काव्य का विश्लेषणात्मक अध्ययन: डॉ. नरेश सिहाग
पूजा गुलिया
साहित्य को पढ़कर हम विभिन्न प्रकार की अनुभूतियों का आभास करते हैं। साहित्य समाज के दर्पण की भाँति होता है और कविता उस दर्पण की सबसे संवेदनशील अभिव्यक्ति है। कविता में यथार्थ और संवेदना का मेल उसे समाज से जोड़ता है और एक प्रभावशाली संदेशवाहक बनाता है। इस शोध आलेख में हम डॉक्टर नरेश सिहाग की काव्य दृष्टि से परिचित होने की कोशिश करेंगे। डॉ. नरेश सिहाग समकालीन हिंदी काव्य के प्रमुख हस्ताक्षरों में से एक हैं, जिनकी कविताएँ सामाजिक, सांस्कृतिक और व्यक्तिगत जीवन के यथार्थ को उकेरने के साथ-साथ मानवीय संवेदनाओं की गहरी छाप छोड़ती हैं। उनकी काव्य दृष्टि में यथार्थवादी दृष्टिकोण और गहरी संवेदनशीलता का अनूठा संगम देखने को मिलता है। यह शोध आलेख डॉ. नरेश सिहाग की कविताओं में निहित यथार्थ और संवेदना के तत्वों का विश्लेषण करेगा तथा उनकी काव्य दृष्टि को व्यापक रूप से समझने का प्रयास करेगा।
डॉ. नरेश सिहाग ने अपने काव्य सृजन के माध्यम से समाज की विविध समस्याओं, मानवीय संवेदनाओं, प्रेम, करुणा, संघर्ष और जीवन के मूलभूत प्रश्नों को गहराई से प्रस्तुत किया है। उनके काव्य में समकालीन यथार्थ का प्रतिबिंब स्पष्ट रूप से देखने को मिलता है। वे न केवल समाज के अंधकारपूर्ण पक्षों को उजागर करते हैं, बल्कि उनकी कविताएँ आशा, बदलाव और नवचेतना का भी संचार करती हैं। इनकी लेखनी केवल पुरानी परंपराओं पर ही नहीं किन्तु आज के नए युवा समाज पर भी टिप्पणी प्रस्तुत करती है। उनके काव्य संग्रह ख़्वाहिशें से आज का युवा कविता को अगर देखा जाए तो वह सब में एक नया जोश उत्पन्न करती है, जिसकी पंक्तियाँ इस प्रकार हैं:
“युवा जोश से भरपूर आगे बढ़ने का जुनून
सपनों की उड़ान उसकी बजे भविष्य की दिशा उनकी
संकटों का सामना करें मज़बूती के साथ में
ख़ुद को साबित करें युवा हमारा मन से सम्मान से
शिक्षा का दीपक जलाएँ ज्ञान का मार्ग दिखाएँ
समाज को जागरूक करें युवा अपने कर्त्तव्य को निभाएँ
सपनों की ऊँचाइयों को छू ले हर मुश्किल पर करें
बोहल युवा नव भारत का नवनिर्माण करें”—युवा जोश कविता1
जहाँ उनकी कविता युवाओं में एक नया जोश भरती है वहाँ उनके अंदर एक नई क्रांति को भी उत्पन्न करती है। डॉक्टर नरेश सिहाग अपने काव्य में क्रांति का नया संदेश अद्वितीय शैली और प्रखर संवेदनाओं के माध्यम से देते हैं। उनकी कविता सामाजिक विषमताओं, शोषण और अन्याय के विरुद्ध चेतना जागृत करती है। वे परंपरागत क्रांति से आगे बढ़कर वैचारिक और संवेदनात्मक क्रांति की वकालत करते हैं, जहाँ बदलाव केवल बाहरी नहीं, बल्कि मानसिक और भावनात्मक स्तर पर भी आवश्यक है। उनके काव्य में विद्रोह की ज्वाला प्रखर होती है, लेकिन वह विनाशकारी नहीं, बल्कि नव-सृजनात्मक होती है। वे शब्दों के माध्यम से समाज में सकारात्मक परिवर्तन का आह्वान करते हैं, जिससे शोषितों को न्याय और जीवन को नया आयाम मिले। उनके काव्य की कुछ पंक्तियाँ इसको भली-भाँति दर्शाती हैं जो कि इस प्रकार है:
