वाराणसी (काशी) वैभव
डॉ. श्याम किशोर पांडेय
दुनिया के सबसे प्राचीनतम नगरों में से एक है, वाराणसी, जिसे काशी और बनारस के नाम से भी जाना जाता है। भारत में वाराणसी के बारे में यह प्रसिद्धि है कि यह भगवान शिव के त्रिशूल पर स्थित है और ‘स्कंद पुराण’ के काशी खंड में उल्लेख है कि भगवान शंकर का निवास स्थान ज्ञानवापी (वाराणसी) में था जहाँ पर शंकरजी पार्वती जी निवास करते थे।
यह सतयुग से पहले की बात है। काशी खंड में दी गई चौहद्दी के अनुसार शिव स्थान के दक्षिण में ज्ञानवापी कूप, उत्तर में अविमुक्तेश्वर, पश्चिम में शृंगार गौरी, पूरब में गंगा और गंगेश्वर के होने का उल्लेख है।
अंग्रेज़ी भाषा के सुप्रसिद्ध लेखक मार्क ट्वेन ने वाराणसी की प्राचीनता के बारे में लिखा है, “Banaras is older than history, older than tradition, older even than legend is and looks twice as old as all of them put together.”
यह शहर प्राचीन काल से ही विद्या, अध्यात्म, कला एवं शिल्प का उत्कृष्ट केंद्र रहा है। इस शहर का अपना जीवन-दर्शन है, अपनी फ़ाक़ा-मस्ती है, और यह एक मात्र शहर ऐसा है जिसकी अपनी आत्मा है और एक अलग ही पहचान है तथा लोगों को अपनी ओर आकृष्ट करने की अद्भुत क्षमता भी है। वाराणसी के गंगा घाट, ज्ञानवापी, बाबा विश्वनाथ, माता अन्नपूर्णा, कालभैरव, ढूंढीराज गणेश, बाबा केदार, तिल भांडेश्वर, वटुक भैरव आदि मंदिर, पंचगंगा, मणिकर्णिका, दशाश्वमेध, मान-मंदिर, शिवाला, तुलसी, हरिश्चंद्र, केदार, चेत सिंह, अस्सी घाट आदि जैसे घाट दर्शन-स्नान करने के लिए पत्थर के घाट एवं सीढ़ियाँ ही नहीं हैं अपितु अपने अंदर तमाम आध्यात्मिक, पौराणिक, ऐतिहासिक धरोहरों को भी समेटे हुए हैं। इन विशेषताओं के कारण ही वाराणसी के लिए यह उक्ति प्रसिद्ध है:
“काश्यां ढूँढ़े, गया पिंडे, प्रयाग मुंडे।”
अर्थात् वाराणसी में जितना ढूँढेंगे उतना पाएँगे, गया में पितरों के लिए पिंड दान, श्राद्ध कर्म का और प्रयाग में मुंडन का महत्त्व है। यहाँ का कंकर-कंकर शंकर है। वाराणसी अपनी गलियों के लिए प्रसिद्ध है। पत्थर की चौड़ी पट्टियों/ईंटों से बनी ये गलियाँ गंगा के किनारे-किनारे मीलों तक फैली हैं। हिंदी के सुप्रसिद्ध साहित्यकार डॉ. शिव प्रसाद सिंह की पुस्तक “गली आगे मुड़ती है” में इन गलियों की नायाब प्रस्तुति की गई है। गाय घाट से गली में घुसे और आपको यदि गलियों के बारे में सही जानकारी है तो अंदर ही अंदर अस्सी घाट तक जा सकते हैं। शायद ही, विश्व में कहीं भी इस तरह की गली की संकल्पना मूर्त रूप में मिले। गलियों में दोनों तरफ़ हर तरह की दुकानें मिल जाएँगी, खाने-पीने से लेकर कपड़ा और जवाहरातों तक की। साथ ही, कुछ ऐसी नायाब चीज़ें हैं जो केवल गलियों में ही मिलेंगी। यह “पक्का महल” गायघाट से दशाश्वमेध घाट तक फैला हुआ है। गलियोंके नीचे सैकड़ों वर्ष पुराने सीवर हैं जो यहाँ के मल-मूत्र को बहा ले जाते हैं। ये गलियाँ सर्पिली, सीधी, सँकरी हैं जो आगे चलते-चलते मुड़ तो जाती हैं पर बंद कभी नहीं होतीं और तो और खुलती भी गंगा की तरफ़ ही हैं। ब्रह्मनाल और ज्ञानवापी में नया बना बाबा विश्वनाथ कॉरिडोर नित्य हज़ारों भक्तों एवं दर्शनार्थियों को आकर्षित करता है। इस कॉरिडोर की अन्य विशेषताओं के साथ-साथ, सबसे बड़ी विशेषता यह है कि आप गंगा स्नान करके सीधे विश्वनाथ जी का दर्शन और जलाभिषेक कर सकते हैं, यहाँ से गंगा माँ का साक्षात् दर्शन कर सकते हैं। यह सुविधा पहले उपलब्ध नहीं थी। इन गलियों में आज भी स्वच्छंद घूमते हुए साँड़ और दंडी संन्यासी दिख जाते हैं। तभी तो काशी में लोग बड़ी सहजता से कहते हैं:
“राड़, साढ़, सीढ़ी, संन्यासी, इन चारों से बचे तो सेवे काशी”!
