महाभिनिष्क्रमण
डॉ. हंसराज
ईसा पूर्व पाँच सौ तिरसठ,
वर्ष था मंगलकारी।
लुम्बिनी वन जन्मा एक बालक,
महामाया महतारी॥
शाक्य वंश का दीपक था वह,
मानवता का उजियारा।
जग को उसने राह दिखाई,
धम्ममार्ग था प्यारा॥
रोहिणी के शीतल जल पर,
जब छिड़ा भयंकर युद्ध।
तब सिद्धार्थ का प्रश्न था उनसे,
जो सभा में थे प्रबुद्ध॥
रोहिणी के पावन जल पर तो,
सबका ही अधिकार है।
शान्ति के पावन आँगन में,
यह प्रकृति का उपहार है॥
नदियों के बहते पानी से,
सबको ही जीवन मिलता है।
बहते पानी की क़ीमत,
क्या मानव का जीवन होता है॥
तब शाक्य सभा ने मति खोई,
सिद्धार्थ को किया बेचारा था।
शान्ति बड़ी है शस्त्रों से,
पर सत्य वहाँ फिर हारा था॥
तब कपिलवस्तु की राजसभा में,
मर्यादा का प्रश्न उठा।
है शाक्य वंश की गौरव गाथा,
हर शाक्य नियम पर रहा अड़ा॥
दण्ड मिला तब राजकुमार को,
शाक्य सभा ने लिया संकल्प।
युद्ध, फाँसी या देश निकाला,
सम्मुख थे बस तीन विकल्प॥
मानवता की रक्षा ख़ातिर,
चुना स्वयं का त्याग।
छोड़ दिया सब राजपाट,
जब मन में उठा वैराग॥
बढ़ गया अश्व-कंथक गति से,
छोड़ी कपिलवस्तु की गलियाँ।
उर में करुणा का सागर,
घर मेरा जंगल और नदियाँ॥
पहुँचे पावन स्थल पर,
जिसे आज कोपिया कहते हैं।
त्यागे वस्त्र राजसी सब,
जहाँ नाले नदियाँ बहते हैं॥
परिजन छोड़े, राज भी त्यागा,
काटे सुन्दर केश।
मानव के कल्याण की ख़ातिर,
धरा संन्यासी वेश॥
राजाओं के वस्त्र छोड़,
धरा भगवा वेश महान।
‘महाभिनिष्क्रमण’ कर बने बुद्ध,
जगत के ज्ञान निधान॥