“घर का यूँ खिलखिला सा होना
उसका हँसने का अद्भुत नज़ारा
तुम्हारे हृदय का कुसुम सा होना
लगता है जैसे आने जीवन सँवारा
यही तो हृदय होता शान्ति का
सुकून का खल होता भ्रांति का
अस्त व्यस्त कुछ भी नहीं होता
देता घर, कुछ संदेश नई क्रांति का।”—संदेश नई क्रांति का कविता2
यदि इन पंक्तियों को गहनता के साथ पढ़ा जाए तो यह हमारे अंदर एक नयापन पैदा करती हैं। हम सभी को आगे बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित व प्रेरणा प्रदान करती हैं। सिहाग जी इन पंक्तियों के माध्यम से आज के युवा को शिक्षा का महत्त्व समझाने की कोशिश करते हैं और समाज में जागरूकता का प्रसार करते हैं।
यथार्थवाद साहित्य का वह रूप है, जो जीवन की सच्चाइयों को बिना किसी अलंकरण के प्रस्तुत करता है। डॉ. नरेश सिहाग की कविताओं में यथार्थवाद के विभिन्न रूप देखने को मिलते हैं। डॉ. सिहाग की कविताओं में सामाजिक असमानता, ग़रीबी, शोषण, जाति-व्यवस्था, और पितृसत्तात्मकता की गहरी झलक देखने को मिलती है। वे समाज की कठोर सच्चाइयों को उजागर करने के लिए सीधे-सरल लेकिन प्रभावशाली शब्दों का प्रयोग करते हैं। उनकी कविताएँ समाज के उन तबक़ों की आवाज़ बनती हैं, जिन्हें अक्सर अनसुना कर दिया जाता है। यथार्थवाद को पेश करती उनके काव्य की कुछ पंक्तियाँ इस प्रकार हैं:
“ग़रीबी लड़ती रही ठंडी हवाओं से,
अमीरों ने कहा, क्या मौसम आया है!
चिथड़ों में लिपटा, वो काँपता रहा,
हर साँस में जीवन बचाता रहा।
चूल्हा बुझा था, पर आस जल रही,
सपनों की रोटी, राख में गल रही।
उधर महलों में जश्न मनाया गया,
हर कोने में हीटर लगाया गया।
शाम की चाय, गरम पकवान,
सर्दी में भी, गुलाबी थे अरमान।
फिर एक ग़रीब ने पूछा आसमान से,
‘क्या तू सिर्फ़ अमीरों का भगवान है?’
मगर उत्तर न आया, सन्नाटा छा गया,
ग़रीब ठिठुरता रहा, मौसम हँसता रहा।
यही है कहानी इस दुनिया की,
जहाँ सर्द हवाएँ भी अमीरों की!”—सर्दी कविता3
यथार्थवाद कविता में तब प्रकट होता है जब कवि समाज की स्थितियों को सजीव रूप में प्रस्तुत करता है। डॉ. नरेश सिहाग की कविताओं में यथार्थ विभिन्न स्तरों पर व्यक्त हुआ है। इनकी कविताओं में समाज की जटिलताएँ स्पष्ट रूप से उभरती हैं। ये ग़रीबी, वर्गभेद, शोषण, जातिगत भेदभाव और अन्याय की ओर पाठकों का ध्यान आकर्षित करते हैं। इनकी कविताएँ समाज के उन पहलुओं को उजागर करती हैं, जिन्हें अक्सर अनदेखा कर दिया जाता है।
