काठ के मुर्दे

15-10-2026

काठ के मुर्दे

रेनूका (अंक: 302, अक्टूबर द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)

 

शहर जागता है,
पर आँखें सोई रहती हैं,
चौराहों पर खड़ी भीड़
सब कुछ देखती है—
फिर भी चुप रहती है।
 
महँगाई की सीढ़ियाँ
हर रोज़ एक पायदान ऊपर चढ़ती हैं,
और आम आदमी
अपनी जेब टटोलकर
कुछ सपने वापस रख देता है।
 
कारों की लंबी क़तार है,
हर चीज़ की क़ीमत में
किसी न किसी रूप में
उसकी मेहनत जुड़ी है,
फिर भी महीने के अंत में
उसके हाथ ख़ाली हैं।
 
किसी के क़ाफ़िले के आगे
सड़कें अपने आप साफ़ हो जाती हैं,
किसी के घर में
बच्चे फ़ीस की चिंता में बड़े होते हैं।
किसी के बेटे
विदेशी विश्वविद्यालयों की सीढ़ियाँ चढ़ते हैं,
और किसी का बेटा
रोज़गार की तलाश में
एक शहर से दूसरे शहर
अपने प्रमाणपत्रों का पुलिंदा लिए घूमता है।
युवा था वह—
आँखों में उजाला था,
हाथों में हुनर था,
दिल में कुछ कर गुज़रने का साहस था।
लेकिन जब अवसर नहीं मिलता,
जब इंतज़ार लंबा हो जाता है,
जब मेहनत बार-बार दरवाज़े से लौटा दी जाती है,
तो कुछ हाथ
काम के बजाय ग़लत रास्तों की ओर बढ़ने लगते हैं।
 
कहीं नशा है,
कहीं चोरी की मजबूरी,
कहीं अपराध की अँधेरी गलियाँ—
और हम केवल यह कहकर
आगे बढ़ जाते हैं कि
“लड़का बिगड़ गया।”

किसी ने यह नहीं पूछा
कि उसके सपने कहाँ टूटे थे।
अमीर और अमीर होते गए,
ग़रीब और नीचे उतरता गया,
बीच की सीढ़ियाँ
धीरे-धीरे ग़ायब होती गईं।
 
सच बोलना कठिन हुआ,
झूठ बोलना सुविधाजनक।
ईमानदारी किताबों में बची,
समझौते जीवन का हिस्सा बन गए।
किसी को अपनी कुर्सी बचानी थी,
किसी को अपनी नौकरी,
किसी को अपने बच्चों का भविष्य,
किसी को बस इतना चाहिए था
कि आज का दिन
बिना किसी मुसीबत के निकल जाए।
और इसी “बस आज निकल जाए” में
कितने कल खो गए।
 
हम जानते हैं
कहा ग़लत हो रहा है।
हम जानते हैं
किसके हिस्से में सुविधा अधिक है,
किसके हिस्से में संघर्ष।
हम जानते हैं
कि हर चमक के पीछे
किसी की मेहनत छिपी होती है।
फिर भी
हम अपनी खिड़कियाँ बंद कर लेते हैं।
क्योंकि बाहर बोलने का
अपना जोख़िम है,
और भीतर चुप रहने की
अपनी सुविधा।
 
धीरे-धीरे
हमारी संवेदनाएँ सूखती गईं,
आवाज़ें धीमी होती गईं,
और चेहरे
चेहरे कम, मुखौटे अधिक लगने लगे।
 
कोई सत्ता के साथ खड़ा है,
कोई व्यवस्था के डर से,
कोई अपने स्वार्थ के कारण,
और कोई इसलिए चुप है
कि उसे लगता है—
“मेरे अकेले बोलने से क्या बदल जाएगा?”

यही प्रश्न
हर घर में जन्म लेता है,
और वहीं मर जाता है।
 
फिर एक दिन
हम आईने में देखते हैं—
चेहरा हमारा होता है,
आँखें हमारी होती हैं,
साँसें भी चल रही होती हैं,
लेकिन भीतर
कुछ लकड़ी-सा हो चुका होता है।
 
न क्रोध बचता है,
न करुणा,
न प्रश्न,
न प्रतिरोध।
हम जीवित होते हुए भी
काठ के मुर्दे बन जाते हैं।
 
काठ के मुर्दे—
जो अन्याय को पहचानते हैं,
पर बोलते नहीं।
जो भूख देखते हैं,
पर आँखें फेर लेते हैं
जो बेरोज़गारी देखते हैं,
पर उसे किसी और के घर की समस्या समझते हैं।
जो झूठ पहचानते है,
पर सच कहने से डरते हैं।
जो जानते हैं
कि समाज केवल दूसरों से नहीं,
हम सब से बनता है—
फिर भी
अपना हिस्सा निभाने से बचते हैं।
 
शायद सबसे बड़ा प्रश्न
सत्ता से पहले
हमसे है—
कब तक?
कब तक हम
सिर्फ़ तमाशबीन बने रहेंगे?
कब तक अपने हिस्से की चुप्पी को
मजबूरी कहकर बचते रहेंगे?
कब तक
हमारी जीवित आँखों में
काठ का सन्नाटा रहेगा?
क्योंकि मुर्दे
सिर्फ़ वे नहीं होते
जिनकी साँसें थम जाती है—
कभी-कभी
मुर्दा वह भी होता है
जिसकी साँसें चलती रहती हैं,
पर जो अन्याय देखकर भी
कुछ महसूस नहीं करता।
और डर यही है—
कहीं हम सब
जीते-जी
काठ के मुर्दे तो नहीं बन रहे?

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