ आदि पर गहरा कटाक्ष होता है।
‘प्रजातंत्र की अंगूठी’, ‘ई.डी. है तो प्रजातंत्र स्थिर है’ और ‘हर ज़िले में विधानसभा बनाएँगे’ जैसी रचनाएँँ हैं जो गंभीरता से तंज़ कर रही हैं कहीं व्यवस्था पर तो कहीं हालिया राजनीति पर, और कहीं राजनीतिज्ञों पर।
वहीं इस संग्रह में उन्होंने इंटरनेट, सोशल मीडिया और दिखावे की संस्कृति को अपने निशाने पर लिया है यहाँ लेखक यह दर्शाते हैं कि कैसे तकनीक ने मनुष्य के विवेक को कुंठित कर दिया है जैसे ‘वाट्सएप नहीं, भाट्सएप’, ‘लाइक बटोरो और कमाओ’ के द्वारा वे समाज की आधुनिक युग में डिजिटल ग़ुलामी पर गहरी चोट करते हैं।
अपने इस संग्रह में उन्होंने विभिन्न विषयों पर रचनाएँँ दी हैं, चंद रचनाओं में उन्होंने धर्म और संस्कृति के निजी स्वार्थ हेतु हो रहे उपयोग को केंद्रित किया है तो वर्तमान समाज में व्याप्त ढोंग और अंधभक्ति पर प्रहार करती हुई है उनकी रचना ‘धर्म रक्षक सदाचारी’ जिसका प्रथम वाक्य ही बहुत कुछ कह जाता है कि—“एक नव सदाचारी भेड़िया था” जिसमें एक वृद्ध भेड़िये के प्रतीक द्वारा उन्होंने समाज में ढोंगी बहुरूपियों तथा धर्म के नाम पर अपने अनाचार को फैलते भ्रष्ट कुकर्मियों पर निशाना साधा है।
वहीं कुछ कहानियाँ साहित्य के भाषाई पतन, जोड़-जुगाड़ और गुटबाज़ी, एवं हालिया साहित्यिक स्तर पर केंद्रित हैं, जिसमें वे साहित्य के क्षेत्र में पनप रही विसंगतियों को दर्शाते हैं जैसे की ‘भाषा के हाईवे पर गड्ढे ही गड्ढे’ और ‘साहित्य अकादमी-सी पान की गुमटी।’ यहाँ उनकी टिप्पणी साहित्य के गिरते स्तर पर है कि कैसे अब साहित्य चर्चा एक ‘गुमटी’ (छोटी दुकान) के स्तर तक सिमट चली है। इन रचनाओं के द्वारा वे साहित्य जगत के भीतर की राजनीति और साहित्य के दिन ब दिन गिरते स्तर को भी उजागर करते हैं। ‘साहित्य अकादमी-सी पान की गुमटी’ शीर्षक स्वयं में एक बहुत बड़ा तंज़ है, जो संस्थाओं के घटते महत्त्व को दर्शाता है जहाँ गुमटी को प्रतीक रूप में लेकर उन्होंने अपने कथ्य को प्रमुखता से स्पष्ट कर दिया है।
अपने व्यंग्य आलेखों में अथवा अन्य सामान्य लेखों में भी वे मूल रूप से समाज के “दोहरे मापदंडों” पर तीखे तंज़ करते हैं। फिर वह धर्म के नाम पर पाखंड हो जैसे कि कहानी ‘धर्म रक्षक सदाचारी’ में अथवा प्रगति के नाम पर भ्रष्टाचार जो की कहानी ‘चिपको और जेब भरो’ में दर्शाते हैं।
बात करें यदि कुछ अन्य व्यंग्य लेखों की तो संग्रह की पहली कहानी ‘ज़हर के सौदागर’, जिसके द्वारा वे उन तमाम ताक़तों की ओर इशारा करते हैं जो समाज में हर क़िस्म का ज़हर फैला रहे हैं फिर वह नफ़रत हो, सांप्रदायिकता हो अथवा जातिवाद या व्याभिचार। इस में शामिल फिर चाहे वह राजनीति हो अथवा मीडिया, अथवा अन्य, वे इन्हें ज़हर के सौदागर के नाम से पुकारते हैं जिनमें कोई मानवीय संवेदनाओं शेष रही नहीं हैं।