मणिकर्णिका घाट की तरफ़ जाने वाली गली में चलते हुए मुर्दे का दर्शन और “राम नाम सत्य है” का श्रवण होना आम बात है। यहाँ के हर घाट का वातावरण भी अलग-अलग है, पंचगंगा, गायघाट पर नेपाली एवं मराठी दिखेंगे, वहीं, केदारघाट, शिवाला घाट, त्रिपुरा घाट की गलियों में घूमते हुए लगेगा कि दक्षिण भारत में आ गए हैं। बंगाली टोला में लगेगा कि आप बंगाल में हैं। इस तरह से सच में, यह शहर, भारत की अनेकता में एकता और समरसतावादी संस्कृति की सुंदर मिसाल प्रस्तुत करने वाला जीता-जागता उदाहरण है। यह एक ऐसा शहर है जहाँ त्योहारों के आने की आहट काफ़ी पहले से ही गलियों में सुनाई पड़ने लगती है।
वाराणसी अनादि काल से ही अध्यापकों एवं विद्यार्थियों का घर रहा है। इसीलिए, भारत के हर मत, संप्रदाय के महत्त्वपूर्ण महापुरुष यहाँ सदा से आते रहे हैं। गौतम बुद्ध गया में सम्यक् संबोधि प्राप्त करने के बाद वाराणसी के निकट स्थित सारनाथ ही आए। सारनाथ का बोधि स्तूप, मूलगंध कुटी विहार, वह स्थल जहाँ पर गौतम बुद्ध नंगे पाँव घूमे थे, आज भी बौद्ध मतावलंबियों, हिंदुओं के लिए दर्शनीय, स्मरणीय एवं पूजनीय है। प्रति वर्ष पूरी दुनिया से हज़ारों बौद्ध भिक्षुक यहाँ दर्शन एवं पूजन के लिए आते हैं। जैन तीर्थंकर भगवान पार्श्वनाथ का भी यह कर्मक्षेत्र रहा है। मुग़लों के शासन काल में भी वाराणसी में विद्वानों ने संस्कृत की जोत को जलाए रखा और ज्ञान के विभिन्न क्षेत्रों में उत्कृष्ट ग्रंथों की रचना की तथा श्रेष्ठ अध्यापन के द्वारा ज्ञान के विभिन्न क्षेत्रों में सुयोग्य विद्वान छात्र तैयार किए। उदाहरण के लिए, ज्योतिष में रंगनाथ पंडित, धर्मशास्त्र में नंद पंडित, मीमांसा एवं धर्मशास्त्र में नारायण भट्ट एवं उनके वंशज, न्यायशास्त्र में महादेव पूर्ण ताम्बेकर, कृष्ण भट्ट, सांख्य वेदांत में विज्ञान भिक्षु, वेदांति महादेव, व्याकरण में भट्टोजि दीक्षित, नागेश आदि, तंत्र में नील कंठ, भास्कर आदि, वेदांत में मधुसूदन, नृसिंह आदि, साहित्य में पण्डितराज जगन्नाथ, अप्पय दीक्षित, विश्वनाथ आदि के नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, रामानंदाचार्य, वल्लभाचार्य, चैतन्य महाप्रभु, कबीर एवं तुलसी जैसे महापुरुषों की भी वाराणसी कर्मस्थली रही है। वाराणसी तंत्र विद्या एवं योग साधना विद्या का भी प्रमुख केन्द्र रहा है। तैलंग स्वामी, कीनाराम, योगिराज श्यामा चरण लाहिड़ी, महा महोपाध्याय गोपिनाथ कविराज, माँ आनंदमयी जैसी महान विभूतियों की साधना स्थली भी काशी ही रही है। लोलार्क कुंड और पिशाच मोचन भी यहीं पर है। आज भी सम्पूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय, बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के प्राच्य विद्या धर्म विज्ञान संकाय के अतिरिक्त यहाँ सैकड़ों छोटी-बड़ी संस्कृत पाठशालाएँ चल रही हैं जिनमें विद्वान अध्यापक मनोयोग पूर्वक भारतीय आर्ष विद्याओं का अध्यापन कर रहे हैं। आज का वाराणसी उच्च शिक्षा का प्रमुख केन्द्र बन गया है जिसमें भारतरत्न महामना मदन मोहन मालवीय जी द्वारा स्थापित बनारस हिंदू विश्वविद्यालय की बहुत बड़ी भूमिका है।
