मैं अगर अपने ही बचपन में जाना चाहती

15-09-2026

मैं अगर अपने ही बचपन में जाना चाहती

अनुपमा आर्य  (अंक: 302, सितम्बर द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)

 

मैं अगर अपने ही बचपन में जाना चाहती, 
कुछ पल चुरा के लाना चाहती। 
 
तो मैं . . . 
 
उन गलियों में बेधड़क घूमना चाहती, 
जहाँ माँ दरवाज़े पर खड़ी होकर
मेरा नाम पुकारती आए। 
 
जहाँ पिता के बैग के चारों तरफ़
हम सबका घेरा हो, 
और एक ही सवाल—
“आज बैग में क्या आया है?” 
 
जहाँ दोस्तों के साथ
आधी कमीज़ अन्दर, आधी बाहर निकली हुई, 
स्कूल की घंटी के बाद
घर तक रेस लगानी हो। 
 
जहाँ घर के फ़्रिज में रखी
आधी बची हुई आइसक्रीम
कटोरी से चुरा लेनी हो, 
और चम्मच छिपाकर
ऐसी भोली-सी शक्ल बनानी हो
जैसे कुछ हुआ ही न हो। 
 
जहाँ मम्मी के साथ
हर जगह जाने की ज़िद हो, 
और बड़ी बहनों की शरारतें
पापा से जाकर बतानी हो। 
 
जहाँ हर चीज़ पहली बार मिली हो—
नई साइकिल के पहिए, 
नया खिलौना, 
और उसे रात में भी
तकिए के पास रखकर सोना हो। 
 
जहाँ किचन से आती आवाज़ों के बीच
बर्तनों की खनक हो, 
मम्मी की आवाज़ हो, 
और हमारी हँसी
पूरे घर में घूमती हो। 
 
जहाँ सुबह देर से उठकर
बिखरे बालों के साथ
मम्मी के सामने खड़े होना हो, 
और डाँट शुरू होने से पहले ही
जवाब तैयार हो। 
 
जहाँ इतवार को
बाहर जाने की बात पर
सुबह से ही कपड़े निकालकर
दरवाज़े के पास रख दिए जाएँ। 
 
जहाँ पापा का मिज़ाज देखे बिना
उनके पास जाकर बैठ जाना हो, 
और उनकी जेब से
टॉफ़ी निकलने का इंतज़ार करना हो। 
 
जहाँ रास्तों पर
हमारी छोड़ी हुई निशानियाँ हों, 
किसी पेड़ पर खरोंच, 
किसी दीवार पर नाम, 
और घर का पता पूछने पर
बस नाम बता देना काफ़ी हो। 
 
जहाँ कपड़ों पर
धूल-मिट्टी के निशान हों, 
घुटनों पर छोटी-सी खरोंच हो, 
और फिर भी
घर लौटने की कोई जल्दी न हो। 
 
जहाँ पेड़ों पर
हमारा बचपन झूलता हो, 
गर्दन से दुपट्टा बाँधकर
छत से उड़ने की कोशिश हो। 
 
जहाँ हाथ की घड़ी
किसी दराज़ में पड़ी रह जाए, 
और समय का पता
माँ की आवाज़ से चले। 
 
जहाँ एल्बम खोलते ही
एक तस्वीर में
हम सब फिर से छोटे हो जाएँ। 
 
मैं जाना चाहूँगी ऐसे बचपन में, 
जहाँ शाम जल्दी न ढले, 
जहाँ बड़े होने की
कोई जल्दी न हो। 
 
जो कुछ पल के लिए ही सही, 
पर पूरा का पूरा
मेरा हो। 

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