ऑपरेशन (प्यार का)

01-06-2026

ऑपरेशन (प्यार का)

आदेश कुमार (अंक: 298, जून प्रथम, 2026 में प्रकाशित)

 

 

“सुनो . . .” शिवम ने कहा।

“हाँ?” सुहानी ने जवाब दिया।

“मैं अभी निकल रहा हूँ,” शिवम ने कुर्सी पर बैठते हुए एक मोज़ा पहना।

“ठीक है, मेरी तो आज छुट्टी है।”

“बाय, बाय, बाय . . .” जल्दी-जल्दी लैपटॉप बैग उठाते हुए वह सुहानी के क़रीब गया, उसे गले लगाया और गाल पर प्यार से चुंबन करके तेज़ी से बाहर निकलने लगा।

सुहानी ने पीछे से आवाज़ दी, “ठीक है, मैं आज घर का काम निपटा लूँगी। शाम को डिनर करने कहीं बाहर चलेंगे . . .”

“सी यू . . .”

“रुको!” सुहानी ने फिर आवाज़ दी और शिवम को दरवाज़े पर ही रोक लिया।

शिवम थोड़ा असहज सा होकर रुका, “अब क्या हुआ?”

वह उसके पास आई, प्यार से उसके गाल पर चुंबन किया और मुस्कुराते हुए बोली, “अब जाओ . . . सी यू . . .”

शिवम जल्दी-जल्दी सीढ़ियाँ उतरता हुआ बिल्डिंग से बाहर निकला और अपने दफ़्तर की ओर बढ़ चला। शिवम ने आई.आई.टी. से कंप्यूटर साइंस में बी.टेक. किया था। इस समय वह एक अच्छी तनख़्वाह पर बहुपक्षीय कंपनी में कार्यरत था। सुहानी एक पाँच सितारा होटल में हाउसकीपिंग मैनेजर थी। आज उसने बिखरे हुए घर को सँवारने के लिए छुट्टी ली थी, इसलिए ऑफ़िस नहीं गई थी। शिवम के जाते ही सुहानी घर के काम में इतनी व्यस्त हो गई, जैसे कोई मज़दूर दिहाड़ी कमाने के लिए सुबह से शाम तक जुट जाता है। उसने अपने कपड़े उठाए और नहाने के लिए बाथरूम की ओर बढ़ी।

बाथरूम का दरवाज़ा खोला ही था कि फोन की घंटी बज उठी। लौटकर स्क्रीन देखी तो केशव का फोन था। केशव उसी होटल के जनरल मैनेजर थे।

‘केशव का फोन, वो भी छुट्टी के दिन?’ मन में उलझते हुए उसने कॉल रिसीव की।

“हैलो,” केशव ने कहा।

“गुड मॉर्निंग, सर,” सुहानी ने जवाब दिया।

“सॉरी, छुट्टी के दिन डिस्टर्ब करने के लिए।”

“कोई बात नहीं, सर। बताइए, कैसे याद किया?”

“रूम नंबर 503 में जो कपल ठहरा था, उनकी इम्पोर्टेड वॉच रूम में ही रह गई है। वे अभी लौटे हैं और पूछ रहे हैं। क्या किसी स्टाफ़ ने तुम्हें इस बारे में बताया?”

“नहीं, सर। किसी ने मुझे कुछ नहीं बताया।”

“अच्छा!”

“और सर, वॉच छूटने की बात है तो उन्हें ध्यान से याद नहीं होगा। जब वे चेक-आउट कर रहे थे, मैं खुद हाउसकीपिंग के साथ उनके रूम में गई थी।”

“ओके, मैं उन्हें बता देता हूँ।”

“सर, अगर आपको मेरी बात पर यक़ीन न हो, तो आप कॉरिडोर की सीसीटीवी फुटेज चेक कर सकते हैं।”

“अरे नहीं यार . . .”

“नहीं, सर। मैं और हाउसकीपिंग वाला स्टाफ़, दोनों ही उस कपल के साथ रूम से निकले थे। आप चेक कर सकते हैं।”

“मुझे तुम पर भरोसा है, सुहानी। ऐसी बातें क्यों कर रही हो?”

“ठीक है सर, मैं रखती हूँ। मुझे शॉवर लेना है।”

“ओह! शॉवर . . . शिवम कहाँ हैं?”

