हाइकु, ताँका और सेदोका के आलोक में ‘गंगा में तैरते मिट्टी के दीये’
डॉ. सुषमा देवीसमीक्षित पुस्तक: पुस्तक: गंगा में तैरते मिट्टी के दीये
काव्य संग्रह हाइकु, ताँका, सेदोका संकलन
लेखक: डॉ. रमा द्विवेदी
प्रकाशक: शब्दांकुर प्रकाशन
पृष्ठ संख्या: १३८
मूल्य ₹300
उपलब्धता: गंगा में तैरते मिट्टी के दीये (amazon.in)
‘गंगा में तैरते मिट्टी के दीये’ शीर्षक अपने आप में एक सशक्त सांस्कृतिक चेतना का प्रतीक है। भारतीय परंपरा में गंगा केवल नदी नहीं, बल्कि आस्था, स्मृति और मोक्ष की संवाहिका है। गंगा में प्रवाहित होते दीप मानव-जीवन की क्षणभंगुरता, आशा और आत्मसमर्पण का बिंब प्रस्तुत करते हैं। पुस्तक के आवरण और प्रारंभिक पृष्ठों से ही यह संकेत मिलता है कि रचनाकार ने जीवन के विविध आयामों को गंगा-दीप की प्रतीकात्मकता से जोड़कर प्रस्तुत किया है।
‘गंगा में तैरते मिट्टी के दीये’ शीर्षक स्वयं में एक दृश्य-कविता का भाव समेटे हुए है। जल की प्रवाहमान धारा पर तैरते छोटे-से मिट्टी के दीए का दृश्य क्षणभंगुर भी है और शाश्वत भी। जापानी काव्य-विधाएँ हाइकु, ताँका क्षणों की ऐसी शृंखला है, जिन्हें हाइकु को संवेदना, और सेदोका, क्षण-बोध, प्रकृति-संवेदना और अंतर्मन की सूक्ष्म अनुभूति को अत्यल्प शब्दों में विस्तृत भाव व्यक्त करने की कला सिखाती हैं। इस दृष्टि से यह कृति केवल कविताओं का संग्रह नहीं, बल्कि दृश्य-क्षणों की ऐसी शृंखला है, जिन्हें हाइकु को संवेदना, तांँका को विस्तार और सेदोका को आध्यात्मिकता के आधार पर पढ़ा जा सकता है।
हाइकु (5-7-5 वर्ण संरचना) काव्य विधा को विश्व स्तर पर प्रतिष्ठित करने का श्रेय मात्सुओ बाशो को दिया जाता है। हाइकु का मूल तत्त्व क्षण का तीव्र बोध और प्रकृति के माध्यम से जीवन-दर्शन को समझना है। ‘गंगा में तैरते मिट्टी के दीये’ में अनेक प्रसंग ऐसे हैं, जो किसी बड़े कथानक की अपेक्षा एक सूक्ष्म दृश्य पर केंद्रित हैं। इसमें क्षण बोध को इन पंक्तियों में देखा जा सकता है:
“मिट्टी के दीये
गंगा में हैं तैरते
प्रकाश भरें।” (पृष्ठ-13)
“तैरते दीये
अर्पण व तर्पण
समर्पण भी।” (पृष्ठ-13)
“हे भगवान
हमें दो वरदान
बनूँ इंसान।” (पृष्ठ-34)
ये प्रसंग हाइकु की तरह ही “क्षण में जीवन” का अनुभव कराते हैं। कवयित्री की काव्य पंक्तियों में भाव की तीव्रता है। उदाहरणार्थ:
“युद्ध आह्वान
स्वयं का ही विनाश
मूर्ख इंसान।” (पृष्ठ-46)
कवयित्री का जिज्ञासा भाव कृति में अवलोकनीय है:
“क्षितिज पार
कैसा होगा संसार
जिज्ञासा सार।” (पृष्ठ-37)
हाइकु में प्रकृति केवल पृष्ठभूमि नहीं, बल्कि अर्थ का माध्यम होती है। इसी प्रकार यहाँ गंगा केवल नदी नहीं, बल्कि जीवन-धारा है। दीप केवल वस्तु नहीं, बल्कि आशा और अस्तित्व का प्रतीक है। हाइकु की विशेषता संक्षिप्तता में व्यापक अर्थ को समेटे हुए है। यथा:
“आत्मा की दूर्वा
जल रही आग में
देह ईंधन।”(पृष्ठ-77)
रचना के अनेक कथ्य कम शब्दों में गहरी अनुभूति छोड़ जाते हैं। कविता समाप्त होने के बाद भी उसका प्रभाव बना रहता है—यही हाइकु की संवेदना है। लगभग 422 हाइकु से सजी ये रचना ‘प्रकृति-पर्यावरण-बसंत बहार’, ‘आध्यात्म-दर्शन-भक्ति’, ‘कोविड त्रासदी-प्रकृति का क़हर-आतंकी संत्रास’, ‘विज्ञान के अन्वेषण: हाइकु’, ‘चन्द्रयान-3’, ‘विजयोत्सव-दीपोत्सव’, ‘हाइकु हूँ मैं एवं अन्य हाइकु’ आदि विविधरंगी शीर्षक कवयित्री के विषय वैविध्य का परिचय देते है।