मुग़ल साम्राज्य के अंतिम वर्षों में और मराठों के उत्कर्ष काल में राजे-रजवाड़ों ने वाराणसी में विशाल मंदिर बनवाए। कूच-विहार से जोधपुर और कश्मीर से कन्याकुमारी तक फैले हुए देसी राजाओं ने यहाँ पर मंदिर और महल बनवाए। इसके पीछे एक कारण यह भी था कि वृद्धावस्था में काशी में आकर प्राण त्याग करने से मोक्ष मिलता है। इसके प्रमाणस्वरूप यह श्लोक उद्धृत किया जाता है, ”काश्यां मरणान्मुक्ति:” अर्थात् काशी (वाराणसी) में मरने से मुक्ति मिलती है। इसीलिए, धनाढ्य वर्ग जीवन के अंतिम वर्षों में वाराणसी आ जाता था और अपने भवनों में निवास करते हुए प्राण त्यागता था। महलों और मंदिरों के निर्माण की कड़ी में महारानी अहिल्याबाई होल्कर द्वारा ध्वंस प्राचीन विश्वनाथ मंदिर के बग़ल में बनवाया गया नया विश्वनाथ मंदिर अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। इस मंदिर के गुंबद पर लगाने के लिए पंजाब के महाराजा रणजीत सिंह ने इक्कीस मन स्वर्ण दान में दिया था, जो अपने आप में दान की एक अद्भुत मिसाल है। इसे ही भारत सरकार ने सुविस्तृत कर दिया है जो आज श्री विश्वनाथ कॉरिडोर के नाम से जाना जाता है। भगवान शिव इस नगरी के आराध्य देव हैं और विश्वनाथ जी के तीन मंदिर भी यहाँ पर हैं। पर, अन्य देवी-देवताओं से जुड़े पर्व एवं लोक प्रचलित तीज-त्योहारों को भी इस नगर में अत्यंत श्रद्धा-विश्वास एवं उत्साह के साथ मनाया जाता है। चैत्र और आश्विन के नवरात्रों में देवी के नौ रूपों की पूजा-अर्चना काफ़ी विधि-विधान, श्रद्धा एवं विश्वास के साथ की जाती है और नौ देवियों के अलग-अलग मंदिर भी यहाँ पर स्थित हैं। नवरात्रों में “रामचरित मानस” के पारायण से पूरा नगर गुंजायमान् रहता है। रामनगर (वाराणसी) की पारंपरिक ढंग से मनाई जाने वाली राम लीला विश्व प्रसिद्ध है। इस लीला की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह आज भी पारंपरिक रूप में ही मनाई जाती है। वर्तमान में गंगा घाटों पर छठ पूजा (सूर्य षष्ठी व्रत) का आयोजन भी काफ़ी श्रद्धा, विश्वास एवं उत्साह के साथ किया जा रहा है।
आध्यात्मिकता, धर्मपरायणता के साथ-साथ राजनीतिक दृष्टि से भी यह काफ़ी सजग शहर रहा है। प्रथम स्वाधीनता संग्राम में (1857ई.) इस नगर ने बड़ी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। वीरांगना लक्ष्मीबाई की जन्मस्थली वाराणसी ही है। देश के स्वाधीनता संग्राम में भी वाराणसी ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। कांग्रेस के कई दिग्गज नेताओं ने इस नगर में व्याख्यान दिए तथा स्वाधीनता का अलख जगाया, इनमें सर्वश्री सुरेन्द्र नाथ बनर्जी, लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक, मदन मोहन मालवीय, गोखले, महात्मागांधी, आदि जैसे बड़े नेताओं के नाम उल्लेखनीय हैं। महामना मदन मोहन मालवीय, शिव प्रसाद गुप्त, सर सुंदर लाल, चंद्र शेखर आज़ाद, लाल बहादुर शास्त्री, संपूर्णानंद, कमलापति त्रिपाठी आदि जैसे महान राज नेताओं एवं देशभक्तों के लिए यह नगरी कर्मस्थली रही है।
