मनुष्य गढ़े जाते हैं
अकांक्षा पाण्डेय
कौन जन्मता है पाप लिए?
कौन पुण्यों का भार उठाता है?
धरती पर आने वाला हर मानव
बस एक निष्कलुष प्रभात कहलाता है।
निष्कलुष मन, निष्पाप नयन,
न कोई वैर, न कोई दाह;
मुट्ठी भर साँसें लेकर आता,
मुट्ठी भर उजियारा साथ।
फिर समय सँवारे, समय बिगाड़े,
क्षण-क्षण नया विधान लिखे;
जैसी छाया मिले धरा पर,
वैसा ही इंसान दिखे।
स्नेह मिले तो सरिता बनकर
शीतलता का गीत बहे;
घृणा मिले तो वहीं सलिल भी
प्रलय बनाकर तट ढहे।
दोष न केवल नाव का होता,
दोष न केवल धार का;
कभी किनारे भी रच देते
भाग्य किसी मझधार का।
जब इतिहास लिखा जाता है,
नाम मनुष्य का रह जाता है;
पर पृष्ठों के मौन किनारों पर
समय ही अपराधी कहलाता है।
3 टिप्पणियाँ
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9 Sep, 2026 11:35 PM
कविता बहुत ही बेहद ढंग से मनुष्य से मनुष्य के गढ़े जानो को व्यक्त करता है।
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1 Sep, 2026 10:30 PM
“यह कविता मनुष्य के भीतर उतरकर उसे देखने की दृष्टि देती है। कोई भी इंसान जन्म से अच्छा या बुरा नहीं होता—उसे समय, संस्कार, परिस्थितियाँ और अपने आसपास का व्यवहार धीरे-धीरे गढ़ते हैं। ‘मनुष्य गढ़े जाते हैं’ की हर पंक्ति जैसे हमारे भीतर एक सवाल छोड़ जाती है कि किसी व्यक्ति के कर्मों का मूल्यांकन करने से पहले क्या हमने उसके निर्माण की कहानी समझी है? कविता की सबसे मार्मिक बात यही है कि जहाँ हम अपराधी के रूप में मनुष्य को देखते हैं, वहाँ कवयित्री हमें समय, परिवेश और समाज की उन अदृश्य उँगलियों को पहचानने के लिए प्रेरित करती हैं, जो मनुष्य का व्यक्तित्व रचती हैं। अत्यंत संवेदनशील, मानवीय और देर तक मन में गूँजने वाली रचना।”
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1 Sep, 2026 05:22 PM
बहुत ही सुंदर भाव है बहुत गहरी और सच्ची सोच है