ये सत्ता, राजनीति और भ्रष्टाचार पर भी अपनी कविताओं के माध्यम से गहरा प्रहार करते हैं। इनके काव्य में व्यवस्था के विरुद्ध एक आक्रोश देखने को मिलता है, जो आम जनता के मनोभावों का प्रतिनिधित्व करता है। यथार्थ केवल समाज तक सीमित नहीं होता, बल्कि व्यक्ति के निजी जीवन में भी प्रकट होता है। इनकी कविताओं में व्यक्तिगत पीड़ा, संघर्ष और आत्मसंघर्ष के बिंब भी देखने को मिलते हैं।
डॉ. नरेश की यह प्रसिद्ध कविताओं में से एक कविता है जो कि समाज में हो रहे भेदभाव अमीर, ग़रीब, छोटे, बड़े आदि पैमाने को दर्शाती हैं। ये पंक्तियाँ यथार्थवाद के साथ-साथ उनकी भावनात्मक दृष्टि को भी प्रदर्शित करती हैं। इसी प्रकार अन्य कविता मुखौटा समाज में रह रहे व्यक्तियों के भिन्न-भिन्न रंगों को भी उजागर करती है। उनकी मुखौटा नामक कविता बताती है कि लोगों के चेहरे कैसे नक़ाब से ढके हुए हैं। वे ऊपर से तो अलग प्रकार के दिखते हैं और उनके अंतर्मन में अलग-अलग द्वंद्व चलता रहता है। जिसकी कुछ पंक्तियाँ इस प्रकार है:
“मुखौटे के पीछे छिपी कहानी,
सच की राहें, झूठ का पानी।
चेहरे बदलते, भाव भी बदलते,
भीतर की आग, बाहर से ठंडी।
आँखों में चमक, होंठों पर हँसी,
दिल में छिपी, गहरी उदासी।
मुखौटा कहता जो सबको अच्छा,
भीतर का सच, किसने समझा?
हर दिन नया रूप धरते,
दुनिया के रंग में रंगते।
मुखौटा पहन, सच को छिपाते,
ख़ुद से भी हम कब तक भागते?
सपनों की चाह में दौड़ते,
मुखौटे के संग सच को छोड़ते।
पर एक दिन, जब मुखौटा उतरेगा,
भीतर का इंसान ही उभरेगा”—मुखौटा कविता4
व्यक्तिगत जीवन के संघर्ष, आशा, निराशा, प्रेम और आत्मसंघर्ष भी इनकी कविताओं में प्रमुखता से स्थान पाते हैं। वे मानवीय जीवन के हर पहलू को बहुत बारीक़ी से प्रस्तुत करते हैं, जिससे पाठक उनकी कविताओं में अपनी ही छवि देख पाते हैं। संवेदना किसी भी कविता की आत्मा होती है। उनकी कविताओं में मनुष्य की पीड़ा, करुणा, प्रेम, और संघर्ष का अत्यंत संवेदनशील चित्रण देखने को मिलता है। वे अपने शब्दों के माध्यम से एक ऐसा संसार रचते हैं, जहाँ पाठक अपने अनुभवों को जोड़ पाता है। उनकी कविताओं में भावनाओं और वास्तविकता का अद्भुत संतुलन देखने को मिलता है।
सिहाग का काव्य यथार्थ और संवेदना का सजीव दस्तावेज़ है, जो समाज की पीड़ा, संघर्ष और मानवीय संवेदनाओं को प्रभावशाली ढंग से व्यक्त करता है। उनकी कविता न केवल समकालीन सामाजिक विसंगतियों को उजागर करती है, बल्कि परिवर्तन की चेतना भी जाग्रत करती है। उनका काव्य अभिव्यक्ति की सहजता, भावनात्मक गहराई और शिल्प सौष्ठव का उत्कृष्ट उदाहरण है, जो पाठकों को विचारोत्तेजक अनुभव प्रदान करता है। उनके काव्य की ऐसी कुछ पंक्तियाँ इस प्रकार हैं:
“करता हूँ मैं अभिव्यक्ति का
एक ज्वलंत दस्तावेज़
जिसके पृष्ठ स्वयं में यथार्थ हैं
नहीं कोई उसका झूठा पेज
