ओ पागल
आशीष सिंह ‘अद्वैत’
(तांटक छंद)
प्रेम करके तुमसे मैं तो, दिखता हूँ कितना मैं विकल
बहती हो तुम तो नदी सी, मैं तो हूँ उसका ही कल कल
आज ही अंतिम देखना दिखना, और नहीं है कुछ भी कल
कहते है सब कौन करेगा, तुझसे मुहब्बत ओ पागल।1।
कहते हैं दुनिया के नज़ारे, प्रेम करोगे किसके सहारे
कुछ न तुममें ख़ूबी है अब, कुछ है अब न पास तुम्हारे
वो जब भी मुझको है देखती, प्रेम भाव न आता इक पल
वो भी कहती मैं न करूँगी, तुझसे मुहब्बत ओ पागल।2।
वो भी देखके मुझसे बोले, देखो तुम अपने तन को
तन की दुर्बलता तो देखो, कुछ तो सुधारो आनन को
तुमसे डरते होंगे बालक, देख न पाते तुमको इक पल
वो भी कहते कौन करेगा, तुमसे मुहब्बत ओ पागल।3।
मित्रों की उपमाओं में तो, पागलों का राजा हूँ मैं
जो भी आए इस जीवन में, हर उसका बाजा हूँ मैं
तिल-तिल कर मारता हूँ ख़ुद में, मर-मर कर जीता पल-पल
वो भी बोले कौन करेगा, तुझसे मुहब्बत ओ पागल।4।
मैं उससे जा पूछ पड़ा ये, क्या बस प्रेम है तन से
वो बोली आत्मा का मेल है, आरम्भ होता हैं आनन से
जब तुम दिखने में ऐसे हो, अंदर तो होगी हलचल
मन रो बोले कौन करेगा, तुझसे मुहब्बत ओ पागल।5।
आशा:
काश कोई पगली तो आए, थामे इस पागल का हाथ
कुछ पल कुछ घड़ी ही नहीं, वो जो दे जीवन भर साथ
मुझको न तौले वो वैसे, और न बनाए मन में दल दल
वो बस कहे कि मैं ही करूँगी, तुझसे मुहब्बत ओ पागल।6।
स्त्री पक्ष:
तू अपना मन भी भर लेना, मुझको भी संतुष्टि देना
देह हवाले करती हूँ मैं, प्राण मुझे तू अपने देना
देह की संतुष्टि माया है, संतुष्टि प्रेम का बादल
संतुष्टि के बादल छँट जाये, अम्बर सा प्रेम करो पागल॥7॥