मन आशा के दीप . . .
इंजी. अरुण कुमार जैन
(ज्योति पर्व दीपावली पर)
आओ मन का तिमिर हटाएँ,
नेह, प्रेम के दीप जलाएँ।
अधरों पर लाकर मुस्कानें,
सबके मन की पीर मिटाएँ।
आओ मन का . . .
नहीं जहाँ पर ज्योति किरण हैं,
अवसादों के मेघ सघन हैं,
पल पल जीवन त्रासद, शापित,
मन आशा के दीप जलाएँ।
आओ मन का . . .
अहं, दर्प से भरे हुए हैं,
स्वयं को ईश्वर समझ लिए हैं
प्रतिपल करते महा प्रलय जो
जीवन का सच उन्हें बतायें।
आओ मन का . . .
राम, वीर प्रभु, दयानन्द जी,
स्मृतियाँ मन पावन करतीं,
उनके पदचिन्हों पर चलकर,
इसी धरा को स्वर्ग बनायें।
आओ मन का . . .