सम सामयिक विसंगतियों का
यह एक कच्चा चिट्ठा है
जो हर एक ही नादानियों से
क्रोधित हो ख़ूब चिढ़ता है
क्योंकि ईश आईने में जो भी
बनते है बिंब प्रतिबिंब
वो दर्शाते रिसते रिश्तों की
हक़ीक़त के सही सही प्रतिबिंब।”—अभिव्यक्ति का ज्वलंत दस्तावेज़ कविता5
स्त्री जीवन, उसकी पीड़ा, संघर्ष और उसकी स्वतंत्रता के प्रश्न भी उनकी कविताओं में सशक्त रूप से उभरकर आते हैं। वे समाज में स्त्रियों की स्थिति पर गहरी संवेदनशीलता के साथ विचार करते हैं और उनकी आवाज़ को अपनी कविताओं के माध्यम से व्यक्त करते हैं। कहीं कहीं तो ये नारी की विवशता और बेबसता को पेश करते हुए नज़र आते हैं तो कहीं-कहीं उन्हें आत्मविश्वास से भरते हुए नए जोश के साथ प्रोत्साहित करते हुए नज़र आते हैं। उनके काव्य की कुछ झलक इस प्रकार से है:
“नारी स्वयं को समेटते समेटते
इतनी भयभीत हो सिकुड़ती गई थी
मर्दों के ज़ुल्मों को सहते सहते,
सुधरने के बजाय बिगड़ती गई थी।”—नारी की कुछ बात कहे कविता6
“मज़बूती आ गई उसकी सोच और विचार में
जीवन के उसके रहने के आचार विचार में
हर समस्या को उसने चुनौतिरूप में माना
जीवन के तौर तरीक़ों को अब उसने जाना।”—नारी का जीवन दर्शन कविता7
“बेटी है ईश्वर का उपहार,
दुनिया का सबसे प्यारा प्यार।
सम्मान, स्नेह से सजा ये दिवस,
बेटियों को समर्पित हर एक विचार।
दुनिया में फैला दो यह संदेश,
बेटियाँ हैं जीवन की आस।
बेटी के बिना जीवन अधूरा,
उसका होना ‘बोहल’ सबसे ख़ास।”—बेटी दिवस कविता8
इनकी कविताएँ केवल साहित्यिक आनंद ही नहीं देतीं, बल्कि समाज को एक नया दृष्टिकोण भी प्रदान करती हैं। वे अपनी कविताओं के माध्यम से यथार्थ की कठोर सच्चाइयों को उजागर करने के साथ-साथ मानवीय संवेदनाओं की कोमलता को भी अभिव्यक्त करते हैं। डॉ. मीरा चौरसिया अपने शोध आलेख ‘डॉ. नरेश सिहाग के पशु पक्षी हमारे मित्र काव्य संग्रह बाल काव्य में एक गहन अध्ययन’ में लिखती हैं कि “एक एडवोकेट होने के नाते डॉक्टर नरेश सिहाग ने क़ानून के सिद्धांतों और हिंदी साहित्य को साथ में जोड़कर एक अद्वितीय दृष्टिकोण प्रस्तुत किया है उन्होंने न्यायिक व्यवस्था में आने वाली समस्याओं भ्रष्टाचार और आम आदमी के संघर्षों को अपनी रचनाओं में बख़ूबी चित्रित किया है उनके लेखन में विधि और साहित्य का यह अनोखा संगम देखने को मिलता है जो उन्हें अन्य रचनाकारों से अलग और विशिष्ट बनाता है।”9 उनकी इसी दृष्टि को प्रस्तुत करते का उनके काव्य की कुछ पंक्तियाँ इस प्रकार है:
“अदालत की रफ़्तार है न्याय की बहुत तेज
सच को पकड़ती है वहीं जो हो दोष में छेज।
अदालत की मैं रहूँ बिना पक्ष विपक्ष के
न्याय की आँखों में छाया भाव निष्पक्ष”—अदालत कविता10
