इतिहास से साक्षात् भेंट: योगवीर हांडा अंकल की स्मृति में
डॉ. मंजुश्री वेदुला
आदरणीय योगवीर हांडा अंकल एक सौ तीन वर्षों का वह सजीव इतिहास, जिनसे हुई मेरी भेंट ने मेरे जीवन को भीतर तक समृद्ध कर दिया। कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं, जिनसे मिलना मात्र एक परिचय नहीं होता, बल्कि समय के साथ संवाद करने जैसा अनुभव होता है। योगवीर हांडा अंकल से मिलना भी मेरे लिए ऐसा ही एक दुर्लभ सौभाग्य रहा।
मैं मूलतः विज्ञान की छात्रा रही हूँ। इतिहास की तिथियाँ स्मरण न रह पाने के कारण दसवीं के बाद मैंने इतिहास को विषय के रूप में कभी नहीं पढ़ा। उस समय लगता था कि इतिहास मेरे लिए नहीं है। किन्तु आज जब पीछे मुड़कर देखती हूँ, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि शायद नियति में यह लिखा था कि मैं इतिहास पढ़ूँ नहीं, बल्कि इतिहास से मिलूँ और जीवन ने मुझे इतिहास से मिलवा ही दिया—योगवीर हांडा अंकल के रूप में।
वे केवल अतीत के साक्षी नहीं थे, बल्कि चलते-फिरते, साँस लेते हुए इतिहास थे। आर्य समाज से उनका गहरा जुड़ाव था और उन्होंने डी.ए.वी. लाहौर से शिक्षा प्राप्त की थी। डी.ए.वी. से जुड़ी होने के कारण यह तथ्य मेरे लिए विशेष गर्व और आत्मीयता का विषय बन गया। उनके व्यक्तित्व, अनुशासन, विचारों और आचरण में आर्य समाज तथा डी.ए.वी. परंपरा के संस्कार स्पष्ट रूप से झलकते थे।
उनसे मेरी पहली भेंट लगभग तीन वर्ष पूर्व आभासी माध्यम से हुई थी। तब भी उनकी स्मरण-शक्ति, विचारों की स्पष्टता और अनुभवों की परिपक्वता मुझे विस्मित कर देती थी। 23 नवंबर2025 को उनसे प्रत्यक्ष मिलकर, उनके साथ बैठकर संवाद करने का जो अवसर मिला, वह मेरे जीवन की अमूल्य निधि बन गया। वह केवल एक मुलाक़ात नहीं थी, बल्कि इतिहास के एक जीवंत अध्याय के साक्षात््कार जैसा अनुभव था।
बातों-बातों में उन्होंने अपने जीवन की कथा इस प्रकार कहना आरंभ किया, मानो बीते युग स्वयं शब्दों का रूप धरकर सामने आ खड़े हुए हों। उन्होंने बताया कि उनका जन्म 3 सितंबर 1922 को लाहौर में हुआ। बचपन से ही वे सत्याग्रह आंदोलनों से जुड़े रहे। उन्होंने स्मरण कराया कि 30 अक्टूबर 1928 को, जब साइमन कमीशन के विरोध में लाला लाजपत राय के नेतृत्व में लाहौर में अहिंसक रैली निकाली गई, तब वे मात्र छह-सात वर्ष के बालक थे। परिवार के बड़ों के साथ वे भी उस रैली में शामिल हुए थे।
उस दिन की विभीषिका को स्मरण करते हुए उनके स्वर में आज भी कम्पन उतर आता था। पुलिस द्वारा की गई निर्मम लाठीचार्ज की वह घटना उनकी आँखों के सामने घटी थी। लाला लाजपत राय पर जानबूझकर किया गया लाठीचार्ज उन्होंने स्वयं देखा था। उस हिंसा की चपेट में वे स्वयं भी आए और चोटिल हुए। इतिहास की पुस्तकों में दर्ज वह घटना, उनके शब्दों में पीड़ा, साहस और राष्ट्रीय चेतना की सजीव तस्वीर बनकर उभर आई।
इसके बाद जितने भी छोटे-बड़े सत्याग्रह आंदोलन हुए, उनमें उनकी सहभागिता बनी रही। नमक सत्याग्रह हो या 26 जनवरी 1930 को स्वतंत्रता दिवस मनाने का उत्सव—हर अवसर पर वे पूरे उत्साह से उपस्थित रहे। स्कूल से भागकर सभाओं में जाना, नेताओं को सुनना और अपनी छोटी-सी भूमिका निभाना उनके बालमन का संकल्प बन गया था।
उन्होंने बताया कि उनके जीवन पर अपने ताया जी श्री गुलजारी लाल नंदा का प्रभाव अत्यंत गहरा रहा। बचपन से ही वे उनकी छाया में सच्चाई, ईमानदारी, कर्मठता और देशभक्ति के संस्कार आत्मसात करते रहे। किशोरावस्था से ही उन्हें ताया जी के साथ बैठकों में जाने का अवसर मिला। उन्होंने बापू, पंडित नेहरू, सुभाष चंद्र बोस, सरदार पटेल और मोहम्मद अली जिन्ना जैसे अनेक युगपुरुषों को निकट से देखा और सुना। ताया जी लेबर लॉ के चेयरमैन थे, इसलिए कई महत्त्वपूर्ण बैठकों का साक्षी बनने का अवसर उन्हें घर पर ही मिल जाता था, जहाँ वे सेवादार के रूप में उपस्थित रहते थे। अहमदाबाद वे इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए गए थे, किन्तु सत्याग्रह आंदोलनों से उनका नाता कभी नहीं टूटा। उन्होंने बताया कि एक समय कार्यकर्ताओं पर ‘शूट एंड साइट’ का आदेश तक जारी हो चुका था, फिर भी वे छिप-छिपकर पोस्टर लगाने का साहस करते रहे। वे एथलेटिक चैंपियन थे, इसलिए युवाओं की टोली का नेतृत्व प्रायः उन्हें ही सौंपा जाता था।
