डिजिटल क्रांति के कथाकार: प्रदीप
दीप्ति गुप्तासमीक्षित पुस्तक: हार गया फ़ौजी बेटा एवं अन्य कहानियाँ (कहानी संग्रह)
लेखक: प्रदीप श्रीवास्तव
प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह
संस्करण: 1 जनवरी 2021
पृष्ठ: 160
मूल्य: ₹395
ISBN-10: 1613016743
ISBN-13: 978-1613016749
आलोच्य कहानी संग्रह ‘हार गया फ़ौजी बेटा एवं अन्य कहानियाँ’ कहानीकार के चर्चित संग्रहों में से एक है। सामाजिक उत्तरदायित्वों का निर्वाह करते हुए लेखक समकालीन अंतरजालीय तकनीक एवं व्यक्तिगत संघर्षों को प्रस्तुत करता है। काल समय से निरपेक्ष रहते हुए समाज का मानसिक उद्धार सम्भव नहीं है, अस्तु समय सापेक्ष समस्या समाधान और समाज, समाज और व्यक्ति, व्यक्ति तकनीक और परिवार, परिवार और सामाजिक मानवीय मूल्यों पर लेखक ने अपनी लेखनी अधिक पैनी दृष्टि के साथ चलाई है। समाज के केंद्र में व्यक्ति और व्यक्ति का केंद्रीय भाव वैयक्तिक संतुष्टता और सुरक्षा अपने मायने तय कर रहा है। मानवीय संबंधों का जाल शिथिल होता जा रहा है किन्तु उसमें फँसे हुए मानव की छटपटाहट बढ़ती जा रही है। एक ओर यह शिथिलता परिवार के ताने-बाने को तोड़ती दिखाई पड़ती है वहीं दूसरी ओर अंतरजालीय तकनीक उसे पीड़ा की अंतिम सीमा तक पहुँचा देती है। जहाँ वह अकेला आलाप करता दिखाई देता है।
समाज के प्रत्येक आयु वर्ग के पात्रों का मानसिक सामाजिक चित्रण करते समय लेखक विशेष सजग रहते हुए वह पीड़ा बेचैनी और अन्तः कटाव से उत्पन्न अंतर्नाद को शाब्दिक रूप देने में सफल रहा है। कथावस्तु और घटनाओं के साथ संवेदना की सघनता में कार्य व्यापार की सूक्ष्मता और सहजता को लेखक इंगित करना नहीं भूलता परन्तु ध्यातव्य है कि सहजता के पार्श्व में भी समकालीन भयावह समस्या और उसकी विद्रूपता को स्पष्ट रूप से चित्रित किया है। अंदर बाहर के कुरंगी यथार्थ को कथा में सूत्रबद्ध करके ताक़तवर के विरुद्ध अपनी संवेदनशील अभिव्यक्ति करते हुए पात्र पाठकों को सरलता से आकृष्ट करते हैं।
कहानी यथार्थ से आदर्श और आदर्श से यथार्थ की ओर पुनः दीर्घ यात्रा करती है। वह अपनी संवेगिक प्रस्तुति से हृदय मन बुद्धि तक अपनी छाप छोड़ने में सफल हुई है। ‘चाहिए’ से ‘है’ तक गतिरोधात्मक अभिव्यक्ति करते हुए कतिपय मात्रा में लेखक पाए जाते हैं। लेखकीय दृष्टि चतुर्दिक और सत्य सापेक्ष है। परिवेश के दृष्टांत स्वयं साक्ष्य हैं, जो प्रतिदिन गिरती नैतिकता और वर्जनाओं के स्वरूप को दर्शाती है। समसामयिक आख्यान के रूप में दहकते घटनाक्रम की प्रस्तुति लेखक के संग्रह की विशेषता है। रही बात संचार सूचना तकनीक के माध्यमों की तो इसकी जकड़न से तो हर सामाजिक प्राणी दो-चार हो रहा है। मशीनों ने मानव को मशीन बनाने का उपक्रम प्रारंभ कर दिया है। प्राथमिक आवश्यकता और सुविधाजनक जीवन कल्पना ने नैतिक ह्रास को बढ़ावा दिया है। किन्तु सारा आरोप मशीनों या तकनीकी पर लगाना ठीक नहीं उन्हें संचालित करने वाले बौद्धिकों में मूल्य परक ह्रास अनुदिन बढ़ता जा रहा है। विकास और विनाश को आमंत्रित करने के लिए मानव स्वयं उत्तरदायी है। अतिवादी मनुष्य ही नहीं सरल मन भी इनके दुष्परिणाम से बस नहीं सकेगा। ऐसे ही सहज असहज चित्रण के माध्यम से लेखक अपने कथ्य के पथ्य को पूरी गंभीरता से प्रस्तुत करता है जो सराहनीय और कल्याणकारी सिद्ध होगा। आधुनिक परिवेश में अन्तर्जालीय हलचलों से जुड़ा व्यक्ति है। उसे नए सिरे से पुनः देखने की ज़रूरत