कहानी ‘किनारे का ताड़ वृक्ष’ पुरानी कहावत बड़ा हुआ तो क्या हुआ को ही उद्धृत करती है एवं अपने भाव से मुहावरे को सार्थक करते हुए अपने वास्तविक रूप में उन व्यक्तित्वों या संस्थाओं पर कटाक्ष है जो यूँ तो सामर्थ्यवान हैं, शक्तिशाली हैं, उच्चपदासीन महान व्यक्ति हैं, लेकिन समाज या आम आदमी के लिए किसी काम के नहीं हैं वे अपने सामर्थ्यवान, बलशाली होने के ग़ुरूर में ही झूम रहे हैं। ‘किनारे’ का होना उनका आमजन से दूरी तथा उनकी संवेदनहीनता तथा संवादहीनता का प्रतीक है।
संग्रह की रचना ‘तानाशाह का मक़बरा’ सत्ता की अमरता के भ्रम को खंडित करती है एवं इसके माध्यम से वे यह संदेश देते हैं कि इतिहास में कोई भी तानाशाह स्थायी नहीं रहा। ‘मक़बरा’ शब्द बख़ूबी यह संकेत है कि तानाशाह ही नहीं अपितु दमनकारी विचारधाराएँ भी अंततः मिट्टी में मिल जाती हैं। मक़बरा, शब्द प्रतीक है उस शक्ति का, दमन का और बीते समय का जिसका अब कोई नाम लेवा भी नहीं है।
एक और रचना ‘होरी खेले व्यंग्यवीरा अवध में’ के द्वारा उन्होंने समकालीन साहित्यकारों और बुद्धिजीवियों की स्थिति का चित्रण बख़ूबी प्रस्तुत किया है। लेखक होली के संदर्भ में विभिन्न साहित्यकारों द्वारा संपादक को प्रसन्न करने के प्रयासों के द्वारा संकेत देते हैं कि किस तरह समकालीन साहित्यकार, साहित्य सृजन पर कम किन्तु चाटुकारिता एवं जोड़तोड़ के प्रयासों से छपने और आगे निकलने पर अधिक केंद्रित है।
फ़िल्मी दृश्यों के संदर्भ का उपयोग करते हुए वर्तमान आधुनिक सामाजिक बुराइयों को रक्तबीज के रूप में व्याख्या करती उनकी रचना ‘रक्तबीज का क्या मतलब’, जिस प्रकार रक्तबीज के रक्त की पृथ्वी पर गिरने वाली प्रत्येक बूँद से एक नया दानव अथवा बुराई या फिर शत्रु जन्म ले लेता था, उसी प्रकार इस युग में भी एक बुराई रूपी दानव के ख़त्म होते न होते दूसरी कोई बुराई एक नए रूप (भ्रष्टाचार, सांप्रदायिकता और अनैतिकता जैसी) में खड़ी हो जाती है।
नौकरशाही और चाटुकारिता पर एक तीखा प्रहार करती है रचना ‘साहब को ज़ुकाम है पर . . .’ जो किसी आम आदमी की बड़ी से बड़ी तकलीफ़ के विपरीत, बड़े अफ़सर अथवा राजनेता की छोटी-सी तकलीफ़ के बाबत है जिसमें सक्षम को आम जनता के दर्द तकलीफ़ से परे स्वयं के लिए सम्पूर्ण तंत्र की निर्विकार मर्यादा विहीन सेवा-भक्ति चाहिए। साथ ही सत्तानशीं का आमजन की तकलीफ़ों से दूर स्वयं के श्री-गुणगान की फ़िक्र को दर्शाती यह रचना है।
‘कुर्सी एक, चांदीलाल अनेक’, यहाँ विचारधारा विहीन स्व-हिताय, स्वार्थी, वर्तमान राजनीति में चांदीलाल प्रतीक है उन छुटभैये नेताओं तथा उभरते कामचोर स्वार्थी तथाकथित नेताओं का जो पद पाने के लिए कोई भी क़ीमत देने को तैयार हैं और वह सब कुछ करने हेतु प्रवृत्त हैं जिससे उनकी स्वार्थ सिद्धि बिना किसी विशेष प्रयास अर्थात् सेवा के हो जाए। उनके लिए कुर्सी ही अंतिम सत्य है। वहीं एक ही कुर्सी अथवा राजनीति का कोई प्रभावशाली पद जिसके लिए कई दावेदारों की खींचतान व उठापटक रहती है, को भी बेहद रोचक ढंग से प्रस्तुत किया गया है।