प्रस्तुत काव्य संग्रह का खंड-2 कवयित्री के प्रतिनिधि हाइकु हैं, जिसमें 157 हाइकु हैं। इसमें जीवन की बहुरंगी प्रस्तुति कवयित्री के भाव-वैविध्य में दृष्टव्य होता है।
ताँका (5-7-5-7-7) हाइकु से विस्तृत विधा है। इसके प्रथम भाग में प्रकृति या दृश्य का चित्रण किया जाता है, और अंतिम भाग उस दृश्य से उत्पन्न भाव का विस्तार करता है। इसमें दृश्य और भाव के द्वंद्व को ‘गंगा में तैरते मिट्टी के दीये ’ में भी देखा जा सकता है। पहले दृश्य उपस्थित होता है। दीप, धारा, संध्या और फिर उसके भीतर से भाव प्रस्फुटित होता है:
“दीप लघु हूँ
अंधकार पीता हूँ
प्रकाश देता
स्वयं जलकर भी
ख़ुशियाँ बाँटता हूँ।” (पृष्ठ-93)
ताँका में बाह्य दृश्य अंतर्मन का दर्पण बन जाता है। प्रस्तुत कृति में दृश्य और मनोदशा का यह संतुलन बार-बार दिखाई देता है। ताँका में प्रेम और करुणा का सूक्ष्म चित्रण मिलता है। यहाँ पारिवारिक संबंधों का चित्रण भी इसी संवेदनशीलता के साथ हुआ है। माँ-बेटी, पिता-संतान, वृद्ध-एकाकी जीवन, ये सब भावनात्मक विस्तार के साथ उभरते हैं। हाइकु की तरह ही यहाँ भाव सीधे नहीं, बल्कि संकेतों में व्यक्त होते हैं।
सेदोका विधा जापानी लघु-काव्य परंपरा का आध्यात्मिक विस्तार है। इसमें चिंतन, ध्यान और आत्मानुभूति का पक्ष अधिक प्रबल रूप में चित्रित हुआ है। यह केवल दृश्य का चित्रण नहीं, बल्कि आध्यात्मिक अनुभूति की अभिव्यक्ति है। दीपदान का दृश्य भारतीय आध्यात्मिकता का प्रतीक है। दीप बहता है, पर उसकी लौ जलती रहती है, यह आत्मा की अमरता का संकेत है। सेदोका का यह अंश दृष्टव्य है:
“मृत्यु पर्यन्त
बन जाओगे यंत्र
कील में टँगा चित्र
यही प्रारब्ध
मोह-माया त्याग के
बन जाओ प्रबुद्ध।” (पृष्ठ-122)
सेदोका में शब्द कम, अर्थ अधिक होते हैं। इसी प्रकार पंक्तियों में कई स्थानों पर मौन संवाद हैं। पात्र बहुत कुछ कहते नहीं, पर पाठक उनके भीतर की आवाज़ सुन लेता है। सेदोका का उद्देश्य केवल सौंदर्य नहीं, बल्कि आत्मबोध है। ‘गंगा में तैरते मिट्टी के दीये’ भी पाठक को अंततः जीवन के सत्य की ओर ले जाते हैं:
“नश्वर देह
किसलिए संग्रह
त्याग दे सब मोह
आत्मा की सुन
परमात्मा को गुन
दिव्यात्मा में हो लीन।” (पृष्ठ-119)
हाइकु विधा का प्रमुख तत्त्व क्षण-बोध और प्रकृति है, जो दीप-धरा के दृश्यात्मक चित्रण के रूप में व्यक्त हुआ है। ताँका विधा में दृश्य-भाव के विस्तार द्वारा संबंधों का भावात्मक विस्तार प्रस्तुत हुआ है। सेदोका का प्रमुख तत्त्व ध्यान, आध्यात्मिकता है, जिसमें आत्ममंथन और जीवन-दर्शन अभिव्यक्त हुआ है। इस प्रकार यह कृति भारतीय सांस्कृतिक परिवेश में रची-बसी होते हुए भी जापानी लघु-काव्य परंपराओं से गहरे स्तर पर साम्य स्थापित करती है।
समग्रतः हाइकु हमें क्षण की सुंदरता सिखाता है। ताँका हमें उस क्षण का भाव-विस्तार देता है। सेदोका हमें उस भाव का आत्मबोध कराता है। ‘गंगा में तैरते मिट्टी के दीये’ इन तीनों स्तरों पर प्रभावी स्वरूप धारण करती हैं।
यह काव्य संग्रह पहले दृश्य देती है, फिर संवेदना जगाती है, और अंततः आत्मचिंतन की ओर ले जाती है। इस दृष्टि से यह रचना केवल काव्य-संग्रह नहीं, बल्कि क्षण, भाव और ध्यान, तीनों का समन्वित साहित्यिक अनुभव है। यह कृति समकालीन जीवन की विडंबनाओं, पारिवारिक संबंधों की ऊष्मा, स्त्री-मन की संवेदनशीलता और सामाजिक परिवर्तन के द्वंद्व को कथा-शिल्प के माध्यम से अभिव्यक्त करती है।