“वो तो सर, ड्यूटी पर गए हैं।”

“तो क्या अकेली ही शॉवर लोगी?”

“आप कहना क्या चाहते हैं, सर?”

“कुछ नहीं . . . सॉरी,” केशव हकलाते हुए बोले।

सुहानी ने फोन काटकर चार्जिंग पर लगा दिया और नहाने के लिए बाथरूम में चली गई। शॉवर लेते हुए उसके मन में विचार घूमने लगे—केशव सर ने पहले कभी ऐसी बात नहीं की थी। आज इतना झिझकते हुए क्यों बात कर रहे थे? ‘कल ऑफ़िस जाऊँगी, तो सीधे बात करूँगी,’ उसने सोचा।

केशव होटल के ऑफ़िस की बालकनी में खड़ा था। फोन कटते ही उसके दिमाग़ में सवाल घूमने लगे—क्या सुहानी कल इस पर कुछ बोलेगी? अगर बोली, तो उसका रवैया कैसा होगा? होटल का स्टाफ़ उसके बारे में क्या सोचेगा? बाहर ठंडी हवा काँप उठने वाली चल रही थी, पर केशव का माथा पसीने से तर था। कल के बारे में सोचते ही उसकी धड़कनें तेज़ हो गई थीं।

‘मैं कल उससे स्पष्ट कर दूँगा कि मैंने अचानक बोल दिया था, सुहानी। मेरा तुम्हारे प्रति कोई ग़लत इरादा नहीं था।’

सुहानी दिन भर घर के कामों में उलझी रही, पर मन में बार-बार वही सवाल घूमता रहा—केशव सर ने अचानक ऐसा क्यों कहा? फिर भी, उसका मन अब शांत था। सुहानी ने शिवम के साथ ही एम.बी.ए. किया था, जबकि उसने अपनी अंडरग्रैजुएट डिग्री बी.एच.एम. में पूरी की थी। दोनों की पहली मुलाक़ात कॉलेज कैंटीन में कॉफ़ी पीते हुए हुई थी। केशव जानते थे कि सुहानी और शिवम दोनों अपने परिवार से दूर रह रहे हैं। शायद इसीलिए उन्होंने वैसा कह दिया था। ‘पर मैं इस बारे में क्यों सोच रही हूँ?’ सुहानी ने मन ही मन सोचा और ध्यान केशव से हटाकर फिर से घर के काम में जुट गई। शिवम के लौटने का समय अब बस कुछ ही पल दूर था।

तभी, थोड़ी देर बाद शिवम का फोन आया।

“हैलो सुहानी, क्या कर रही हो?” शिवम ने फोन पर पूछा।

“कुछ नहीं, बस अभी फ़्री हुई हूँ।”

“आज मुझे आने में देर होगी। तुम खाना खा लेना और मेरा इंतज़ार मत करना।”

“ठीक है, लेकिन फिर भी कितनी देर?”

“पता नहीं, शायद ग्यारह-बारह बज जाएँ। प्रेज़ेंटेशन तैयार करके बॉस को अभी देनी है।”

“ठीक है, बाय।”

फोन कट गया। सुहानी बेडरूम में गई और बिस्तर पर लेटकर अपना फोन चलाने लगी। स्क्रीन स्क्रोल करते-करते उसकी नज़र एक पुरानी तस्वीर पर ठहर गई। पाँच साल पहले, एम.बी.ए. के कॉलेज की कैंटीन में संध्या और वह अलग-अलग टेबलों पर बैठकर कॉफ़ी पी रही थीं। दरअसल, सुहानी ने अपनी सेल्फ़ी ली थी, जिसमें संध्या भी फ़्रेम में आ गई थी।

♦ ♦

तस्वीर को देखते ही सुहानी कॉलेज के दिनों की यादों में खो गई। संध्या से हुई पहली मुलाक़ात उसकी आँखों के सामने तैरने लगी, मानों कल ही की बात हो।

उस दिन कॉलेज में एच.आर. विभाग के प्रोफ़ेसर नहीं आए थे, इसलिए सुहानी कैंटीन की ओर चल दी। कॉलेज का पाँचवाँ दिन था। सभी छात्रों की सीटें कन्फ़र्म हो चुकी थीं, पर अभी कक्षाएँ शुरू नहीं हुई थीं।

