रंगों का दर्शन
लोकोकृष्णा झा
जब प्रकाश ने स्वयं को तोड़ा,
अंधकार ने रंगों को जन्म दिया।
हर तरंग एक विचार बनी,
हर छाया ने एक सत्य कहा।
लाल बोला—मैं नाभिक की अग्नि-सी ज्वाला,
सृजन का साहस, संघर्ष का नारा।
वह ऊर्जा जो जीवन को गति दे,
रक्त बनकर बहती धरा की धारा।
नीला बोला—मैं अनंत का स्थिर विस्तार,
जहाँ मौन में भी गूँजता संसार।
आकाश का शून्य, मन का धैर्य,
उसमें समा जाता हर विचार।
हरा बोला—मैं संतुलन की श्वास है यह,
धरती का विज्ञान, वृक्षों का रहस्य।
प्रकृति का गणित—पुनर्जनन का सूत्र,
हर पत्ती में छिपा है जीवन का युग्म।
पीला बोला—मैं प्रकाश का स्पर्श, चेतना की चमक,
ज्ञान का बीज, ऊर्जा का उत्सव।
जब सोच खिलती है बुद्धि के फूलों में,
तब रँगता है मन पीले स्वप्नों से।
बैंगनी बोला—मैं सीमाओं के उस पार की रोशनी,
जहाँ तरंगें छूती हैं आत्मा का बिंदु।
वह रंग नहीं, एक अनुभव है—
जहाँ विज्ञान और अध्यात्म मिलते हैं सिंधु।
हर रंग एक भाषा है,
जो प्रकाश और दृष्टि के बीच संवाद रचता है।
विज्ञान उसे मापता है,
पर मन उसे महसूस करता है।
क्योंकि रंग केवल देखे नहीं जाते—
वे जिए जाते हैं,
हर धड़कन, हर विचार,
और हर भोर में फिर से जन्म लेते हैं।