सायरन में क़ैद लोकतंत्र
हरेन्द्र पंडित
आ रही मंत्री की सवारी।
ख़िदमत में भिड़ी हुई है,
नौकरशाह की फौज़ भारी।
आ रही मंत्री की सवारी॥
कइयों के रोज़ी-रोटी के सहारे।
हटाये गए ‘अतिक्रमण’ सारे,
दुबक गए घर में अब वे,
बचा कहाँ कोई ठौर प्यारे।
छीन गई ठेले खोमचों की,
कई दिनों की रोजगारी।
आ रही मंत्री की सवारी॥
रंग रोगन से हर सड़क सजी है,
कपड़ों से नाकामी ढँकी है।
आम जनता पर फिर भी,
नौकरशाहों की भृकुटि तनी है।
सजावट की पट्टी बाँधकर,
छुपाए गए सारे राज भारी।
आ रह मंत्री की सवारी॥
बंद हुए बाज़ार सारे,
रोज़ी-रोटी के सहारे।
थम गई जीवन की गति,
थमे वाहनों के पहिये सारे।
रह गए विद्यार्थी घरों में,
बीमारों की बढ़ी दुश्वारी।
आ रही मंत्री की सवारी॥
सड़क पर बैरिकेडिंग लगे हैं,
दुकानों पर ताले जड़े हैं।
हर चौक-चौराहे, मोड़ पर,
प्रहरी असंख्य ही खड़े हैं।
जनता क़ैद घर में,
त्राहिमाम-त्राहिमाम पुकारी।
आ रही मंत्री की सवारी॥
असंख्य कारों का क़ाफ़िला बना है,
सुरक्षा का घेरा भीषण घना है।
कौतूहल है जन मानस में,
पर घर से निकलना ही मना है।
गूँज रही दसों दिशाओं में,
सायरन की गर्जना भारी।
आ रही मंत्री की सवारी॥
चाहता देखूँ झलक एक,
उस ‘यशस्वी’ मूरति को।
जिसके मात्र आगमन से,
शहर की ऐसी सुरति हो।
पर सुरक्षा कर्मियों ने,
दे दी झिड़की ढेर सारी।
आ रही मंत्री की सवारी॥
1 टिप्पणियाँ
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3 Jan, 2026 08:12 PM
Bahut hi sundar likhe hai ap.. Kadwi sachhayi hai or relevant bhi. Ayese hi likhte rahiye hum sath me hai..