“भैया, एक कॉफ़ी विद लो शुगर,” सुहानी ने कहा।

“जी मैडम, लाता हूँ। थोड़ा इंतज़ार करना पड़ेगा, पहले मैं आपके बग़ल वाली टेबल पर बैठी मैडम की ब्लैक कॉफ़ी बना रहा हूँ।”

“ठीक है, भैया। बहुत जल्दी करना, बीस मिनट बाद मेरी क्लास है।”

“जी मैडम।”

ऑर्डर देकर सुहानी ने बग़ल में बैठी लड़की की ओर देखा। वह भी उसकी ओर देखकर मुस्कुरा रही थी। सुहानी ने जवाब में हल्की सी मुस्कान बिखेर दी। जब उसकी कॉफ़ी आई, तो उसने अपनी पहली कॉलेज कॉफ़ी के साथ एक सेल्फ़ी खींच ली।

कॉफ़ी ख़त्म करके सुहानी तेज़ी से कक्षा की ओर बढ़ी। जैसे ही वह कमरे में दाख़िल हुई, उसने देखा कि सामने वाली सीट पर वही कैंटीन वाली लड़की बैठी है। चेहरे पर वही मृदु मुस्कान। प्रोफ़ेसर को आने में अभी पाँच मिनट बाकी थे। सुहानी ने उस लड़की से कहा, “हाय।”

“हैलो,” उसने जवाब दिया।

“तुम यहाँ?”

“हाँ, मेरा एडमिशन तो पहले ही हो गया था, पर आज पहली बार क्लास में आई हूँ।”

“तुम्हारा नाम?”

“संध्या।”

“और मैं सुहानी।”

कक्षा के बाद सुहानी ने संध्या को ‘बाय’ कहा और अपने हॉस्टल की ओर बढ़ी।

“रुको, कावेरी हॉस्टल?” संध्या ने पीछे से आवाज़ दी।
“हाँ, सामने।”

“कमरा नंबर 345?”

“क्या?”

“कावेरी 345 . . .”

“वह तो मेरे कमरे का नंबर है। लेकिन तुम क्यों पूछ रही हो? अभी तो उसमें केवल मैं ही रहती हूँ।”

“तुम्हारा?”

“हाँ . . .”

“मुझे भी वही अलॉट हुआ है।”

“ओह! तो तुम मेरी रूममेट हो . . .” सुहानी ने राहत की साँस ली। “चलो।”

“मुझे अपना सामान भी लाना है।”

“पहले कमरा देख लो, फिर दोनों साथ चलेंगे।”

उस दिन दोनों ने पढ़ाई छोड़कर सामान व्यवस्थित किया। संध्या का बर्ताव अत्यंत स्नेहिल था, क्योंकि सुहानी की सादगी और चंद्रमा जैसी शीतल चमक ने उसे मोह लिया था। सुहानी अपना बाईसवाँ वर्ष शुरू कर रही थी। उसका मनमोहक चेहरा, सुडौल गठन और शांत व्यक्तित्व ऐसा था कि कोई भी नज़रें हटा न पाए। संध्या के साथ भी यही हुआ। पहली ही नज़र में वह सुहानी की ओर खिंची चली आई थी। मन ही मन वह चाहती थी कि उसका हॉस्टल सुहानी के साथ ही हो। उसे क्या पता था कि क़िस्मत ने यह इच्छा पहले ही पूरी कर दी थी।

धीरे-धीरे समय बीता। साथ रहते-रहते उनकी मित्रता गहरी होती गई।

♦ ♦

सुहानी इन यादों में इतनी लीन हो गई कि शिवम ने चार बार दरवाज़े की घंटी बजाई, पर उसे पता ही नहीं चला।

अचानक फोन की घंटी बजी।

“सुहानी, तुम कहाँ हो? मैं चार बार डोरबेल बजा चुका हूँ।”

“ओह! सॉरी, आती हूँ . . .” सुहानी उठी और दरवाज़ा खोला।

“सॉरी वन्स अगेन, जानू।”

“इट्स ओके। बहुत भूख लगी है, खाना ले आओ।”

“ठीक है, लाती हूँ। तुम तब तक फ़्रेश हो जाओ।”

“ठीक है,” शिवम ने प्यार से उसके गाल पर चुंबन किया।

दोनों ने रात का भोजन किया और सो गए। अगली सुबह वे जल्दी-जल्दी तैयार होकर अपने-अपने काम के लिए निकल गए।

होटल पहुँचते ही सुहानी ने केशव से कहा, “गुड मॉर्निंग, सर। उस वॉच का क्या हुआ, सर?”

