हम मालिक अपनी मर्ज़ी के

15-03-2024

हम मालिक अपनी मर्ज़ी के

डॉ. शैलेश शुक्ला (अंक: 249, मार्च द्वितीय, 2024 में प्रकाशित)

 

न मैडम के, न सर जी के 
हम मालिक अपनी मर्ज़ी के।  
 
ज़्यादा की कोई चाह नहीं 
इसलिए कोई परवाह नहीं
जो बोया वो ही पाया है 
जो है वो ख़ुद कमाया है 
सत्ता के किसी  दरबार में 
नहीं प्रार्थी हम किसी अर्ज़ी के 
       हम मालिक अपनी मर्ज़ी के . . . 
  
कबीर तुलसी के वंशज हम 
मन की कहने का रखते दम 
सच कहते सच ही सुनते हैं 
नहीं झूठी बातें बुनते हैं
जो कहते वो ही करते हैं
नहीं करते वादे फ़र्ज़ी के
      हम मालिक अपनी मर्ज़ी के . . .  
 
सम्मान सभी का करते हम 
पर नहीं किसी से डरते हम 
न किसी के तलवे चाटें
न किसी की जड़ हम काटें
जो प्राप्त है, वो पर्याप्त है 
नहीं क़ायल हम ख़ुदगर्जी के 
      हम मालिक अपनी मर्ज़ी के . . . 
 
न मैडम के, न सर जी के 
हम मालिक अपनी मर्ज़ी के! 

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