है साहित्य को इस दृष्टि से पढ़ने और लिखने की ज़रूरत को यह कहानी संग्रह लक्षित करता है। कहानीकार समकालीन पारिवारिक परिस्थितियों को बड़ी निकटता और सहजता से रूपायित करता है वह अर्थाभाव से जूझ रहे मध्यवर्गीय समाज में नैतिक मूल्य और आवश्यक आवश्यकता पूर्ति का संघर्ष आम बात है यह बात धर्म जाति का लिंग आदि से परे खड़े समाधान, ‘मैं मैसेज और तजीन’ और ‘भुइंधर का मोबाइल’ पर ध्यानाकृष्ट करती है। तजीन और भुइंधर का अपना एक अंतर्जालीय समाज विकसित कर रहे हैं। मैसेज और मोबाइल का प्रयोग आणविक विस्फोट से ज़्यादा घातक सिद्ध दिखाया गया है। उक्त समाज, भाषा, रहन-सहन, उठना-बैठना, विचार, विश्लेषण आदि समाधान की माँग करते हैं। अर्थ लोलुपता से इतरभाव अर्थाभाव से समस्या श्रम रोज़गार व्यवसाय व्यापार जैसे समाधान से संतुष्ट नहीं है। पात्र मनसा वाचा कर्मणा के पाप को जानते नहीं है। वचन के पाप से अनभिज्ञ तजीन कब वचन के पाप से पाप के दलदल में फँस जाती है और उसका अंत हो जाता है। बार-बार पाठकों को सोचने पर विवश करता रहेगा। “मैं आने वाली इन कॉल्स को चाह कर भी इग्नोर नहीं कर सकती थी . . . मेरे इस काम में रुकावट ना आए इस ग़रज़ से घर के बाक़ी लोगों से अपने को अलग-अलग कर लिया था।”
“मैं इन सब की क़ीमत भी चुका रही थी।” एक ग्रामीण पत्नी पति प्रेम में महानगरीय चकाचौंध में प्रवेश करती है। “जहाँ मनई क्यार नाव लेत है” भुंइधर की मेहरिया कई थप्पड़ खाकर जब हार गई तब “सात फेरे ली थी शादी में तो इसी समय सात बार नाम भी लिया। यहाँ बचाने के लिए ना आप (सास) न बाबू जी, न पड़ोस वाली काकी और न ही छोटके भैया।” पतिव्रत का पालन करने वाली यह पत्नी किस सदी की है यह जानना पाठकों के लिए आवश्यक है। “आखिर सास बहू कैसे लड़ती है। अगर सारी सास इस दुनिया में आप जैसी हो जाएँ और बहुएँ मतलब मेरी जैसी तो सोचिये अम्मा सारे घर स्वर्ग भले न बन पाएँ लेकिन कम से कम घर तो जरूर बन जाएँगे, लेकिन पता नहीं अम्मा यह घर कब बनेंगे। घर तो क्या पूरा भटियार खाना था।”
मकान को घर बनाने वाली घरवाली अपने संरचनात्मक छात्रा से संबंधित के ताने वाले को चित्रण करने वाली गुर्जर की भुजिया संघर्ष प्रति दिखाई देती है। अनागत को सुनकर पत्र शैली में लिखना कहानीकार के विशेष छात्रवृत्ति की ओर इशारा करती है। इसी क्रम में नगरी जीवन में संबंधों के गिरते स्वरूप को भी लेखक ने बड़ी चतुराई से विस्तार दिया है।
निर्मला ग्रामीण अशिक्षित है किन्तु नीला और संजना शिक्षित हैं। नीला भी सती सावित्री की तरह प्रिय प्राणनाथ को न्यायालय के चंगुल से बाहर निकालने के लिए अंत तक संघर्ष करती है लेकिन असफल होती है। विवाहेतर संबंधों का सबसे ज़्यादा नुक़्सान बच्चों पर दिखाई देता है। “लड़की अपने ससुराल में ख़ुश है और ख़ुशी की बात है कि बेटा अपने करियर को लेकर बहुत सेंसियर है। तुम्हारा और मेरा नाम आते ही जैसे उसका मुँह कसैला हो जाता है।”
नीला तकनीकी के माध्यम से पति को संजना का सच दिखाती है किन्तु न्याय की लोचदार व्यवस्था कितना न्याय कर पाती है इसकी प्रतीक्षा पात्र-पाठक और लेखक को है। आगे बात करें तो नूरीन ने भी अपने अबला स्वरूप को तोड़कर स्वयं अपनी माँ के ख़िलाफ़ आंदोलन खड़ा कर दिया है। सम्पति और नैतिक मूल्यों की विजय की बात करना आज कहाँ तक ठीक साबित होता है जानने के लिए पुनर्विचार अपेक्षित है।