“कौन-सी वॉच?”

“जिसके लिए आपने मुझे फोन किया था।”

केशव के चारों ओर स्टाफ़ के सदस्य खड़े थे। वे सुहानी को इस प्रश्न पर असमंजस की मुद्रा में देख रहे थे। केशव ने तुरंत बात बदलते हुए कहा, “नीचे पार्टी हॉल में शाम को एक बड़ी पार्टी है। पूरा मैनेजमेंट तुम्हें ही देखना है। तुम मेरे केबिन में आओ, उसके बारे में चर्चा करनी है।”

सुहानी और केशव केबिन की ओर बढ़े। दरवाज़ा बंद करते ही केशव ने कहा, “कोई वॉच ग़ायब नहीं हुई थी, सुहानी।”

“क्या?”

“हाँ। इसलिए मैंने स्टाफ़ के सामने इस बारे में बात नहीं की।”

“थैंक गॉड . . . मैं तो डर ही गई थी, सर।”

“कल ‘शॉवर’ वाली बात के लिए फिर से सॉरी।”

“कोई बात नहीं, सर। अच्छा . . . तो मैं चलती हूँ। शाम की पार्टी व्यवस्थित करनी है।”

“रुको! दरअसल मुझे तुमसे कुछ कहना है।”

“क्या, सर?”

“कृपया बुरा मत मानना।”

“वह तो बात पर निर्भर करता है, सर।”

केशव के मुँह से शब्द ही नहीं निकल पा रहे थे। उसकी ज़ुबान लड़खड़ा रही थी। माथा पसीने से तर था और धड़कनें तेज़ हो गई थीं। होंठ घबराहट से काँप रहे थे, गला सूख चुका था। उसने बड़ी कठिनाई से कहा, “सुहानी, मैं तुम्हें पसंद करने लगा हूँ। मैं तुमसे शादी करना चाहता हूँ।”

“यह क्या कह रहे हैं, सर?”

“मैंने बड़ी हिम्मत जुटाई है, सुहानी। प्लीज़ . . .”

“नहीं, सर। यह संभव नहीं है . . .”

सुहानी तेज़ी से केबिन से बाहर निकली और पार्टी की तैयारियों में व्यस्त हो गई। किंतु न जाने क्यों, केशव के शब्द बार-बार उसके कानों में गूँज रहे थे। उसकी आँखों के सामने केशव का चेहरा घूमता रहा। वह मन लगाकर काम करना चाहती थी, पर दिमाग़ से वे बातें हट ही नहीं रही थीं।

शिफ़्ट ख़त्म होते ही शिवम होटल के पार्किंग एरिया में उसका इंतज़ार कर रहा था। सुहानी आई, तो दोनों घर की ओर चल दिए। रास्ते में आज उसने शिवम से वैसा व्यवहार नहीं किया जैसा वह हमेशा करती थी।

“क्या हुआ?” शिवम ने पूछा।

“कुछ नहीं।”

“इतनी शांत क्यों हो?”

“ऐसे ही, तबीयत ठीक नहीं लग रही।”

“ठीक है, सीधे डॉक्टर के पास चलते हैं। घर बाद में जाएँगे।”

“नहीं, उसकी कोई ज़रूरत नहीं है। प्लीज़।”

“ठीक है।”

घर पहुँचकर सुहानी केवल यही सोचती रही कि आख़िर केशव चाहते क्या हैं? क्या सच में शादी? क्या यह उचित है? क्या वह शिवम को छोड़ देगी? इसी जद्दोजहद में वह कब सो गई, पता ही नहीं चला। शिवम ने आज उसे नहीं जगाया और चुपचाप सो गया।

क़रीब पैंतीस दिन ऐसे ही बीत गए। सुहानी के व्यवहार में स्पष्ट बदलाव आ चुका था। वह शिवम पर कम ध्यान दे रही थी, और शिवम यह भाँप चुका था। समय बीतता गया।

लगभग पैंतीस दिन बाद सुहानी केशव के केबिन में गई और सीधे बोली, “आपको ऐसा क्यों लगा कि मैं आपसे शादी के लिए हाँ कर दूँगी? आपको अच्छी तरह पता है कि मैं शिवम के साथ रिलेशनशिप में हूँ।”

“सुहानी . . . मैंने तुम्हें आज़माने के लिए प्रपोज़ नहीं किया है। मैं सच में तुमसे प्यार करने लगा हूँ।”

“सर, लेकिन आपको इस बात का डर नहीं था कि अगर मैंने शिवम को बता दिया तो क्या होगा?”