एक घटना का वर्णन करते हुए उन्होंने बताया कि एक बार पोस्टर लगाने के बाद जब वे वहाँ से निकलने वाले थे, तभी सिपाही आ पहुँचे और उन्होंने बंदूकें तान दीं। उसी समय वहाँ तैनात कुछ पठान गार्डों ने उन्हें पहचान लिया। उन्होंने सिपाहियों को रोका और उनसे पूछताछ की। उन्होंने सहजता से उत्तर दिया कि वे रात ताया जी के घर रुके थे और अब हॉस्टल लौट रहे हैं। पठान गार्डों की मानवीयता ने उनकी जान बचाई और वे सकुशल वहाँ से निकल सके। इसके बाद पुलिस का संदेह और गहरा गया। कॉलेज प्रशासन पर दबाव बढ़ा और अंततः कॉलेज में तालाबंदी हो गई। इस प्रकार आरसी टेक्निकल कॉलेज में इलेक्ट्रिकल और मैकेनिकल इंजीनियरिंग के छात्र के रूप में उनका औपचारिक करियर वहीं समाप्त हो गया। इसके बाद वे ताया जी के साथ सामाजिक और राष्ट्रीय कार्यों में और अधिक सक्रिय हो गए। उनके साथ साबरमती जाकर उन्होंने बापू से भेंट की और 1942 के आंदोलन में भी पूर्ण निष्ठा से भाग लिया।
1946 के दंगों के समय भी वे डटे रहे। उनके पिताजी लाहौर छोड़ने को तैयार नहीं थे, किन्तु 1947 में परिस्थितियों ने उन्हें विवश कर दिया। उन्होंने बताया कि उनके पिताजी अत्यंत ईमानदार, कर्मठ और समाज के लिए जीने वाले व्यक्ति थे। लोदी रोड के पास स्थित शवदाह गृह उनके पिताजी की ही पहल का परिणाम था। पारिवारिक सम्पत्ति से जुड़े संघर्षों के बावजूद उनके भीतर ईमानदारी और सेवा का वही भाव बना रहा। ताया जी की संगति में रहकर उन्होंने देश और समाज के लिए जीने का वास्तविक अर्थ सीखा।
उनकी बातें सुनते हुए यह अनुभव गहराता गया कि इतिहास की पुस्तकें जिन घटनाओं को संक्षेप में दर्ज करती हैं, वे घटनाएँ किसी के जीवन में कितनी गहराई से धँसी होती हैं। उनसे मिलकर यह सत्य और अधिक प्रबल हो गया कि इतिहास केवल पढ़ा नहीं जाता—वह जिया जाता है।
भावी पीढ़ी के लिए दिया गया उनका संदेश विशेष रूप से मन को छू गया। उनके शब्दों में अनुभव की परिपक्वता, जीवन का निचोड़ और राष्ट्र के प्रति गहरी ज़िम्मेदारी समाहित थी। ऐसा प्रतीत हुआ मानो वे आने वाली पीढ़ियों को अपने जीवन की धरोहर सौंप रहे हों।
गत महीने जब मैं दिल्ली विद्यालय के एक विशेष कार्यक्रम के अवसर पर गई थी, तब अधिकांश लोग नगर-भ्रमण की योजना बना रहे थे। किन्तु मेरे मन में केवल एक ही आकांक्षा थी—उनसे मिलना। आज उस क्षण को स्मरण करती हूँ तो लगता है कि शायद उनका विदा लेने का समय समीप था और उसी ने इस भेंट को सम्भव बनाया। 23 नवंबर 2025 को हुई वह मुलाक़ात और 23 दिसंबर2025 को उनका शांत विदा हो जाना—मानो एक ही महीने में इतिहास का एक अमूल्य अध्याय पूर्ण हो गया। एक सौ तीन वर्षों के जीवन में उन्होंने कर्मनिष्ठ, सजग और आदर्श नागरिक होने का जो उदाहरण प्रस्तुत किया, वह विरले ही देखने को मिलता है।
इस अवसर पर मैं आदरणीया डॉ. आरती स्मित जी के प्रति हृदय से कृतज्ञता व्यक्त करती हूँ, जिनके माध्यम से मुझे योगवीर हांडा अंकल जैसे महान व्यक्तित्व से मिलने और संवाद करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। यह उपकार मेरे लिए सदैव स्मरणीय रहेगा।
आदरणीय योगवीर हांडा अंकल के चरणों में कोटि-कोटि नमन। आप भले ही आज हमारे बीच शारीरिक रूप से उपस्थित न हों, किन्तु आपकी स्मृतियाँ, आपके अनुभव और आपका संदेश आने वाली पीढ़ियों के लिए सदैव पाथेय बने रहेंगे।
तपस्वी जीवन, साधना कर्म की,
राष्ट्र-हित ही जिनका ध्येय रहा।
संघर्ष-पथ पर अडिग रहकर भी
जिनका मन सदैव संयत रहा।
न स्वार्थ, न मोह, न लोभ कभी,
कर्त्तव्य ही जिनका व्रत बन गया।
शतवर्ष से अधिक जीवन पाकर
भारत-माता का सच्चा सुत बन गया।