मनुष्य गढ़े जाते हैं

01-09-2026

मनुष्य गढ़े जाते हैं

अकांक्षा पाण्डेय (अंक: 301, सितम्बर प्रथम, 2026 में प्रकाशित)

 

कौन जन्मता है पाप लिए? 
कौन पुण्यों का भार उठाता है? 
धरती पर आने वाला हर मानव
बस एक निष्कलुष प्रभात कहलाता है। 
निष्कलुष मन, निष्पाप नयन, 
न कोई वैर, न कोई दाह; 
मुट्ठी भर साँसें लेकर आता, 
मुट्ठी भर उजियारा साथ। 
फिर समय सँवारे, समय बिगाड़े, 
क्षण-क्षण नया विधान लिखे; 
जैसी छाया मिले धरा पर, 
वैसा ही इंसान दिखे। 
स्नेह मिले तो सरिता बनकर
शीतलता का गीत बहे; 
घृणा मिले तो वहीं सलिल भी
प्रलय बनाकर तट ढहे। 
दोष न केवल नाव का होता, 
दोष न केवल धार का; 
कभी किनारे भी रच देते
भाग्य किसी मझधार का। 
जब इतिहास लिखा जाता है, 
नाम मनुष्य का रह जाता है; 
पर पृष्ठों के मौन किनारों पर
समय ही अपराधी कहलाता है। 

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