“मैंने तुमसे मोहब्बत की है। मुझे केवल तुम्हारी राय से फ़र्क़ पड़ता है। बाद में मेरा क्या होगा . . . उससे मुझे कोई मतलब नहीं।”

“कब से, सर?”

“जबसे तुम्हें पहली बार देखा, तब से।”

“क्या, सर? खड़े-खड़े ही बात करेंगे? बैठने के लिए भी नहीं कहेंगे?”

“ओह! सॉरी, बैठो सुहानी।”

“और मेरी कॉफ़ी? जो उस दिन पी नहीं पाई थी।”

“अरे हाँ, अभी मँगवाता हूँ।”

“केशव, जिस दिन से तुमने . . . सॉरी, सर। जबसे आपने प्रपोज़ किया है, तब से मैं सोच में पड़ी हूँ। न खाने में मन लगता है, न सोने में। समझ में नहीं आ रहा कि मैं क्या करूँ?”

“अरे, तुम फ़ॉर्मैलिटी क्यों कर रही हो? तुम मुझे केशव कह सकती हो।”

“ठीक है, केशव। हाँ, मैं भी तुमसे शादी करने के लिए तैयार हूँ।”

केशव की ख़ुशी का ठिकाना न रहा। वह चेयर से उठा और सुहानी की ओर बढ़ा। सुहानी भी खड़ी हो गई। केशव ने उसे गले लगा लिया। उसके शरीर में जैसे करंट दौड़ गया। आज जैसा एहसास उसे शिवम के साथ कभी नहीं हुआ था। उसका दिल तेज़ी से धड़क रहा था। होंठ न जाने कब केशव के होंठों से टकराए, दोनों को पता ही नहीं चला। वे एक गहन आलिंगन में लीन थे कि अचानक केबिन का दरवाज़ा खुलने की आवाज़ आई। वेटर रामू पहले तो ठिठका, फिर बोला, “सर, कॉफ़ी।”

दोनों हड़बड़ी में अलग हुए और अपनी-अपनी कुर्सी पर बैठ गए।

“रामू, तुमने यहाँ कुछ नहीं देखा . . . समझे?” केशव ने कहा।

“ठीक है, सर।”

उस दिन के बाद दोनों का प्रेम परवान चढ़ने लगा। दिन और महीने बीतते गए। सुहानी केशव के क़रीब और शिवम से दूर होती चली गई। केशव और उसके बीच वह सब होने लगा जो आमतौर पर विवाह के बाद होता है, सिवाय एक छत के नीचे रहने के। उधर शिवम उसके बदले व्यवहार को समझ नहीं पा रहा था।

कुछ दिन बाद शिवम ने प्यार से सुहानी का हाथ थामते हुए पूछा, “क्या हुआ? आज-कल मेरे पास आती ही नहीं हो।”

“छोड़ो शिवम, अब मेरा मन नहीं करता।”

“मुझे . . . गले लगाने का मन नहीं करता? पर क्यों?”

“बस ऐसे ही। मुझे शॉवर लेने जाना है, छोड़ो।”

शिवम ने उसे छोड़ दिया। वह बाथरूम में चली गई। शिवम चुपके से उसका फोन देखने लगा, तो पैरों तले की ज़मीन खिसक गई। यह क्या! केशव और सुहानी की व्हाट्सएप चैट में वह सब लिखा था, जिसकी कल्पना शिवम भी नहीं कर सकता था। वह जहाँ था, वहीं फ़र्श पर बैठ गया। विश्वास ही नहीं हो रहा था कि यह कैसे संभव है।

सुहानी शॉवर से बाहर आई तो शिवम का चेहरा देखते ही भाँप गई कि यहाँ क्या हुआ है।

“तुम केशव से प्यार करती हो?” शिवम ने पूछा।

“नहीं . . .” सुहानी की ज़ुबान लड़खड़ाई।

“सच बताओ?” शिवम का लहजा कड़क हो गया।

“क्यों? क्या हुआ? तुम ऐसा क्यों पूछ रहे हो?”