यद्यपि यहाँ के विद्वानों के पठन-पाठन की भाषा मूल रूप से संस्कृत रही है परन्तु हिंदी के प्रयोग, उसके विस्तार, गुणवत्ता में वृद्धि के लिए भी इस नगर ने प्राण-पण से कोशिश की है। स्वाधीनता से पहले और उसके बाद भी खड़ी बोली हिंदीके संवर्द्धन, उन्नयनएवं पुष्टीकरण में इस नगर ने बहुत बड़ा योगदान किया है। खड़ी बोली हिंदी के जनक भारतेंदु हरिश्चंद्र की यह जन्मभूमि एवं कर्म भूमि है। भारतेन्दु ने स्वयं “कवि वचन सुधा” तथा “हरिश्चंद्र मैग्ज़ीन” जैसी दो प्रतिष्ठित हिंदी पत्रिकाओं का प्रकाशन यहीं से प्रारंभ किया। हिंदी के व्यावसायिक रंगमंच का प्रारंभ काशी के बनारस थिएटर (पुराना नाचघर) में 03 अप्रैल 1868 को प्रदर्शित शीतला प्रसाद त्रिपाठी के नाटक “जानकी मंगल” से हुआ। भारतेन्दु की प्रेरणा से ही 1884 में वाराणसी में “नेशनल थियेटर” की स्थापना हुई जिसके लिए उन्होंने अपने सुप्रसिद्ध नाटक “अंधेर नगरी” की रचना एक रात में ही की। महावीर प्रसाद द्विवेदी, मुंशी प्रेमचंद, जयशंकर प्रसाद, श्याम सुंदर दास, लाला भगवान दीन, राम चंद्र शुक्ल, अयोध्या प्रसाद उपाध्याय हरिऔध, विश्वनाथ प्रसाद मिश्र, केशव प्रसाद मिश्र, हज़ारी प्रसाद द्विवेदी, विद्या निवास मिश्र, भोला शंकर व्यास, नामवर सिंह, शिव प्रसाद सिंह, काशी नाथ सिंह जैसे स्वनामधन्य हिंदी के सैंकड़ों धुरंधर साहित्य सेवियों/विद्वानों को पल्लवित, पुष्पित एवं परिपुष्ट करने का श्रेय वाराणसी की धरती को ही है। “सरस्वती” जैसी महत्त्वपूर्ण हिंदी पत्रिका यहीं से प्रकाशित हुई जिसने सैंकड़ों लेखकों को हिंदी में लिखने हेतु प्रोत्साहित करने, परिमार्जित करने एवं सिद्धहस्त बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह किया। काशी नागरी प्रचारिणी सभा और बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग ने पूरे विश्व में हिंदी भाषा एवं हिंदी साहित्य का प्रचार-प्रसार करने की दृष्टि से अतुलनीय कार्य किए हैं और आज भी निष्ठापूर्वक इस क्षेत्र में अनवरत प्रयास कर रहे हैं।
भगवान शिव की नगरी वाराणसी “विजया” के लिए मशहूर है। मौसम के अनुसार आम, लीची, फ़ालसा, कसेरू या दही में भाँग बनती है और बनारसी एक दूसरे से पूछते हैं, “का गुरु आज कैसे छनले हौआ?” वाराणसी की ही यह विशेषता है और शायद यह दुनिया का अकेला शहर है, जहाँ आज भी फलाहारी मिठाई की दुकानें हैं। खोए की मिठाई, सिंधाड़ा, कुट्टू और आलू के नमकीन बनते हैं, इसलिए व्रत, उपवास के दिन भी लोग इन्हें खा सकते हैं। दूर-दूर तक फैली गलियों में, मिठाई, दूध-मलाई, दही, रबड़ी की दुकानें हैं तो घाटों पर अखाड़े भी हैं, जहाँ लँगोट लगाए डंड-बैठक करते हुए और मुद्गर भाँजते हुए पहलवान मिल जाएँगे।