‘गंगा में तैरते दीये’ केवल धार्मिक क्रिया का चित्रण नहीं है; यह मनुष्य के अंतर्मन में जलते विश्वास का प्रतीक है। दीप जलाना एक आशा का कर्म है, अंधकार के विरुद्ध प्रतिरोध। गंगा की धारा जीवन-प्रवाह है, जिसमें प्रत्येक व्यक्ति एक दीप की भाँति बहता है। कवयित्री ने शीर्षक के माध्यम से यह संकेत दिया है कि जीवन की विपरीत परिस्थितियों में भी आशा का दीप बुझना नहीं चाहिए। पुस्तक के प्रारंभिक प्रस्तुतीकरण में इस प्रतीकात्मकता को स्पष्टतः देखा जा सकता है।
पारिवारिक सम्बन्धों का विघटन और पुनर्संरचना, स्त्री की आत्मसंघर्षपूर्ण यात्रा, वृद्धावस्था की उपेक्षा, सामाजिक विषमताएँ, मानवीय संवेदनाओं के पुनर्जागरण आदि को कवयित्री ने जीवन के साधारण प्रसंगों को असाधारण संवेदनशीलता के साथ चित्रित किया है। कथाओं में घटनाओं की अधिकता नहीं, बल्कि भावों की गहराई प्रमुख है।
काव्यांश प्रायः यथार्थवादी धरातल पर गढ़े गए हैं। पात्र हमारे आस-पास के ही लोग प्रतीत होते हैं—माँ, पिता, बेटी, वृद्ध, युवा, जो अपने संघर्षों और सपनों के साथ जी रहे हैं। काव्य-संग्रह के प्रत्येक पात्र अपनी विशिष्ट मानसिक संरचना के साथ उपस्थित होते हैं। स्त्री पात्र संवेदनशील, सहनशील, किन्तु आत्मसम्मान से पूर्ण हैं। वे केवल करुणा की प्रतीक नहीं, बल्कि निर्णय लेने की क्षमता भी रखती हैं। वृद्ध पात्र जीवनानुभव और उपेक्षा के द्वंद्व को व्यक्त करते हैं। युवा पात्र आधुनिकता और परंपरा के बीच संतुलन खोजते दिखाई देते हैं।
भाषा सरल, प्रवाहमयी और भावानुकूल है। कवयित्री ने अलंकारों का अतिरेक नहीं किया, बल्कि भाव की सघनता को प्राथमिकता दी है। लोक प्रचलित शब्दावली का प्रयोग, भावात्मक वर्णन, प्रतीकात्मकता का संतुलित उपयोग, संवादात्मक शैली आदि के कारण पाठक काव्य-पंक्तियों से आत्मीय सम्बन्ध स्थापित कर पाता है। कविता प्रतीक और बिंब काव्य को काव्यात्मक ऊँचाई प्रदान करते हैं। समीक्षित काव्य संग्रह में समकालीन भारतीय समाज की विसंगतियों को उजागर किया गया है। परिवारिक एकाकीपन, बुज़ुर्गों की उपेक्षा, स्त्री की दोहरी ज़िम्मेदारियों तथा आधुनिकता के दुष्परिणाम को चित्रित करते हुए कवयित्री ने घटनाओं के माध्यम से पाठक को स्वयं सोचने के लिए प्रेरित किया है। यदि इस कृति को स्त्री-विमर्श की दृष्टि से देखें, तो यह स्पष्ट होता है कि स्त्री यहाँ पीड़िता मात्र नहीं, बल्कि परिवर्तन की वाहक है। वह परिस्थितियों से संघर्ष करती है, किन्तु अपने मूल्यों से गहरे जुड़ी रहती है। उसका मौन भी अर्थपूर्ण है, और उसका प्रतिरोध भी संयत। काव्य-संग्रह की भावभूमि करुणा, आशा और आत्ममंथन से निर्मित है। कथाएँ पाठक को भीतर तक छूती हैं।
कवयित्री ने रचना का संतुलित विस्तार करते हुए आरंभ और अंत में प्रतीकात्मक संगति, संवाद और वर्णन का सामंजस्य, घटनाओं की क्रमबद्ध प्रस्तुति करती हैं। यह बात भी उल्लेख्य है कि कुछ स्थानों पर संपादन की थोड़ी और सघनता अपेक्षित है। यह कृति समकालीन हिंदी कथा-साहित्य में अपनी विशिष्ट पहचान बना सकती है।
इसमें न तो कृत्रिम बौद्धिकता है, न ही अनावश्यक प्रयोगधर्मिता। यह जीवन के निकट खड़ी रचना है। समग्र रूप से यह कृति पाठक को आत्ममंथन के लिए प्रेरित करती है। गंगा की धारा में तैरते दीपों की तरह प्रत्येक कथा अपने भीतर एक संदेश लिए बहती है।