रेखाओं में चाँदनी

15-12-2024

रेखाओं में चाँदनी

साक्षी (अंक: 267, दिसंबर द्वितीय, 2024 में प्रकाशित)

 

आज कक्षा में अचानक मैम ने एक रेखाचित्र लिखने का कार्य दिया। अपने किसी भी जान-पहचान वाले, किसी मित्र, शिक्षक, पड़ोसी, घर के सदस्य आदि में से किसी पर भी रेखाचित्र लिखना था और उसका शीर्षक भी लिखना था। यूँ तो बहुत लोग हैं मेरे जीवन में जिन पर लिखा जा सकता है। लेकिन मैं सोचने लगी कि सबसे अधिक मैं किसके बारे में लिखना चाहती हूँ और मेरे सामने एक ही जवाब आया—मेरी छोटी बहन चाँदनी। 

बचपन में जब से मैंने होश सँभाला है, तब से मैं अपनी छोटी बहन को देखती आ रही हूँ। वो छोटी बच्ची काफ़ी शांत एवं शालीन स्वभाव की थी। सुन्दर चेहरा, साँवला रंग, पतली एवं खड़ी नाक, आँखें बड़ी-बड़ी चश्मे वाली और पतले मुलायम होंठ। शारीरिक रूप से वह बहुत पतली थी। उसका वो छोटा शरीर मेरी दोनों बाँहों में आराम से आ जाता था। वो लड़की काफ़ी शांत थी, जितनी शांत वह अंदर से थी वही शान्ति उसके चेहरे पर झलकती थी। उसकी गहरी काली एवं बड़ी आँखें किसी का भी मन मोह लेती थी। बचपन में उसका नाम चाँदनी था और यह नाम बिल्कुल उसके व्यक्तित्व से मिलता था। जिस प्रकार रात में चाँद ठंडा, शांत एवं काफ़ी सुकून देने वाला होता है उसी प्रकार मेरी छोटी बहन भी थी। 

मुझे आज भी वो दिन याद है जब मैं उसे अपने हाथों से नहलाती थी तथा अपनी पसंद के कपड़े उसे रोज़ पहनाती थी। मुझे उसे नहलाकर अलग-अलग तरह के कपड़े पहनाना बहुत अच्छा लगता था। अंत में जब मैं उसके बालों को सुन्दर तरीक़े से तथा डिज़ाइन देकर बनाती थी तो वह एक दम गुड़िया की तरह लगती थी। वह भी मेरे द्वारा तैयार होकर बहुत ख़ुश हुआ करती थी। धीरे-धीरे वो बड़ी होने लगी और स्कूल जाने लगी। मैं तब भी उसका लंचबॉक्स पैक करके दिया करती थी। सोमवार से लेकर शनिवार तक लंच में क्या देना है, मैं उसकी सूची पहले ही बना लिया करती थी। वह भी अलग-अलग तरीक़े के व्यंजन खाकर बहुत ख़ुश होती थी। 

उसके अंदर कभी ग़ुस्सा नहीं था। जब कभी मैं उसे किसी बात के लिए मार भी देती थी तो उसकी वो रोनी सूरत देखकर मुझे अंदर से बहुत बुरा लगता था। वो मेरी हर बात मानती थी। चाँदनी पढ़ने में भी काफ़ी तेज़ थी। घर में सबसे छोटी होने के कारण सभी सदस्य उससे प्यार करते थे। चाँदनी की एक आदत थी जब भी वह स्कूल से घर वापस आती तो मम्मी की चुनरी लेकर उसको अपने गले में डाल लिया करती थी और घर के दरवाज़े के पीछे चॉक से लिखा करती थी और अदृश्य बच्चों को पढ़ाने की एक्टिंग किया करती थी। अपने स्कूल की कॉपी को बच्चों की कॉपी मानकर चैक करने की एक्टिंग किया करती थी। उसका यह अंदाज़ देखने में बहुत मज़ा आता था। 

समय बीतता गया और चाँदनी के नाम से मेल खाता उसका व्यक्तित्व भी धीरे-धीरे ग़ायब होता चला गया। अब उसको सब आयुषी के नाम से पुकारते हैं। उसका अब का व्यक्तित्व उसके बचपन वाले व्यक्तित्व से एकदम भिन्न है। लेकिन मेरी स्मृतियों में वो बचपन वाली चाँदनी अभी तक कहीं न कहीं मौजूद है। 

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