वृद्धों की परिवार में गिरती इज़्ज़त और उपयोगिता ने समाज और परिवार पर प्रश्न खड़े कर दिए हैं। अपेक्षा उपेक्षा के बीच झूलता वृद्ध अपने अंतिम समय की प्रतीक्षा में दिन काटता है। बुढ़ापे की लाठी, आँखों का तारा आदि मुहावरे भूल कर भी परिवारजन की मुँह की शोभा नहीं बढ़ाते। वृद्धों का उपेक्षित जीवन समाज के लिए सबक़ दे रहा है कि रात-दिन रात का होना मनुष्य के बस की बात नहीं है। किन्तु ढलते सूरज की शोभा को समझने के लिए उगते सूरज को स्वयं अस्त होना होगा। आशय यह है कि वैचारिक मतभेद होना स्वाभाविक है किन्तु मतभेद को मनभेद या उपेक्षा के शीर्ष तक ले जाना ठीक नहीं है। लेखक का यही उद्देश्य “हार गया फ़ौजी बेटा” शीर्षक कहानी में उद्घाटित हुआ है। एक तरफ़ पिता अपने बेटे बहू से उपेक्षित हो कर घर छोड़कर जाना चाहता है तो दूसरी तरफ़ फ़ौजी के पिता बेटे की मृत्यु के बाद अपने बुढ़ापे को विचारते हैं, संतान (विशेष कर पुत्र) बुढ़ापे की लाठी ही पिता के लिए जीवन लक्ष्यों की प्राप्ति के अंतिम आशा भी होते हैं। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में या मुहावरा अपनी सुंदरता होता जा रहा है। कहानियों के बीच-बीच में अस्पतालों की लापरवाही, न्याय की दुर्व्यवस्था, कार्यालयों में भ्रष्टाचार आदि स्थानों पर भी लेखक ने विशेष दृष्टि रखी है। भाषाई ताना-बाना भी लेखक ने कुछ विशेष न रखकर प्रचलित इंग्लिश रखी है। जो पात्रों के अनुकूल है। ग्रामीण एवं नगरीय पात्रों की कथन शैली के प्रति लेखक की प्रतिभा निखर कर सामने आई है। कॉलेज जाने वाली लड़कियाँ, नगरीय परिवेश में कामकाजी महिलाओं की भाषा ग्राम से नगरीय परिवेश से स्वयं को असहज अनुभव करती हुई स्त्री, नर्सों की भाषा, मुस्लिम परिवारों की भाषा, आदि वैविध्य यह दर्शाता है कि कहानी संग्रह की भाषा देशकाल, परिस्थिति, कथावस्तु और पात्रों के अनुकूल होने के साथ-साथ शैलीगत विशिष्टताओं से युक्त है। संवाद यदा-कदा दीर्घ और छोटे भी हैं। स्वगत कथन शैली में लेखक के पारदर्शी विचार प्रकट हुए हैं। कुल मिलाकर यह कहना होगा कि कहानीकार प्रदीप अपने कहानी संग्रह “हार गया फ़ौजी बेटा एवं अन्य कहानियाँ”के माध्यम से स्वगत लेखन के क्षेत्र में कुछ विशेष समस्याओं का चित्रण कर रहे हैं। आदर्श और परिपाटी लेखन की सुदीर्घ परंपरा निर्विवाद चलती आ रही है किन्तु सहज लेखन से असहज लेखन की परीक्षा को लेखक ने पार कर यह दिखाया कि यथार्थ की प्रस्तुति मात्र घटनाओं का संकलन नहीं अपितु इन समस्याओं के प्रति चिंतन का असहज होकर प्रकट होना भी उतना ही आवश्यक है जितना सहज चिंतन। इन कहानियों को पढ़ते समय पाठक स्वयं अपने अंदर मूल्यांकन करने के लिए तत्पर होगा। यह बात विशेष रूप से इंगित है लेखक संजीव पात्रों को सीधे काग़ज़ पर उतार देता है जिससे कथावस्तु की प्रमाणिकता स्वयं सिद्ध हो जाती है। कहीं भी झूठे आवेग आवेश को प्रकट करने की आवश्यकता नहीं हुई। बनावटी कृत्रिम में और बिकाऊ साहित्य की कोटि से अलग यह कहानी संग्रह अपनी समसामयिक भोगे हुए यथार्थ की स्पष्ट प्रस्तुति है जिसे किसी प्रकार की झूठी सहानुभूति की भी दरकार नहीं है। पाठक इतना सजग एवं जागरूक होगा कि प्रस्तुत कहानी संग्रह की उपादेयता संबंधी प्रश्नों के उत्तर स्वयं तलाशेगा। इनके उत्तरों के लिए भी पाठकों को ज़्यादा कठिनाई न होगी क्योंकि पाठक स्वयं भुक्तभोगी है। जीवन का अतिक्रमण करती अन्तर्जालीय तकनीकी के अनुप्रयोग स्वयं में प्रश्नों और उनके उत्तरों के स्वरूप को स्पष्ट कर देंगे।