“मैंने तुम्हारी और केशव की व्हाट्सएप चैट देखी है।”

“देखो शिवम, ट्राई टू अंडरस्टैंड . . . मैं तुमसे कुछ भी छुपाना नहीं चाहती थी। बस सही वक़्त का इंतज़ार कर रही थी।”

“सुहानी, तुम ऐसा कैसे कर सकती हो? तुम मुझे कैसे छोड़ सकती हो? पाँच साल से हम रिलेशनशिप में हैं . . .” शिवम की आँखों से आँसू बह निकले।

“शिवम, तुम समझ नहीं रहे हो। इन्फ़ेक्ट, मैं समझ नहीं पा रही हूँ। मुझे माँ बनना है, जो तुम्हारे साथ रहकर संभव नहीं है। बताओ! क्या तुम मुझे बच्चा दे सकती हो? मुझे परिवार बसाना है, संध्या उर्फ़ शिवम! बोलो, कर सकती हो? तुम क्या बोलोगी . . . मैं ही बताती हूँ,” सुहानी रोते हुए बोली।

“सुहानी, तुम मेरी दुनिया हो। मैं तुम्हारे बिना जी नहीं पाऊँगा, मर जाऊँगा। तुम्हारे प्यार की ख़ातिर मैंने अपना घर, रिश्ते-नाते, यहाँ तक कि अपनी पहचान भी क़ुर्बान कर दी है . . .”

“संध्या, तुम समझो। मैं अब तुम्हारे साथ नहीं रह पाऊँगी। मैं केशव से बहुत प्यार करती हूँ, और वह भी मुझसे उतना ही प्यार करता है।”

शिवम रोते-रोते घुटनों के बल गिर पड़ा और सिसकियों के साथ बोला, “मेरी ज़िंदगी तुम्हारे बिना अधूरी है। मैं तुम्हारे बिना जीवन की कल्पना भी नहीं कर सकता। प्लीज़, मैं तुम्हारे आगे हाथ जोड़ता हूँ, पैर पकड़ता हूँ। मुझे ऐसे मत छोड़ो। तुम्हारे बिना मैं कहीं का नहीं रहूँगा।”

सुहानी ने पहले ही केशव को कॉल कर दिया था। “केशव, मैं अब शिवम के साथ और नहीं रह सकती। उसे हमारे बारे में सब पता चल गया है। मैं अपना सामान पैक करके अभी तुम्हारे पास आ रही हूँ,” उसने फोन पर कहा और बैग भरने लगी।

“मैं अपना जीवन कैसे बिताऊँगा, सुहानी? तुम अच्छी तरह जानती हो। अगर तुम नहीं, तो मैं किसी लायक़ नहीं रह गया हूँ,” शिवम ने कराहते हुए कहा।

“मैं भी यही कह रही हूँ, संध्या। तुम्हारा और मेरा कोई भविष्य नहीं है।”

“तुम्हारे लिए ही तो मैंने लिंग परिवर्तन ऑपरेशन कराया है! संध्या से शिवम बना हूँ, और अब तुम ही मुझे छोड़ रही हो।”

“संध्या, मैंने तुम्हें न ऑपरेशन के लिए फ़ोर्स किया, न उकसाया। यह तुम्हारा निजी फ़ैसला था। तुमने मुझसे पूछना तक उचित नहीं समझा। मेरे घर से लौटने के बाद सरप्राइज़ दिया था। मेरे परिवार को आज तक तुम्हारे ऑपरेशन के बारे में पता ही नहीं है। मैं अपने परिवार को कैसे बताती कि जिससे मैं प्यार करती थी, वह लड़का नहीं, बल्कि एक लड़की है?

“बोलो?” सुहानी ने पूछा।

संध्या उर्फ़ शिवम रोता रहा और फ़र्श पर गिर पड़ा।

सुहानी अपना बैग पैक कर चुकी थी। उसने सामान उठाया और दरवाज़े की ओर बढ़ी। घर से बाहर निकलते ही उसने दरवाज़ा बंद किया और केशव के साथ कैब में बैठकर उसके फ़्लैट की ओर चल दी।

फ़र्श पर पड़ा शिवम—जो कभी संध्या थी—सिसकियाँ भरी आवाज़ में बार-बार पुकारता रहा, “सुहानी . . . रुको . . . सुहानी . . .”

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