डॉक्टर नरेश सिहाग के काव्य में संवेदनात्मक भावना करुणा, प्रेम, वेदना और आशा का गहन सम्मिश्रण है। उनकी कविताएँ समाज के उपेक्षित वर्ग, मानव जीवन के संघर्षों और व्यक्तिगत अनुभूतियों को भावनात्मक रूप से अभिव्यक्त करती हैं। वे मानवीय संवेदनाओं की कोमलता और तीव्रता को भी चित्रित करते हैं। उनकी संवेदनाएँ केवल पीड़ा तक सीमित नहीं, बल्कि उनमें एक सकारात्मक दृष्टिकोण भी समाहित है, जो पाठकों को सोचने, महसूस करने और समाज के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी समझने के लिए प्रेरित करता है।
संवेदनाओं की अभिव्यक्ति करते हुए उनके काव्य के कुछ पंक्तियाँ इस प्रकार से हैं:
“बचपन की यादें मीठी होती हैं
ख़ुशियों से जुदा वो बातें होती
छोटे छोटे सपने, बड़ी मस्ती
ज़िन्दगी की सबसे प्यारी अद्भुत साथी।”—बचपन की यादें कविता11
अन्य कविता का कुछ अंश इस प्रकार है:
“यही है एक ख़्वाहिश मेरी
जो है जैसा उसकी वैसी ही
हक़ीक़त कह दूँ
उसका चेहरा है जैसा वैसी ही
तस्वीर बना दूँ
और
मेरा हृदय है एक कोरी काग़ज़ जैसा
न जाने मेरी सोच की क़लम
किसी के बारे में क्या लिख दे
न जाने मेरे दिल का साज़
किसी के बारे में कौनसी धुन बना दे”—ख़्वाहिशें कविता12
उनकी कविताओं में यथार्थ का तीखापन और संवेदना की गहराई मिलकर एक ऐसा साहित्यिक संसार रचती हैं, जो पाठकों को लंबे समय तक प्रभावित करता है। इस शोध आलेख के माध्यम से यह स्पष्ट होता है कि उनका काव्य केवल पढ़ने और सराहने के लिए नहीं, बल्कि समाज को देखने और समझने का एक सशक्त माध्यम भी है। इनके काव्य में यथार्थ और भाव का अद्भुत संगम हमें देखने को मिलता है। संक्षेप में यदि कहा जाए तो इनका काव्य गागर में सागर भरने का कार्य करता है। इनकी लेखनी वर्तमान समाज में फैली लगभग सभी समस्याएँ उजागर करती है।
संदर्भ सूची:
- ख़्वाहिशें, डॉक्टर नरेश सिहाग, म. सी.प्रकाशन, नई दिल्ली, 2025
- ख़्वाहिशें, डॉक्टर नरेश सिहाग, म. सी.प्रकाशन, नई दिल्ली, 2025
- https://nayigoonj.com सर्दी /डॉ. नरेश सिहाग
- https://m.sahityakunj.net/lekhak/naresh-kumar-sihag/मुखौटा
- ख़्वाहिशें, डॉक्टर नरेश सिहाग, म. सी. प्रकाशन, नई दिल्ली, 2025
- ख़्वाहिशें, डॉक्टर नरेश सिहाग, म. सी. प्रकाशन, नई दिल्ली, 2025
- ख़्वाहिशें, डॉक्टर नरेश सिहाग, म. सी. प्रकाशन, नई दिल्ली, 2025
- ख़्वाहिशें, डॉक्टर नरेश सिहाग, म. सी. प्रकाशन, नई दिल्ली, 2025
- शोध समालोचना पत्रिका जनवरी-मार्च 2025 अंक
- ख़्वाहिशें, डॉक्टर नरेश सिहाग, म. सी. प्रकाशन, नई दिल्ली, 2025
- https://m.sahityakunj. बेटी डॉक्टर नरेश सिहाग
- ख़्वाहिशें, डॉक्टर नरेश सिहाग, म. सी. प्रकाशन, नई दिल्ली, 2025
ग्रन्थ सूची:
- ख़्वाहिशें, डॉक्टर नरेश सिहाग, म. सी. प्रकाशन, नई दिल्ली, 2025
- शोध समालोचना पत्रिका जनवरी मार्च 2025 अंक