स्वतंत्रता के बाद, वाराणसी ने कई राजनेताओं को अपने क्षेत्र का सांसद बनाकर उन्हें बड़े राजनेता बनने का सौभाग्य प्रदान किया है। इनमें सर्वश्री भगवान दास, संपूर्णानंद, लाल बहादुर शास्त्री, कमलापति त्रिपाठी, मुरली मनोहर जोशी, राजनारायण आदि के नाम प्रमुख हैं। सन् 2014 में वाराणसी ने वर्तमान के यशस्वी प्रधान मंत्री श्री नरेन्द्र दामोदर दास मोदी को अपने संसदीय क्षेत्र का सांसद बनाया जो पहली बार सांसद बने और सांसद बनते ही देश के प्रधान मंत्री भी बन गए। यह अपने आप में अतिविशिष्ट है कि इस शहर ने लगातार तीसरी बार मोदी जी को चुनकर न केवल सांसद बनाया अपितु मोदी जी को लगातार तीसरी बार भारत के प्रधान मंत्री बनने का गौरव भी प्रदान किया। भारत के संसदीय लोकतंत्र की यह एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण घटना है। वाराणसी, भारत का एकमात्र ऐसा नगर है जिसे अपने दो सांसदों को देश का प्रधान मंत्री बनाने का गौरव प्राप्त हुआ है। (श्री लाल बहादुर शास्त्री एवं श्री नरेन्द्र मोदी)। वर्तमान में, वाराणसी के लोकप्रिय सांसद एवं ऊर्जस्वी प्रधान मंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व एवं मार्गदर्शन में यह शहर अपनी प्राचीन धरोहर, सांस्कृतिक वैभव को अक्षुण्ण रखते हुए तथा उसमें परिष्कार करते हुए अत्याधुनिक शहर बनने की होड़ में अव्वल बनता जा रहा है।
वाराणसी के मगही पान का जलवा, यहाँ के पंडितों द्वारा सहज रूप में शास्त्रार्थ में संस्कृत में “अवच्छिन्नावाच्दिन्नेन” कहना, कचौड़ी-जलेबी। जलेबा का लाजवाब स्वाद, बनारसी साड़ी की नज़ाकत, नफ़ासत तथा ऐश्वर्य, क़ालीन की बेशक़ीमती बुनावट, बहुत कुछ कहती है, देखते, सुनते, गुनते मन नहींअघाता। सहस्त्राब्दियाँ बीत गईं, भारत के गौरव अतीत को, अपने सुख-दुख को अपने में ही समेटे, सीना चौड़ा किए “का राजा बनारस” का उद्घोष करते हुए यह शहर आज भी अपनी मस्ती में झूमता हुआ रुपहले भविष्य की ओर बढ़ने की दिशा में निरंतर अग्रसर है। काल भैरव से सुरक्षित, बाबा विश्वनाथ, माँ अन्नपूर्णा का यह शहर अद्भुत है, विराट है, भव्य है, जीवंत है और महान है तभी तो काशी वाले गर्व से कहते हैं, “चना चबेना गंग जल और पर्व-त्योहार, काशी कभी न छोड़िए विश्वनाथ दरबार।”
निम्नलिखित पंक्तियों में वाराणसी (काशी) के महत्त्व की अभिव्यक्ति अत्यंत ख़ूबसूरत ढंग से की गई है:
“सत्य-सत्व-शालिनी सुधर्ममार्गदर्शिनीं
भुक्तिमुक्तिदायिनीं विरक्तिमुक्तिवर्धिनीम्।
पापसंघनाशिनीं परात्परां पुरातनी
पुण्यभूमिमादरान्नमामि काशिशारदाम्॥
सिद्धानां सदनं काशी बिबुधानां निकेतनम्।
भवनं विभवानां च तीर्थमध्यात्मसम्पदाम्॥
देवदुर्लभदृश्या या तीर्थराजेऽपि न स्फुटा।
सात्र क्रीडति निर्द्वन्द्वं गेहे गेहे सरस्वती॥”