सैर

सीमा मेहता  (अंक: 300, जुलाई प्रथम, 2026 में प्रकाशित)

 

शाम का भोजन जीमकर 
निकला ज़रा सैर पर 
दिनभर भागा-दौड़ी कर 
थकान मिटाने सैर पर 
 
कुछ दुकानें खुली हैं 
कुछ हो चुकी हैं बंद 
कहीं रौशनी भरपूर है
कहीं-कहीं ज़रा सी मन्द 
 
फलों सब्ज़ियों के ठेले वाले 
चल पड़े हैं अपने घरों की ओर 
मंदिरों में आरतियों की गूँज 
आवाजाही बाज़ार में चहुँ ओर 
 
मुझे भी मिल गए यार मेरे 
होने लगी फिर मस्ती भरी बातें 
भूलकर हर तनाव उस वक़्त 
ख़ुशनुमा बनाते हैं ये मुलाक़ातें 
 
हर मौसम की शाम का भी 
होता है अलग सा नज़ारा 
सर्दी में ठिठुरन भरी तो 
गर्मी में शीतल हवा से प्यारा 
 
लौटकर अब घर जाऊँ 
तो ख़ुद को तरोताज़ा पाऊँ 
कल फिर काम पर जाने को 
सहज आनंदित हो जाऊँ 

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