जब संस्कृति के नाम पर मात्र स्वार्थगत आचरण का बोलबाला हो, हर किसी के लिए संस्कृति एवं संस्कारों के वही अर्थ हों जो स्वयं को रास आयें, उनके लिए लाभकारी हों, अंधभक्ति तथा अनैतिक आचरण प्रबलतम हो तब उसे संस्कृति कहना क्या उचित है! चौकने वाले शीर्षक ‘संस्कृति संक्रामक बीमारी है’, के द्वारा संस्कृति के उस रूप पर व्यंग्य है जिसे मात्र दिखावे के लिए प्रयोग किया जा रहा है, स्वार्थसिद्धि हेतु इस्तेमाल किया जाता है।
हवाई यात्रा के तजुर्बों और हिदायतों को रोचकता के संग प्रस्तुत करती रचना विशेष तौर पर उनके लिए है जो आधुनिकता की दौड़ में शामिल तो हैं किन्तु अक्सर नियमों से बेपरवाही दिखाना उनका ख़ास शग़ल होता है एवं अनुशासनहीनता सबसे अहम गुण। गहरी बातें हल्के-फुल्के अंदाज़ में हास्य के पुट के संग दर्शाती रचना है “हवाई जहाज़ ज़ंजीर खींचने से नहीं रुकता।”
राजनीति के मौजूदा परिदृश्य पर भाषण के मारफ़त समकालीन राजनीति, उसमें घुसपैठ के तरीक़े, व जड़ें जमाने से लेकर ऊपर पहुँचने के प्रैक्टिकल नुस्ख़े बतलाती रचना है ‘चिपको और जेब भरो’ जो सत्ताधारी, विपक्षी, एवं चिल्लर पार्टियों के गठबंधन पर भी विस्तार से ज्ञान प्रदान करती है।
वहीं ‘नाम संस्कारी हो तो जूते खाओ’ में अपने ही नाम में शामिल शब्द ‘धर्म’ पर हल्के-फुल्के अंदाज़ में गंभीर किन्तु तार्किक व्यंग्य दे जाते हैं। नाम की आड़ में, हालिया माहौल में नाम और ब्रांड की राजनीति पर प्रहार करती हुई यह रचना है, जहाँ काम से ज़्यादा नाम के संस्कारी होने पर ज़ोर दिया जाता है और नाम में राम का नाम लगा कर सब कुछ ग़लत करने का लाइसेंस लिए लोगों की फ़ेहरिस्त दिन ब दिन लंबी होती जाती है।
कहानी ‘व्हाट्सऐप नहीं भाट्सऐप’ आज के डिजिटल युग में, सोशल मीडिया पर हल्के-फुल्के तंज़ के संग, प्रयोग कर्ताओं द्वारा उसके सुंदर (?) दुरुपयोग, पुनः भाट (अथवा भाँड़ जिनका कार्य मात्र राजा की चाटुकारिता करते हुए उसकी तारीफ़ और शौर्य का बखान ही एक मात्र कार्य होता था तथा वे प्रत्येक राजा के दरबार में पाए जाते थे) संस्कृति को जीवित होने से रोकने के प्रति आगाह करती है।
‘साहित्य की गुमटी’ मात्र व्यंग्य रचनाओं का संग्रह नहीं है, बल्कि यह इस दौर का एक प्रामाणिक दस्तावेज़ है। संग्रह में शामिल प्रत्येक रचना अपने विषय विशेष पर तीखे किन्तु गंभीर तथा गर्भित तंज़ के कारण अवश्य पढ़ी जानी चाहिए हालाँकि यहाँ सिर्फ़ कुछ ही रचनाओं का ज़िक्र किया है किन्तु जिनके विषय में नहीं लिखा गया है वे कहीं भी कमतर नहीं आँकी जानी चाहिए। धर्मपाल महेंद्र जैन जी ने इस संग्रह के माध्यम से यह सिद्ध कर दिया है कि व्यंग्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि समाज के आत्म-चिंतन का एक सशक्त माध्यम है। कुल मिलाकर, 'साहित्य की गुमटी' वर्तमान समय की विसंगतियों को दर्शाते हुए खरी खरी कह जाने वाला एक ऐसा दस्तावेज़ बन गया है जो समाज का असली चेहरा दिखाता है जिसे हम जाने अनजाने अनदेखा कर देते हैं।
अतुल्य खरे
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